बुढ़ापे की राह थी और जिन्दा बचपन रखा

ख्वाहिशें

ख्वाहिशों की बात में इतना सा फन रखा ,
जो हो सकी  ना पूरी,  उनको दफन रखा।
जरूरतों की आग जब भी तपने लगी ,
बचता रहा था बेशक एक सफन रखा।
ख्वाहिशें
हादसे जो घट गए क्या रोना था उन पे, 
और मुश्किलें जो आनी थी मदफन रखा।
हसरतों जरूरतों के दरम्यान थी जिन्दगी ,
थोडा इसपे लगाम थोडा उसपे कफन रखा।
मुसीबतों का क्या था आती रहीं जाती रहीं ,
सोंच में अल्हड़पन ना जज्बात पचपन रखा।
रूह के  रूआब में कसर ना रहा बाकी ,
थीं जिनसे भी इतनी सी नफरत अमन रखा।
  
जिंदगी की फ़िक्र क्या मौज में कटती गई ,
बुढ़ापे की राह थी और जिन्दा बचपन रखा। 





– अजय अमिताभ सुमन

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