कलम की ताकत – एक सैनिक की पत्नी की कहानी

कलम की ताकत ( एक सैनिक की पत्नी की कहानी )

प्रिय रमेश, 
तुम वहां एक  अनजान दुश्मन से दिन रात युद्ध कर रहे हो । मेरा दिल और दिमाग तुम्हारे संग वास करता है । मैं तुम्हारे साथ होती हूँ, जभ तुम अपनी बन्दूक में गोली भरते हो, और उसको कंधे पर लगाकर युद्ध भूमि में उतरते हो । जभ तुम दुश्मन का मुक़ाबला करते हो, मैं तभ भी तुम्हारे साथ होती हूँ । तुम्हे यह बात कभी बताई नहीं हैं मैंने, पर मैं दिन-रात तुम्हारे बराक में काम करने वाले छोटू को फ़ोन करती हूँ और तुम्हारे बारे में पूछती हूँ।  शायद वो बेचारा भी परेशान हो गया होगा, पर आजतक उसने कभी शिकायत नहीं की।  वो मुझे बताता है की तुम्हे चावल और आचार खाने का नया शौक आ गया है । अभ तुम दाल की तरफ आँख उठाकर देखते भी नहीं हो।  मैं तो तभ से यही सोचकर खुद को सांत्वना दे रही हूँ की शायद तुम्हे वहां की दाल पसंद ही नहीं आ रही । आखिर मेरे हाथ का ही खाना तुम्हारे मन को भाता है।  
छोटू बता रहा था की कल तुम घायल हुए, और फिर भी तुम आज युद्ध भूमि में गए थे।  कभी तो अपना ख्याल रख लिया करो।  घाव पर आज हल्दी और तेल लगाना । मैंने छोटू को समझा दिया है, वो तुम्हे हल्दी और तेल का मिश्रण बनाकर तुम्हे श्याम तक दे देगा। काश मैं तुम्हारे पास होती, मैं खुद अपने हाथो से तुम्हारे घाव भर्ती।  
कलम की ताकत
कलम की ताकत 
तुम्हे पता है, कल आशु को विद्यालय से इनाम मिला । उसने हिंदी परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया, और साथ में, उसकी कविता को प्रधान मंत्री संगठन द्वारा आयोजित कविता लेखन प्रत्योगिता में प्रथम स्थान मिला, और जल्द ही वो अख़बार में भी छपेगी।  आशु ने मुझे तुम्हे अपनी इस जीत के बारे में बताने से मन किया है । उसको लगता है की उसके पिता जी को उसका लिखना पसंद नहीं है, और उसके पिता जी चाहते है की वो भी उनकी तरह एक सिपाही बने।  मैं जानती हूँ की तुम चाहते हो की आशु भी देश का नाम रौशन करे, पर वो तो अँधेरे से डरता है।  सरस्वती माँ ने उस पर कल्याण किया है, और उसको लेखन की ऐसी शक्ति प्रदान की है, जिसका मान – सम्मान करना बहुत आवश्यक है । अपने शब्दों के माध्यम से हमारा आशु कुछ भी कर सकता है, कुछ भी बन सकता है।  यूं ही समझ लो, वो अपने शब्दों के माध्यम से एक नै दुनिया बना सकता है।  
उसने कल तुम्हारे बारे में एक कविता लिखी, जिसकी कुछ पंक्तियाँ मैं तुम्हारे लिए लिख रही हूँ —
”देखता हूँ, जभ किसी बालक को अपने पिता के साथ,
तो सोचता हूँ, की काश! मेरे पिता भी होते मेरे साथ,
पर गर्व है मुझे, की मेरे पिता है पूरे देश के साथ
कसकर थामा है उन्होंने, भारत माँ है हाथ 
भारत माँ का हाथ”

– आशु
शब्द सरल है, पर इन शब्दों  में आशु की भावनाएं झलक रही है।  उसको तुम्हारी बहुत याद आती है । आज सुबह तुम्हारी तस्वीर को देखकर बोल रहा था की उसकी आँखें और तुम्हारी आँखें बिलकुल एक जैसी है।  वो चाहता है की एक दिन उसके पिता भी उसे शाबाशी दे।  दिवाली पर जभ माँ ने उसे कुरता-पजामा पहनने को कहा तो पहनते ही कहने लगा ”माँ, मैं पापा के तरह लगा रहा हूँ!”
चलो, अभी बहुत स्याही खर्च कर ली!  पर जब तुम्हे पत्र लिखने बैठती हूँ, खुद को रोक ही नहीं पाती । तुम भी सोचोगे, कितनी बातूनी हो गयी है मेरी रीमा! पहले इतना कभी नहीं बोलती थी ! पर क्या है न रमेश, पहले तुम अपनी रीमा के साथ रहते थे। 
अभी के लिए अलविदा। अपना ख्याल रखना।  हल्दी और तेल लगाना मत भूलना, और चावल के साथ थोड़ा सा दाल खा लिया करो।  ज़्यादा आचार मत खाना।  वैसे ही ठण्ड का मौसम है, और तुम्हे सर्दी जल्दी पकड़ लेती है । तुम्हे याद है, तीन साल पहले – तुम, मैं और आशु, शिमला गए थे।  वहां तुमने कितनी कुल्फी खाई थी! तुम छींकते – छींकते बर्फ की चट्टान पर गिर गए, और मैं उस रात कितना रोइ थी ! पर अभ, मैं बहादुर हो गयी हूँ । सलाम करती हूँ इन शब्दों को, जो हमे जोड़े रखती है । सलाम करती हूँ इस कलम को, जो दिल में छिपी बातो को शब्दों का रूप देते है।  कलम की ताक़त पर जीती हूँ, और  कैसे भी करके, मुस्कुरा ही लेती हूँ । 
क्या करूँ? आखिर मैं भी एक सैनिक की पत्नी हूँ ।
तुम्हारे जवाब के इंतज़ार में, 
तुम्हारी रीमा।  
– प्रणीति गुलयानी

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