बात बोलेगी,हम नहीं

बात बोलेगी,हम नहीं


बात बोलेगी,
            हम नहीं।
भेद खोलेगी
            बात ही।

शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर बहादुर सिंह

सत्‍य का मुख
           झूठ की आँखें
           क्‍या – – देखें !

सत्‍य का रुख
          समय का रुख है :
अभय जनता को
          सत्‍य ही सुख है,
          सत्‍य ही सुख।

दैन्‍य दानव; काल
भीषण; क्रूर
स्थिति; कंगाल
बुद्धि; घर मजूर।

सत्‍य का
        क्‍या रंग? – –
पूछो
        एक संग।

एक – जनता का
        दुःख : एक।
हवा में उड़ती पताकाएँ
        अनेक।
               दैन्‍य दानव क्रूर स्थिति।
               कंगाल बुद्धि : मजूर घर-भर।
               एक जनता का – अमर वर :
               एक ता का स्‍वर।
               अन्‍यथा स्‍वातंत्र्य-इति।

शमशेर बहादुर सिंह (1911- 1993) हिन्दी के सर्वाधिक प्रयोगशील कवि है. शमशेर बहादुर सिंह, प्रगतिशील और प्रयोगशील कवि है. बौद्विक स्तर पर वे मार्क्स के द्वंदात्मक भौतिकवाद से प्रभावित है तथा अनुभवों में वे रूमानी एवं व्यक्तिवादी जान पड़ते है. उनकी काव्यदृष्टि सुदीर्घ एवं बहुआयामी है, किंतु उनमे एक तरह का अंतद्वंद विद्धमान है, इसीलिए उनका काव्य जगत बहुत ही अमुखर और शांत है. विजयदेव नारायण शाही ने शमशेर की काव्य -कला का विश्लेषण करते हुए लिखा है -.. “तात्विक दृष्टि से शमशेर की काव्यनुभूति सौन्दर्य की ही अनुभूति है शमशेर की प्रवृति सदा की वस्तुपरकता को उसके शुद्ध और मार्मिक रूप में ग्रहण करने में रही है वे वस्तुपरकता का आत्म-परकता में और आत्म-परकता का वस्तुपरकता में अविष्कार करने वाले कवि है. जिनकी काव्यानुभूति बिम्ब की नही बिम्बलोक की है. “
रचना कर्म: –
काव्य: – कुछ कवितायें, इतने पास अपने, उदिता, चुका भी हूँ नही मै.
डायरी – शमशेर की डायरी

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