बुंदेली भाषा का इतिहास और क्षेत्र

बुंदेली भी एक बोली है जो एक निश्चित क्षेत्र में बोली जाती है।

बुंदेली भाषा का इतिहास

बुंदेली भाषा का समृद्ध इतिहास है। यह भाषा शौरसेनी अपभ्रंश के ‘मध्यदेशीय’ से
विकसित पश्चिमी हिन्दी की एक प्रमुख बोली है। यह तथ्य सर्वविदित है कि हिन्दी
की लोकभाषाओं का उदय मध्यदेशीय शौरसेनी अपभ्रंश से माना गया है। शौरसेनी
अपभ्रंश से अनेक लोकभाषाओं का जन्म हुआ। ब्रजभाषा, खड़ी बोली और बुंदेली का
मूल आधार शौरसेनी अपभ्रंश को ही माना गया है। दसवीं सदी से बुंदेली भाषा का
साहित्य प्रकाश में आया। इसी के आसपास बुंदेली का उद्भव हुआ था। बुंदेली के संदर्भ में यह तथ्य भी विदित है कि बुंदेली भाषा अपनी
स्थानीय बोलियों के साथ 11वीं-12वीं सदी में विकसित होने लगी थी। स्थानीय
बोलियों के सम्मिश्रण के फलस्वरूप मध्यदेशीय भाषा ने बुंदेली भाषा का रूप ग्रहण
करना शुरू किया था।

10वीं-11वीं सदी से लेकर अब तक बुंदेली भाषा के स्वरूप में बदलाव होते रहे
हैं। इस भाषा का सीमा क्षेत्र भी बदलता रहा है। शुरुआती दौर में बुंदेली की परंपरा
मौखिक काव्य रचना से शुरू होती है। मौखिक ‘काव्य परंपरा’ में जगनिक रचित
‘आल्हखंड’ का विशेष स्थान रहा। इसे बुंदेली भाषा का प्रथम महाकाव्य स्वीकार किया
गया। इस रचना के उपरांत वीर रस प्रधान बुंदेली भाषा में गाथा साहित्य रचा गया।
सारंगा-भारंगा की गाथा, ढोला-मारू की गाथा, संत-बसंत की गाथा, सुरहिन की
गाथा आदि की समृद्ध परंपरा रही। दसवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं सदी तक बुंदेली
भाषा में वीरगाथात्मक काल माना गया। इसी काल में आल्हा की साखियां (राछशै) का
भी महत्वपूर्ण स्थान है। इन साखियों में बुंदेली भाषा का प्रारंभिक रूप विद्यमान है।

बुंदेली
एक नई भाषा के रूप में 14वीं सदी तक विकसित होतीं रही और निरंतर नया स्वरूप
ग्रहण करती रही। 

बुंदेली भाषा के कवि जगनिक, छत्रसाल, ठाकुर, ईसुरी, गंगाधर
व्यास, ख्याली राम, लाल कवि, अक्षर अनन्य, हरिराम व्यास, ,खेमराज, गौरीशंकर
द्विवेदी, श्याम सुन्दर बादल, नर्मदा प्रसाद गुप्त और दुर्गेश सत्यार्थी जैसे कवियों ने
बुंदेली भाषा को नई ऊंचाई प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई।

चैदहवीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक बुंदेली भाषा की प्रतिष्ठा इतनी हो गई
थी, कि यह राजभाषा के पद पर आसीन हो गई। छत्रसाल के पन्ना नरेश बुंदेली भाषा
में दूसरे राज्यों के राजाओं को पत्र लिखा करते थे। 17वीं और 18वीं सदी में बुंदेली को
राजकाज की भाषा के रूप म ें मान्यता मिल चुकी थी। साहित्य म ें भी ब्रज के साथ-साथ
बुंदेली को भी साहित्यिक मान्यता प्राप्त हुई। बुंदेली काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित
हुई। और एक तरह से बुंदेली भाषा में साहित्य सृजन की बाढ़ सी आ गई। भारतीय
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बुंदेली भाषा में खूब रचनाएं प्रकाश में आयीं, अंतर यह था
कि बुंदेली गद्य साहित्य का उत्थान प्रारंभ हो गया।

बुंदेली भाषा का क्षेत्र

मध्यभारत का प्राचीन विन्ध्यावही क्षेत्र आज बुंदेलखंड के नाम से जाना है। मोटे तौर पर देखे  तो झांसी, सागर, महोबा, दोहम, जालौन, ग्वालियर, मुरैना,
विदिशा, जबलपुर, गुना, सिवनी, सागर, छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दतिया, ललितपुर,
हमीरपुर, सिवनी, छिन्दवाडा, बैतूल, भिण्ड, शिवपुरी क्षेत्र की भाषा को बुंदेली भाषा
स्वीकार किया गया है।

बुंदेली भाषा का इतिहास और क्षेत्र
बुंदेली भाषा का क्षेत्र

ग्रियर्सन के अनुसार बुंदेलखंड उत्तर में चम्बल नदी के उस पार
मैनपुरी, आगरा, इटावा के दक्षिण भाग तक, पश्चिम में पूर्वी ग्वालियर तक तथा दक्षिण
में सागर दमोह तक, भोपाल का पूर्वी भाग, नर्मदा के दक्षिण में नरसिंहपुर, होशंगाबाद,
सिवनी, बालाघाट, छिन्दवाड़ा के कुछ सीमावर्ती क्षेत्र बुंदेली भाषा के दायरे में आता है।
ग्रियर्सन ने यह भी माना है कि बांदा में जिस मिलती-जुलती बुंदेली भाषा का प्रयोग
होता है, वह असल में बुंदेली नहीं  है। कुछ विद्वान इसका समर्थन करते है। लेकिन
सच्चाई यह है बांदा के कुछ क्षेत्रों में बुंदेली ही बोली जाती है।

बुंदेली भाषा का विस्तार मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश तथा मध्यप्रदेश की सीमा तक
फैला हुआ है। स्पष्ट रूप से उत्तर प्रदेश के झांसी, महोबा, बांदा, ललितपुर, जालौन,
हमीरपुर और चित्रकूट में बुंदेली भाषा जनभाषा के रूप स्वीकृत है। मध्यप्रदेश के
छतरपुर, पन्ना, सागर, टीकमगढ, दमोह, भिंड, सतना, दतिया, विदिशा, टीकमगढ जिलों
की पहचान बुंदेली भाषा ही है। एक अनुमान के मुताबिक इस भाषा को बोलने वाले लोगों की संख्या लगभग दो करोड़ है। 

बुंदेली भाषा के प्रमुख कवि

बुंदेली भाषा के अंतर्गत कवि ईसुरी, जगनिक, माधव शुक्ल ‘मनोज’ तथा संतोष सिंह
बुंदेला है।

1. ईसुरी

ईसुरी का जन्म सन 1841 में उत्तर प्रदेश के झांसी जिले
में हुआ था। उनके गांव का नाम मऊरानीपुर मेंढ़की था। बचपन से ईसुरी का मन लोक
जीवन को समझने में लगा था, संभवतः इसी कारण उनके परिवार के लाख चाहने के
बावजदू ईसुरी का पढ़ने में मन नहीं लगा। ईसुरी के बारे में यह बात प्रचलित है कि
वे आशु कवि थे, अपनी काव्य प्रतिभा से दृश्य को तत्काल काव्य के रूप में प्रस्तुत कर
देते थे।

2. जगनिक

जगनिक की दो रचनाएं उपलब्ध हैं। ‘आल्हखंड’ और ‘विजयपाल रासो’ के
रचयिता जगनिक की कीर्ति आज तक विद्यमान है। 1865 में फर्रूखाबाद के कलक्टर
सर चाल्र्स इलियट ने ‘आल्हखंड’ को प्रकाशित करवाया तथा श्याम बिहारी ने विजयपाल रासो की खोज की थी। ‘आल्हखंड’ वीर रस प्रधान प्रबंध काव्य है। इस
रचना में बावन युद्धों का वर्णन है। इस कृति को समूची भारतीय भाषाओं में सम्मान
हासिल हुआ है। ‘आल्हखंड’ में अपने देश के लिए बलिदान होने वाले आल्हा-उदल
की वीरता की कथा मिलती है। ‘आल्हखंड’ मौखिक परंपरा से विकसित काव्य है। इस
काव्य में वीरता का वर्णन तो है ही, साथ ही उसमें बुंदेली संस्कृति, भाषा और समाज
का गहरा असर भी विद्यमान है। जगनिक की कविता बुंदेलखंड के जन-जन का
कंठाहार बना है। 

इस कृति की प्रसिद्धि केवल बुंदेलखंड की सीमा तक ही सीमित नहीं
रही है। भारतीय समाज में ‘आल्हखंड’ की पंक्तियां खूब प्रसिद्ध हुई।

3. माधव शुक्ल ‘मनोज’ 

माधव शुक्ल ‘मनोज ’ एक कृषक परिवार में जन्मे थे। उनका परिवार आर्थिक रूप
से बेहद कमजोर था, इस कारण उनकी परंपरागत शिक्षा में कई अवसरों में व्यवधान
भी आया। आर्थिक दिक्कतों ने उन्हें जल्द ही ठोस आय के स्रोत खाजे ने के लिए बाध्य किया था। वे उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे लेकिन आर्थिक आधार मजबूत न
होने के कारण उन्हें अध्यापन की ओर जाना पड़ा। तात्कालीन समस्याओं ने उन्हें यह
निर्णय लेने के लिए बाध्य अवश्य किया था लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अपना
विशिष्ट यागे दान दिया। इसी योगदान के कारण उन्हें 1984 में राष्ट्रपति शिक्षक
पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उनका जीवन संघर्ष उनकी कविताओं का मुख्य आधार बना। 

4. संतोष सिंह बुंदेला

बुंदेलखंड के लोकप्रिय कवि संतोष सिंह बुंदेला का जन्म 18 मई, 1930 को
छतरपुर जिले के पहाड़गांव जागीर में हुआ था। इनके पिता का नाम दीवान दिल्लीपत
सिंह था। इनके पिता की मृत्यु अल्पायु में ही हो गई थी। जल्दी ही घर-परिवार को
चलाने का जिम्मा बुंदेला के कंधों पर आ गया था। 1954 में इनका विवाह प्रेमकुंवरि के
साथ संपन्न हुआ था। युवा अवस्था में बुंदेला काव्य रचना की ओर प्रवृत्त हुए। उसी
दारै ान फिल्मा ंे मे ं भी अपनी किस्मत आजामाई लेि कन किस्मत का े कुछ और मंजूर था।
फिल्मी दुनिया को बुंदेला ने बहुत जल्दी अलविदा कह दिया और काव्य लिखने लगे।

मंच पर जब संतोष सिंह बुंदेला ने कविता पढ़ना शुरू किया तब उनकी ख्याति परवान
चढ़ने लगी। देखते ही देखते बुंदेला मंच की शान हो गए। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी
बुदं ले ा मचं पर सस्वर कविता का वाचन करत े थ।े उनके नाम से श्राते ाआं े की भीड़ उमड़
पड़ती थी। महज तिरसठ वर्ष की आयु में 20 जून, 1993 को उनकी मृत्यु हो गई।

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