1857 की क्रान्ति के कारण-Causes of the Revolt of 1857

1857 की क्रान्ति कोई अचानक भड़का हुआ विद्रोह नहीं था। वरन इसके पीछे अनेक आधारभूत कारण थे। यद्यपि तत्कालीन “अंग्रेज तथा भारतीय” इतिहासकारों ने सैनिक असन्तोष तथा चर्बी वाले कारतूसों को 1857 की महान क्रान्ति का सबसे मुख्य एवं महत्वपूर्ण कारण माना है।

किन्तु आधुनिक इतिहासकारों ने अपने गहन विश्लेषण से यह सिद्ध कर दिया है कि चर्बी वाले कारतूस एवं सैनिक असन्तोष इस विद्रोह का एक मात्र कारण नहीं था।

 

इस महान विस्फोट की बारूद तो जून 1757 ई. के प्लासी के युद्ध से ही एकत्रित होना शुरू हो गयी थी। जो सौ वर्षों तक एकत्रित होती रही। चर्बी वाले कारतूस एवं सैनिक विद्रोह तो केवल एक चिनगारी थी, जिसने इस समस्त विस्फोटक पदार्थ में आग लगा दी।

इस प्रकार इस महान क्रान्ति के पीछे सैनिक विद्रोह के साथ-साथ राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक कारण भी जिम्मेदार हैं।

1857 की क्रान्ति के राजनैतिक कारण

राजनैतिक कारणों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण के रूप में लार्ड वेलेजली की “सहायक सन्धि नीति” तथा डलहौजी की “व्यपगत नीति या हड़प नीति (doctrine of lapse)” को माना जाता है।

अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति को पोषित करते हुए वेलेजली ने भारतीय रियासतों पर नियन्त्रण रखने तथा उन्हें धीरे-धीरे समाप्त करने की नीति बनाई। जिसे सहायक सन्धि कहा गया।

इस नीति को सर्वप्रथम 1798 ई. में हैदराबाद के निजाम ने स्वीकार किया। इसके बाद मैसूर (1799 ई.), तंजौर (अक्टूबर 1799 ई.), अवध (1801 ई.), पेशवा (1802 ई.), भोंसले (1803 ई.), सिन्धिया (1805 ई.) ने सहायक सन्धि को स्वीकार किया। इस प्रकार प्रमुख भारतीय रियासतें ब्रिटिश नियन्त्रण में आ गयी।

लार्ड डलहौजी ने अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति को आगे बढ़ाने के लिए “विलय की नीति या हड़प नीति या व्यपगत नीति अथवा डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स” का सिद्धान्त अपनाया।

डलहौजी ने नैतिक और राजनैतिक आचारों की सभी सीमाओं को ध्वस्त करते हुए अनुचित तरीकों से देशी राज्यों का विलय किया। उसने देशी राजाओं के दत्तक पुत्रों को उनका उत्तराधिकारी नहीं माना।

व्यपगत सिद्धान्त के अंतर्गत उसने सतारा (1848), जैतपुर व सम्भलपुर (1849), बघाट (1850), उदेपुर (1852), झांसी (1853), तथा नागपुर (1854) को छीन कर अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया। तथा अवध को फरवरी 1856 ई. में कुशासन के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। फलस्वरूप इन राजवंशों में अंग्रेजों के खिलाफ असन्तोष व्याप्त हो गया।

पेंशनों और पदों की समाप्ति से भी अनेक राजाओं में असन्तोष व्याप्त हो गया। जैसे-नाना साहब को मिलने वाली पेंशन डलहौजी ने अपनी नवीन नीति के तहत बन्द करवा दी।

मुगल बादशाह बहादुर शाह द्वितीय के साथ अंग्रेजों ने अपमान जनक व्यवहार करना प्रारम्भ कर दिया। गवर्नर जनरल लार्ड एलनबरो ने सम्राट को भेंट देनी बन्द कर दी तथा सिक्कों पर से उसका नाम हटा दिया।

डलहौजी ने तो बहादुर शाह द्वितीय से लालकिला खाली करने तक को कह दिया। लार्ड कैनिंग ने बहादुर शाह द्वितीय के बाद मुगल शासक को सम्राट की उपाधि धारण करने से वंचित कर देने की घोषणा कर दी। इससे मुस्लिम भावनाएं गम्भीर रूप से आहत हुई। जिससे वे अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 ई. के विद्रोह में शामिल हो गये।

कुलीन वर्गीय भारतीय तथा जमींदारों के साथ अंग्रेजों ने बुरा बर्ताव किया और उन्हें मिले समस्त विशेषाधिकारों को कम्पनी ने छीन लिया।

1854 ई. में लार्ड डलहौजी ने भू-पतियों तथा जमींदारों की जागीरों की जाँच करने के लिए “1832 के एक्ट” के तहत बम्बई में एक “ईनाम कमीशन” का गठन किया। इस कमीशन ने लगभग 35 हजार जागीरों की जाँच की और लगभग 20 हजार जागीरों को जब्त कर लिया। इस कारण ये लोग भी अंग्रेजों के विरोध में हो गए।

भारतीय प्रशासनिक कर्मचारियों के साथ भी भेदभाव किया जाता था। कोई भी भारतीय सूबेदार से ऊँचे पद पर नहीं पहुँच पाता था। अंग्रेजों की इस भेदभाव पूर्ण नीति के विरोध करते हुए भारतीय प्रशासनिक कर्मचारियों ने 1857 के विद्रोह में भाग लिया।

1857 की क्रान्ति के आर्थिक कारण

1857 ई. की क्रान्ति के लिये अंग्रेजों की आर्थिक नीतियां भी एक प्रमुख कारण थीं। अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों ने भारतीय व्यापार तथा उद्योग-धन्धों को नष्ट कर दिया।

दस्तकारों एवं हस्तशिल्पियों की बड़ी संख्या मजदूर बन गयी। सूती वस्त्र उद्योग नष्ट हो गया। ढाका जो भारत का मेनचेस्टर कहा जाता था। अब पतन के कगार पर था।

भारतीय शासन पर अंग्रेजों का नियन्त्रण था। अतः कर नीतियां जैसे-तट कर तथा चुंगी कर, ब्रिटिश हित में बनायीं जाती थीं।

भारत में आने वाले ब्रिटेन में निर्मित वस्त्रों एवं ऊनी वस्त्रों पर क्रमशः 3.5% व 2% कर लिया जाता था। जबकि भारत से ब्रिटेन में जाने वाले मलमल, सूती वस्त्रों व रेशम पर क्रमशः 27%, 71% व 90% कर लिया जाता था। इसका मुख्य उद्देश्य विश्व मंडी में भारतीय वस्त्रों की पहुँच को रोकना था। जिससे बुनकरों की जीविका के साधन नष्ट हो गये। उनके मन में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की भावना पनपने लगी।

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कृषि क्षेत्र में भी अंग्रेजों की भू-राजस्व व्यवस्था ने किसानों की स्थिति दयनीय कर दी। अकाल के समय भी शक्ति से कर वसूला गया। इस प्रकार निरन्तर हो रहे आर्थिक शोषण से भारत को निर्धन और दरिद्र बना दिया। जिससे समस्त भारतीय जनता त्राहि-त्राहि करने लगी। और 1857 में अवसर पाकर भड़क उठी।

1857 की क्रान्ति के सामाजिक कारण

अंग्रेजों की अनेक सामाजिक नीतियां एवं कार्य ऐसे थे जिनसे भारतीयों के मन में विरोध की भावना जन्म लेने लगी थी।

अंग्रेज भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते थे। वे हिन्दुओं को बर्बर तथा मुसलमानों को कट्टरपंथी, निर्दयी एवं बेईमान कहते थे। अंग्रेज भारतीयों को काली चमड़ी का कहकर उनका उपहास करते थे।

अंग्रेज भारतीय समाज को असभ्य समाज मानते थे। इसलिए उन्होंने सुधार के लिए कुछ कुरीतियों जैसे-सती प्रथा (1829 में विलियम बेंटिक द्वारा), नरबलि (1844 में कैम्पबेल द्वारा हार्डिंग के समय में), कन्या वध (1795 में जोनशोर द्वारा), दास प्रथा (1843, एलनबरो द्वारा) पर प्रतिबन्ध लगा दिया। डलहौजी ने 1856 ई. में विधवा पुनर्विवाह को मान्यता देकर रूढ़िवादी भारतीयों के अन्दर असन्तोष को भर दिया।

शिक्षा के क्षेत्र में भी अंग्रेजों ने पाश्चात्य सभ्यता, संस्कृति, भाषा और साहित्य के विकास पर अधिक ध्यान दिया। जिसके कारण भारतीय बौद्धिक वर्ग अंग्रेजों के विरुद्ध हो गया।

अंग्रेजों द्वारा लगान वसूली के समय भारतीयों को कठोर शारीरिक दण्ड एवं यातनाएं दी जाती थीं। जिससे उनके अन्दर ब्रिटिश सरकार के प्रति घृणा और द्वेष की भावना भर गयी।

1857 की क्रान्ति के धार्मिक कारण

भारतीय समाज में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। यद्यपि ब्रिटिश सत्ता धर्म के मामले में तटस्थ थी, फिर भी उसने ईसाई धर्म के प्रचार में अपना पूर्ण सहयोग दिया।

18 सौ 57 के विद्रोह के परिणाम

1813 ई. में ईसाई मिशनरियों को भारत आने की अनुमति दी गयी। जिससे बड़ी संख्या में पादरी भारत आये और ईसाई धर्म की शिक्षा का प्रचार प्रसार किया।

ईसाई मिशनरियों का उद्देश्य अधिकांश भारतीयों को ईसाई बनाकर भारत में अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करना था। जिसकी पुष्टि कम्पनी के अध्यक्ष मैंन्जिलस के हाउस ऑफ कॉमन्स के भाषण से होती है। उसने कहा था कि “दैवयोग से भारत का विस्तृत साम्राज्य ब्रिटेन को मिला है ताकि ईसाई धर्म की पताका एक छोर से दूसरे छोर तक फहरा सके। प्रत्येक व्यक्ति को यथाशीघ्र समस्त भारतीयों को ईसाई बनाने के महान कार्य को पूर्णतया सम्पन्न करने में अपनी समस्त शक्ति लगा देनी चाहिए।” ब्रिटिश सरकार ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों को सरकारी नौकरी, उच्च पद व अनेक सुविधाएं प्रदान करती थी।

ईसाई मिशनरियों ने स्कूलों में “बाइबिल की शिक्षा” अनिवार्य कर दी। 1837 ई. के अकाल में ईसाई मिशनरियों ने बड़ी संख्या में अनाथ बच्चों को ईसाई बनाया।

अमेरिकन मिशनरी सोसायटी ने ईसाई धार्मिक साहित्य के प्रकाशन हेतु “आगरा में एक बड़ा मुद्रणालय” लगाया था। सरकार ने 1850 ई. में “धार्मिक अयोग्यता अधिनियम (लेक्स लोकी कानून)” पारित किया।

इस कानून द्वारा हिन्दू रीत-रिवाजों में परिवर्तन लाया गया। अभी तक धर्म परिवर्तन करने पर व्यक्ति अपनी पैतृक सम्पत्ति से वंचित हो जाता था। किन्तु अब धर्म परिवर्तन करने पर व्यक्ति को उसकी पैतृक संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता था। इस कानून का मुख्य लाभ ईसाई बनने वाले को था। अंग्रेजों की इन नीतियों के हिन्दू और मुस्लिम जनता उनके विरोध में हो गई।

1857 की क्रान्ति के सैनिक कारण

1857 ई. के विद्रोह में उपर्युक्त कारणों के बाद भी यदि सैनिक असन्तोष नहीं हुआ होता तो इस क्रान्ति का स्वरूप इतना व्यापक नहीं होता। इसलिए 1857 के विद्रोह के लिए सैनिक असन्तोष महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।

अंग्रेज सैनिक अधिकारियों का भारतीय सैनिकों के प्रति भेदभाव पूर्ण बर्ताव, असमान वेतन, भारतीय सैनिकों को उच्च पदों पर नियुक्त न करना एवं 1856 ई. में कैनिंग द्वारा “सामान्य सेना-भर्ती अधिनियम” का लाया जाना। इस नियम के तहत सरकार भारतीय सैनिकों को कहीं भी देश या विदेश में लड़ने के लिए भेज सकती थी। आदि कारणों ने भारतीय सैनिकों के मन में विद्रोह की भावना को भर दिया। जिसका अवसर उन्हें 1857 ई. में चर्बी लगे कारतूसों ने दिया। जो एक महान संग्राम में परिवर्तित हुआ।

विद्रोह की असफलता के कारण

इसके अतिरिक्त 1854 ई. में डाक घर अधिनियम पारित हुआ। जिसमें सैनिकों को दी जाने वाली निःशुल्क डाक सुविधा समाप्त कर दी गई। जिससे सैनिक असन्तुष्ट हो गए।