आख़िर कब तक ?

आख़िर कब तक ?

गता है अब अपना मुंह खोलना पड़ेगा,
लगता है अब हमें ही कुछ बोलना पड़ेगा।।
आख़िर हम कब तक रहेंगे मौन,
आख़िर कब तक ?

और ये भ्रष्टाचार कब तक चलता रहेगा?

आख़िर कब तक सच्चाई पर्दा करेगी जनता से 
और झूठ गोद पर पलता रहेगा?
अब कलम कह रही है हमसे 
तू चाहे बोल ना बोल,मुझे तो अब बोलना पड़ेगा,
वह झूठे-मीठे वादाओं का,
वह वोट – नोट चुनावों का पोल तो अब खोलना पड़ेगा।।
आख़िर कब तक देश सेवा की बहाने 
नेता पैसों की गद्दी पर बैठा रहेगा?
कब तक किसान पीता रहेगा 
ज़हर और गरीब भूखा पेट लैटा रहेगा??
कब तक देश बंटेगी धर्म जात के आड़ पर,
आखिर कितनी लंबी ये नफ़रत का रात होगा?
मेरा भारत महान कह कर क्यों बहलाते हो हमें, 
बताओ कब वह राम राज का शुरुआत होगा?
जागो भारत, जागो जनता ,
अब इन्हें इनकी औकात दिखाना पड़ेगा,
जब ये आयेंगे वोट मांगने तो इन्हे अब राष्ट्रगान भी सीखना पड़ेगा!!
अब बर्दास्त नंही हो रही है ये खून की राजनीति,
अब राजनीति का राज़ तो उगालना ही पड़ेगा,
कलम हूं मैं आखिर कलम हूं मैं,
तो सच भी मेरे को बोलना ही पड़ेगा।।

– मोनालिसा पात्र
जीव विज्ञान विभाग की छात्रा,
गंगाधर मेहर यूनिवर्सिटी, ओडिशा

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