प्रथम, द्वितीय और तृतीय अंग्रेज-मराठा युद्ध-First, Second and Third Anglo-Maratha Wars

आंग्ल मराठा युद्ध की पृष्ठभूमि पानीपत के तृतीय युद्ध के पश्चात बनने लगी थी। 1772 ई. पेशवा माधवराव  की मृत्यु के बाद उसके छोटे भाई नारायण राव को पेशवा बनाया गया।

1773 ई. नारायण राव की हत्या करवाकर कर उसका चाचा रघुनाथ राव पेशवा बन गया। परन्तु नाना फड़नवीस ने उसे पेशवा के पद से हटाकर पेशवा माधवराव  के अल्पायु पुत्र माधवराव नारायण द्वितीय को 1774 ई. में पेशवा नियुक्त किया।

 

पेशवा की अल्पायु के कारण मराठा राज्य की देख-रेख “बारभाई” नाम की 12 सदस्यों की एक परिषद किया करती थी। रघुनाथ राव (राघोबा) ने पेशवा पद पुनः प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों से सूरत में एक सन्धि कर ली।

सूरत की सन्धि (1775 ई.)

यह सन्धि ईस्ट इंडिया कम्पनी की बम्बई परिषद और राघोबा के बीच 7 मार्च 1775 ई. में हुई। इस सन्धि की प्रमुख शर्ते निम्नलिखित थी।

1-अंग्रेज रघुनाथ राव को पेशवा बनाने के लिए 25 हजार सैनिकों की सहायता देगें। इन सैनिकों का खर्च डेढ़ लाख रुपये मासिक राघोवा को देना होगा।

2-सालसेट, बेसीन,थाना और आसपास के क्षेत्र अंग्रेजों को देने होंगे। इसके अतिरिक्त सूरत और भड़ौच के जिलों की आय का कुछ भाग अंग्रेजों को मिला करेगा।

3-मराठे बंगाल तथा कर्नाटक पर आक्रमण नहीं करेंगे।

4-यदि रघुनाथ राव पूना दरबार से कोई सन्धि करता है, तो उसमें अंग्रेजों को भी सम्मिलित किया जायेगा।

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध

कम्पनी के डायरेक्टरों द्वारा “सूरत सन्धि” को मान्यता दिये जाने के बाद फरवरी 1775 ई. में अंग्रेज सेना कर्नल कीटिंग के नेतृत्व में रघुनाथ राव को साथ लेकर पूना की ओर बढ़ी। 18 मई 1775 ई. में “आरस के मैदान” में अंग्रेज तथा मराठा सेना के बीच युद्ध प्रारम्भ हुआ। इससे पहले कि युद्ध का कोई निर्णय आता, कलकत्ता उच्च परिषद ने इस युद्ध की वैधता को नकार दिया और सूरत की सन्धि को अमान्य कर दिया। इसके पश्चात कलकत्ता से कर्नल अप्टन को पूना भेजा गया। जिसके बाद अंग्रेजों तथा पूना दरबार के प्रतिनिधि नाना फड़नवीस के मध्य 1 मार्च 1776 ई. में “पुरन्दर की सन्धि” सम्पन्न हुई।

पुरन्दर की सन्धि (मार्च 1776 ई.)

1-अंग्रेजों और मराठों में प्रत्येक स्थान पर शान्ति बनी रहेगी।

2-कम्पनी रघुनाथ राव का पक्ष नहीं लेगी किन्तु सालसेट कम्पनी के पास ही रहने दिया जायेगा।

3-पूना दरबार 12 लाख रुपया युद्ध हर्जाने के रूप में देगा।

4-पूना दरबार रघुनाथ राव को 25 हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन के रूप में देगा और वह गुजरात चला जायेगा।

पुरन्दर की सन्धि बम्बई सरकार को स्वीकार न थी वह राघोबा को संरक्षण प्रदान करती रही। कम्पनी के डायरेक्टरों ने भी पुरन्दर की सन्धि को स्वीकार नहीं किया। अतः पुरन्दर की सन्धि को रद्द कर सूरत की सन्धि को पुनः स्वीकार कर लिया गया। फलस्वरूप कम्पनी ने पेशवा के विरुद्ध नवम्बर 1778 ई. में एक सेना भेजी।

पेशवा तथा कम्पनी की सेना के मध्य 9 जनवरी 1779 ई. में तालगांव नामक स्थान पर युद्ध प्रारम्भ हुआ। जिसमें अंग्रेजों ने मात खाई। परिणामस्वरूप 1779 ई. में “बड़गाँव की सन्धि” हुई।

बड़गाँव की सन्धि (1779 ई.)

यह सन्धि कम्पनी की बम्बई सरकार तथा पूना दरबार के मध्य सम्पन्न हुई थी। यह सन्धि अंग्रेजों के लिए अत्यन्त अपमानजनक थी। इसकी शर्तें निम्नलिखित थी।

1- 1773 ई. के बाद अंग्रेजों द्वारा विजित मराठों के सभी प्रदेश उन्हें लौटा दिये गए।

2-कम्पनी ने राघोबा का पक्ष लेना बन्द कर दिया।

3-अंग्रेजों की सहायता के लिए बंगाल से आने वाली सेना को रोक दिया गया।

4-सिंधिया को भड़ौच के राजस्व का कुछ हिस्सा देना स्वीकार किया गया।

वारेन हेस्टिंग्स इस अपमान को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता था। अतः उसने युद्ध जारी रखने का फैसला किया। हेस्टिंग्स ने सेना की दो टुकड़ियों को क्रमशः जनरल गोडार्ड तथा पोफम के नेतृत्व में मराठों के विरुद्ध भेजा।

गोडार्ड ने 15 फरवरी 1780 ई. में अहमदाबाद पर अधिकार कर लिया तथा पोफम ने 3 अगस्त 1781 ई. में ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार 7 वर्षों के युद्ध के बाद अंग्रेजों तथा मराठों के बीच महादजी सिंधिया की मध्यस्थता में 1782 ई. में “सालबाई की सन्धि” हुई।

सालबाई की सन्धि (1782 ई.)

यह सन्धि 17 मई 1782 ई. में सम्पन्न हुई। इसकी प्रमुख शर्तें निम्नलिखित थी।

1-सालसेट तथा एलिफेंटा द्वीप अंग्रेजों को प्राप्त हो गया।

2-अंग्रेजों ने रघुनाथ राव का साथ छोड़ दिया। पेशवा की ओर से उसे पेंशन की व्यवस्था की गई।

3-सिंधिया को यमुना नदी के पश्चिम की समस्त भूमि प्राप्त हो गई।

4-बम्बई तथा दक्षिण में एक दूसरे के जीते गये भू-क्षेत्र एक-दूसरे को वापस मिल गये।

5-इस सन्धि के फलस्वरूप हैदरअली को अर्काट के नवाब से जीती गयी भूमि छोड़नी पड़ी।

वारेन हेस्टिंग्स ने “सालबाई की सन्धि” को आपात काल की सफल “शान्ति वार्ता” कहा। इस सन्धि से मराठों और अंग्रेजों के बीच अगले 20 साल शान्ति रही और  मुगल सम्राट शाहआलम ने बड़ी सरलता से मराठा पेशवा को “वकील-ए-मुतलक” नियुक्त किया।

डाडवेल के अनुसार “सालबाई की सन्धि भारत में अंग्रेजी प्रभुसत्ता के इतिहास को एक नवीन मोड़ देने वाली थी।”

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध

1796 ई. में राघोबा का पुत्र बाजीराव द्वितीय अंग्रेजों की सहायता से पेशवा बना। पेशवा बाजीराव द्वितीय दुर्बल, स्वार्थी और षड्यन्त्रकारी था। वह मराठों का नेतृत्व करने में सर्वथा अयोग्य था।

1800 ई. में नाना फड़नवीस की मृत्यु के बाद बाजीराव द्वितीय नियन्त्रण मुक्त होकर मनमानी करने लगा। अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए वह स्वयं मराठों में आपसी झगड़े करवाने लगा। दौलत राव सिंधिया व जसवन्त होल्कर दोनों पूना में अपने को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शित करना चाहते थे। बाजीराव द्वितीय सिंधिया का साथ देने लगा। दोनों ने 1801 ई. में जसवन्त के भाई की हत्या कर दी।

इसके फलस्वरूप जसवन्त होल्कर ने पूना पर आक्रमण कर 28 अक्टूबर 1802 ई. में पेशवा और सिंधिया की संयुक्त सेना को परास्त कर दिया। पूना पर होल्कर का अधिकार हो गया।

पेशवा बाजीराव द्वितीय ने भागकर बेसीन में शरण ली। यहाँ पर उसने एक जहाज पर 31 दिसम्बर 1802 ई. में अंग्रेजों से “बेसीन की सन्धि” की।

बेसीन की सन्धि (31 दिसम्बर 1802 ई.)

1-बाजीराव द्वितीय तथा अंग्रेजों ने पारस्परिक सुरक्षा के साथ साथ एक दूसरे के मित्रों की सुरक्षा का आश्वासन दिया।

2-पेशवा की सुरक्षा के लिए 60 हजार पैदल सैनिक और तोपखाना आदि अंग्रेजों ने देना स्वीकार किया। इस सेना को पेशवा राज्य में रखने की व्यवस्था की गई।

3-पेशवा ने इस सहायक-सेना के व्यय हेतु 26 लाख रुपये वार्षिक आय की भूमि अंग्रेजों को देना स्वीकार किया।

4-पेशवा किसी भी अंग्रेज शत्रु को अपनी सीमाओं में नहीं रहने देगा।

5-पेशवा सूरत नगर कम्पनी को दे देगा।

6-संधि शर्त के रूप में बाजीराव द्वितीय ने स्वीकार किया कि वह हैदराबाद के निजाम और गुजरात के गायकवाड़ से अपने मतभेदों का निर्णय अंग्रेजों से कराये गा।

7-पेशवा ने अपनी विदेश नीति भी अंग्रेजों के हाथों में सौंप दी।

13 मई 1803 ई. में बाजीराव द्वितीय अंग्रेजों की सहायता से पूना में प्रवेश कर पुनः पेशवा बना। मराठा सरदारों ने ‘बेसीन की सन्धि” के प्रति विरोध जताया और इसे समाप्त करने हेतु युद्ध की तैयारी शुरू कर दी।

सरदेसाई के अनुसार “बेसीन की सन्धि ने शिवाजी द्वारा स्थापित मराठों की स्वतन्त्रता का अन्त कर दिया।” इस सन्धि को लार्ड वेलेजली की महान सफलता कहा गया।

बाजीराव को अपने अधीन करने के बाद अंग्रेज इस बात के लिए प्रयत्न शील हुए कि होल्कर, भोंसले और सिंधिया को भी अपने अधीन कर लें। इसके लिए उन्होंने अपनी कूटनीति से उस पारस्परिक कलह और फूट को बढ़ावा दिया जो मराठा साम्राज्य का सदा से एक गुण रहा था। इधर बाजीराव द्वितीय भी इस सन्धि से खुश नहीं था, उसने यह सन्धि लाचारीबस की थी। अतः उसने मराठा संघ को पुनः संगठित करना आरम्भ कर दिया। सिंधिया और भोंसले पेशवा बाजीराव द्वितीय से मिल गये। किन्तु गायकवाड़ और होल्कर अलग रहे। वेलेजली ने सिंधिया और भोंसले से दूर रहने के लिए कहा। किन्तु उन्होंने इंकार कर दिया।

फलस्वरूप 7 अगस्त 1803 ई. में द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध प्रारम्भ हुआ। अंग्रेजों ने एक ही साथ उत्तरी और दक्षिणी भारत में मराठों के विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ कर दिया। दक्षिणी सेना की कमान ऑर्थर वेलेस्ली तथा उत्तरी सेना की कमान जनरल लेक ने संभाली। दिसम्बर 1803 तक दक्षिण में आर्थर वेलेस्ली ने सिंधिया और भोंसले को क्रमशः असई और अरगांव के युद्धों में पराजित किया।

उत्तर में भी मराठों की पराजय हो रही थी। लेक ने अलीगढ़, दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया। भरतपुर के जाट राजा ने लेक की अधीनता स्वीकार कर ली। लासवाड़ी के युद्ध में सिंधिया को बुरी तरह परास्त होना पड़ा। उड़ीसा, गुजरात और बुन्देलखण्ड में भी मराठों को परास्त होना पड़ा। बाध्य होकर सिंधिया और भोंसले ने कम्पनी के साथ दिसम्बर 1803 ई. में अलग-अलग सन्धियाँ की।

देवगाँव की सन्धि (17 दिसम्बर 1803 ई.)

यह सन्धि रघुजी भोंसले और कम्पनी के बीच हुई थी। इस सन्धि की शर्तें निम्नलिखित थीं।

1-कटक एवं बालासोर अंग्रेजों को दे देना।

2-बंगाल एवं मद्रास प्रेसिडेंसियों को मिलाने के लिए पूर्वी समुद्री किनारे को कम्पनी के अधिकार में दे देना।

3-भोंसले अपनी सेवा से सभी विदेशियों को निकाल देगा।

4-निजाम और पेशवा के साथ अपने मतभेदों को अंग्रेजों की मध्यस्थता से सुलझाना होगा।

5-भोंसले को अपने दरबार में एक अंग्रेज अधिकारी रखना होगा। माउंट स्ट्रीट एलफिन स्टोन को इस पद पर नियुक्त किया गया।

सुर्जी अर्जुन गाँव की सन्धि (30 दिसम्बर 1803 ई.)

यह सन्धि सिन्धिया और अंग्रेजों के मध्य सम्पन्न हुई। इस सन्धि की निम्नलिखित शर्तें थीं।

1-उत्तर में गंगा और यमुना बीच की समस्त भूमि तथा जयपुर, जोधपुर एवं जोहद की समस्त भूमि अंग्रेजों की होगी।

2-इसके अलावा अहमदनगर, भड़ौच, अजन्ता एवं गोदावरी नदी की समस्त भूमि पर भी अंग्रेजों का अधिकार होगा।

3-सिन्धिया किसी भी अंग्रेज शत्रु को अपने राज्य में नहीं रखेगा।

4-सिन्धिया ने अपने राज्य में एक अंग्रेज रेजीडेण्ट रखना स्वीकार किया। उसके यहाँ प्रथम अंग्रेज रेजीडेण्ट मेजर माल्कम नियुक्त किया गया।

5-बेसीन की सन्धि को सिन्धिया द्वारा स्वीकृति दे दी गई।

इस सन्धि के अतिरिक्त सिन्धिया ने 27 फरवरी 1804 ई. में बुरहानपुर की सहायक सन्धि पर भी हस्ताक्षर किये। जिसके अनुसार किसी भी प्रकार के युद्ध में दोनों एक दूसरे की सहायता करेंगे।

सिन्धिया और भोंसले के पश्चात वेलेजली ने जसवन्तराव होल्कर से सहायक सन्धि प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए कहा, किन्तु होल्कर ने अस्वीकार कर दिया और अंग्रेजों के मित्र जयपुर राज्य में लूटपाट करना आरम्भ कर दिया। अतः अप्रैल 1804 ई. में वेलेजली ने होल्कर के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध होल्कर की पराजय हुई। उसने भागकर भरतपुर में शरण ली।

अंग्रेज जनरल लेक ने भरतपुर पर चार बार आक्रमण किया किन्तु सफलता नहीं मिली। अभी युद्ध चल ही रहा था कि 1805 ई. में वेलेजली को इंग्लैंड वापस बुला लिया गया और द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध का अन्त हो गया।

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध

1813 ई. में लार्ड हेस्टिंग्स भारत में गवर्नर जनरल बनकर आया। उसने मराठा साम्राज्य को पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया और राजपूत राज्यों पर अंग्रेजी संरक्षण स्थापित करने की योजना बनायी। किन्तु इस मार्ग की सबसे बड़ी बाधा 1805-06 ई. में की गई सन्धियाँ थीं। जिनके अनुसार राजपूत राज्यों को सिन्धिया और होल्कर के प्रभाव में मान लिया गया था।

अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु अंग्रेजों ने 5 नवम्बर 1817 ई. में सिन्धिया के साथ “ग्वालियर की सन्धि” की। जिसकी शर्तें थीं- सिन्धिया पिडारियों के दमन में अंग्रेजों का सहयोग करेगा और चम्बल नदी के दक्षिण पश्चिम के राज्यों के राजपूत राजाओं से अपना प्रभाव हटा लेगा। अब अंग्रेज राजपूत राजाओं से कोई भी सन्धि स्वतन्त्र रूप से कर सकते थे।

इसके बाद अंग्रेजों ने पेशवा साथ 13 जून 1817 ई. में “पूना की सन्धि” की। जिसके तहत पेशवा को मराठा संघ की अध्यक्षता त्यागिनी पड़ी और कुछ सामरिक महत्व के क्षेत्र अंग्रेजों को देने पड़े। इन सन्धियों से पहले ही अंग्रेजों ने 27 मई 1816 ई. में भोंसले से “नागपुर की सहायक सन्धि” कर ली थी।

कालान्तर में पेशवा, भोंसले तथा होल्कर ने सन्धि का उल्लंघन करते हुए, अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

फलस्वरूप किरकी में पेशवा, सीताबाल्डी में भोंसले और महीदपुर में होल्कर की सेनाओं को अंग्रेज सेना से पराजित होना पड़ा। इन संघर्षों के बाद मराठों की सैन्य शक्ति समाप्त हो गई। 6 जनवरी 1818 ई. में होल्कर ने अंग्रेजों से “मन्दसौर की सन्धि” की। जिसके अनुसार उसने राजपूत राजाओं से अपना नियन्त्रण हटा लिया तथा सहायक सन्धि स्वीकार कर ली।

पेशवा बाजीराव द्वितीय लड़ता रहा। लेकिन वह कोरेगांव और अष्टी के युद्धों में पराजित हो गया। बाध्य होकर उसने 3 जून 1818 ई. में जॉन मेल्कम के सामने आत्म समर्पण कर दिया। अंग्रेजों ने पेशवा पद को ही समाप्त कर दिया और बाजीराव द्वितीय को 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर कानपुर के निकट बिठूर भेज दिया। जहाँ उसकी 1853 ई. में मृत्यु हो गई। मराठों के पतन में सर्वाधिक योगदान बाजीराव द्वितीय का ही था।

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