आर्यों का मूल निवास स्थान

सिंधु सभ्यता के पतन के बाद जो नवीन संस्कृति प्रकाश में आयी उसके विषय में जानकारी वेदों से प्राप्त होती है। इसलिए इस संस्कृति को वैदिक संस्कृति के नाम से जाना जाता है। चूँकि इस संस्कृति के प्रवर्तक आर्य लोग थे। इसलिए इसे “आर्य सभ्यता” भी कहा जाता है।

वैदिक शब्द वेद से बना है। वेद का अर्थ होता है-ज्ञान। वैदिक संस्कृति के निर्माता आर्य थे। आर्य एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ “श्रेष्ठ” या “कुलीन” होता है।

आर्यों को लिपि का ज्ञान नहीं था। अतः वे अपने ज्ञान को सुनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते थे। इसलिए वैदिक साहित्य को “श्रुति साहित्य” भी कहा जाता है।

आर्यों का मूल निवास स्थान

आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। भगवान दास आडवानी ने अपनी पुस्तक “Return of the Aryans” में आर्यों का मूल निवास स्थान भारत बताया है। जबकि अन्य विद्वानों जैसे-

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

डॉ. अविनाश चन्द्र दास ने अपनी पुस्तक “Rigvadic India” में सप्त सैन्धव प्रदेश को आर्यों का मूल निवास स्थान बताया है।

पण्डित गंगाधर झा ने ब्रह्मर्षि देश को आर्यों का मूल निवास स्थान माना है।

डॉ. राजबली पाण्डेय ने मध्य देश को आर्यों का मूल निवास स्थान माना है।

एल. डी. कल्ला ने कश्मीर अथवा हिमालय को आर्यों का मूल निवास स्थान माना है।

D. S. त्रिवेदी का मत है कि आर्य देविका प्रदेश (मुल्तान) के निवासी थे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुसार आर्य तिब्बत क्षेत्र के निवासी थे। उन्होंने अपनी पुस्तक “सत्यार्थ प्रकाश” में इसका उल्लेख किया है।

मैक्स मूलर तथा J. G. रीड ने मध्य एशिया में बैक्ट्रिया को आर्यों का मूल निवास स्थान बताया है।

पण्डित गंगाधर तिलक ने उत्तरी ध्रुव को आर्यों का मूल निवास स्थान माना है। इसका उल्लेख उनकी पुस्तक “The Arctic Home of the Aryans” में मिलता है।

आर्यों के मूल निवास स्थान के सम्बन्ध में सर्वाधिक प्रमाणित मत आल्प्स पर्वत के पूर्वी भाग में स्थित “यूरेशिया” का है।

आर्यों का भौगोलिक क्षेत्र

भारत में आर्यों का आगमन 1500 ईसा पूर्व के आसपास हुआ। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की चार नदियों कुभा, क्रुमु, गोमती और सुवास्तु का उल्लेख मिलता है। इसी तरह ऋग्वेद में सप्त सैन्धव प्रदेश का वर्णन मिलता है। यह सात नदियों सिन्धु, सरस्वती, शतुद्रि, विपासा, परुषणी, वितस्ता, अस्किनी से घिरा क्षेत्र है। इससे स्पष्ट है कि आर्य सर्वप्रथम पंजाब और अफगानिस्तान क्षेत्र में बसे थे।

वैदिक साहित्य का इतिहास

इसके पश्चात आर्य पूर्व की बढ़े और कुरुक्षेत्र के निकट के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया तथा इस क्षेत्र का नाम ब्रह्मावर्त रखा।

ऋग्वेद में गंगा नदी का एक बार तथा यमुना नदी का तीन बार उल्लेख हुआ है। इसी तरह ऋग्वेद में कश्मीर की एक नदी “मरुद् वृधा” का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में हिमालय की एक चोटी मूजवन्त का भी उल्लेख मिलता है। यहाँ से आर्य लोग सोम प्राप्त करते थे।

इस प्रकार ऋग्वैदिक आर्यों का भौगोलिक क्षेत्र पश्चिम में अफगानिस्तान से पूर्व में गंगा के पश्चिमी तट तक तथा उत्तर में पश्चिमी हिमालय से दक्षिण में राजस्थान की उत्तरी सीमा तक था।

इसके बाद उत्तर वैदिक आर्यों ने इस क्षेत्र में विस्तार किया। उनके विस्तार का वर्णन “शतपथ ब्राह्मण” में मिलता है। इन्होंने ने ब्रह्मावर्त से आगे बढ़कर गंगा-यमुना दोआब तथा आसपास के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और इस क्षेत्र का नाम “ब्रह्मर्षि देश” रखा।

हिमालय तथा विन्ध्याचल के मध्य क्षेत्र पर अधिकार करके इसका नाम “मध्य देश” रखा। कालान्तर में आर्यों ने बिहार तथा बंगाल के दक्षिण पूर्वी क्षेत्रों पर भी अधिकार कर लिया इस प्रकार सम्पूर्ण उत्तर भारत उनके अधिकार में आ गया। जिसका नाम उन्होंने “आर्यावर्त” रखा।

वैदिक नदियाँ

वैदिक संहिताओं में कुल 31 नदियों का उल्लेख मिलता है। जिनमें से 25 का उल्लेख ऋग्वेद में है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख किया गया है। जिसमें सिंधु नदी का सर्वाधिक बार उल्लेख हुआ है। आर्यों की सबसे पवित्र नदी “सरस्वती नदी” थी। सरस्वती नदी को ऋग्वेद में “नदीत्मा” कहा गया है।

आर्य कालीन प्रमुख नदियां

प्राचीन नाम                      आधुनिक नाम 

वैदिक काल का जीवन

क्रुमु                              कुर्रम

कुभा                             काबुल

वितस्ता                          झेलम

आस्किनी                        चिनाव

परुषणी                          रावी

शतुद्रि                            सतलज

विपाशा                          व्यास

सदानीरा                         गण्डक

दृषद्वती                           घग्घर

गोमती                            गोमल

सुवास्तु                            स्वात

सुषोमा                             सोहन

मरुद् वृधा                        मरुवर्मन