अधिगम की प्रक्रिया-learning process

अधिगम एक मानसिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन में लगातार चलती रहती है। चूँकि अधिगम की प्रक्रिया कुछ हद तक स्थितियों पर निर्भर होती है, इसलिये जिस विधि व जिस परिस्थिति में सिखाया जाए उसे अनुकूल होना चाहिए। इसके साथ-साथ सीखने वाला और सिखाने वाला भी सही परिस्थितियों के लिए सहायक हो। अतः अधिगम की प्रक्रिया को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है-

 

अधिगम, संसार में हमारे चारों ओर क्या घटित हो रहा है, इसके द्वारा , हमें क्या करना है और हमें क्या अवलोकन करना है, इन सब के द्वारा रूपान्तरित होने की एक प्रक्रिया है।

अधिगम एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यवहार को मूलभूत किया जाता है या प्रशिक्षण विधि के द्वारा परिवर्तन होता है।

अधिगम एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति विभिन्न आदतें, ज्ञान और प्रवृत्ति प्राप्त करता है, जिनका सामान्य रूप से जीवन की माँग के अनुसार मिलना आवश्यक होता है।

अधिगम व्यक्तित्व में पूर्णतया परिवर्तन कर देता है और उसके प्रदर्शन में परिवर्तन की चमक दिखाई देती है अक्सर ये अभ्यास के द्वारा आता है फिर भी यह अन्तर्दृष्टि से या अन्य कारकों या स्मरण से पैदा हो सकता है।

अधिगम की प्रक्रिया के अवयव

किसी बात को सीखने या सिखाने की जरूरत– इस पर गहराई से विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि आवश्यक तत्त्व मनोविज्ञान पर निर्भर है, क्योंकि हम प्रायः उसी बात को महत्व देते हैं जो हमारे लिए उपयोगी है। हम यह भी कह सकते हैं कि जिस बात की हमें आवश्यकता है, उसे सीखना हमारे लिए महत्वपूर्ण है। इस प्रकार जब हमने किसी बात को सीखने अथवा सिखाने का निश्चय कर लिया हो तो हम उसे सीखने अथवा सिखाने के लिए तैयार हो जाएँगे और उस स्थिति में सीखने की प्रक्रिया का दूसरा तत्त्व होगा लक्ष्य निर्धारण।

लक्ष्य निर्धारण– शिक्षक जब किसी बात की आवश्यकता अनुभव करता है, तब उसे सिखाने का लक्ष्य निर्धारित करता है, परन्तु जब विद्यार्थी किसी बात की आवश्यकता अनुभव करते हुए उसे सीखने के लिए तैयार हो जाता है, तब वह उसे सीखने का अपना लक्ष्य निर्धारित करता है। अतः लक्ष्य, निर्धारण जहाँ शिक्षक की दृष्टि से दूसरा तत्त्व है, उसे ही विद्यार्थी की दृष्टि से तीसरा तत्त्व माना जायगा।

उद्देश्य को निर्धारित करना और उसको पूरा करना, दोनों अलग-अलग बात हैं। केवल लक्ष्य निर्धारित करने से कोई काम नहीं चलता, अगर उसे प्राप्त नहीं किया जाए। अतः लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु हमें दोनों ही ओर से उचित परिस्थितियों का निर्माण करना पड़ता है। इस दृष्टि से सीखने की प्रक्रिया का तीसरा तत्त्व हुआ तत्परता।

तत्परता– अधिगम से पूर्व जो सीखना है, उसका उद्देश्य निर्धारित कर लेना चाहिए। जिससे कि हमारा हर प्रयत्न अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर उन्मुख हो।

परिस्थिति निर्माण– वैसे तो परिस्थिति का निर्माण अध्यापक करते हैं, परन्तु इसका प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ता है। उसे विचार करना पड़ता है कि मैं कौन-सी बात किस ढंग से कहूँ कि बालक सिखाई जाने वाली बात को अधिक से अधिक एवं सरलता से और सफलतापूर्वक सीख जाएँ। सीखने के जो भी सिद्धान्त हैं, उनका अनुसरण भी उसे उसी समय करना पड़ता है। परिस्थिति निर्माण को ही हम वातावरण का निर्माण भी कह सकते हैं। बालक उस समय ज्यादा सीखता है, जब विद्यालय में उसे परिवार जैसा माहौल मिलता है और अध्यापक उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार अपनाते हैं।

अधिगम की प्रक्रिया की विशेषताएं

अधिगम एक सतत् प्रक्रिया है– बचपन से ही प्रत्येक मनुष्य अपने व्यवहार, सोच, प्रवृत्ति, रुचि आदि से अपने व्यवहार में परिवर्तन की कोशिश करता है वह ऐसा जीवन की परिवर्तनशील स्थितियों में स्वयं को निरन्तर समायोजित रखने के लिए करता है।

अधिगम एक प्रत्यक्ष लक्ष्य है– प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने की अभिलाषा करता है। इन लक्ष्यों को अधिगम के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। यदि प्राप्त करने के लिए कोई उद्देश्य नहीं है, तब वहाँ अधिगम की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

अधिगम सुविचारित है– जब कोई अपने लिए लक्ष्य निर्धारित करता है तब वह लक्ष्य प्राप्त करने के लिए जानबूझकर कुछ क्रियाकलाप करता है यदि उसके पास लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कोई सुविचार नहीं है या वह इसके बारे में बिल्कुल शांत है, तब उसका लक्ष्य तक पहुँचना मुश्किल है, इसका तात्पर्य है कि उसका अधिगम कमजोर है।

अधिगम एक सक्रिय प्रक्रिया है– कुछ सीखने के लिए शारीरिक, मानसिक या दोनों प्रकार के कुछ क्रियाकलाप करने की आवश्यकता होती है। नए अनुभवों को सीखने के लिए मस्तिष्क का सक्रिय होना आवश्यक है अन्यथा अधिगम संभव नहीं होगा।

अधिगम व्यक्तिवादी प्रक्रिया है– किसी भी कक्षा में कुछ बच्चे अधिक शीघ्रता से सीखते हैं और अन्य धीरे-धीरे सीखते हैं। वास्तव में विभिन्न व्यक्तियों की अधिगम की गति भिन्न-भिन्न होती है।

अधिगम एक व्यक्ति की वातावरण के साथ परस्पर क्रिया का परिणाम है– एक शिक्षक के रूप में, बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए सावधानी पूर्वक वातावरण का संगठन करना चाहिए, प्रायः जब वे आपस में अपने साथियों से परस्पर क्रिया करते हैं तथा शिक्षण अधिगम सामग्री से परस्पर क्रिया करते हैं।

अधिगम स्थानान्तरणीय है– एक स्थिति में किया गया अधिगम अन्य स्थितियों में समस्या हल करने में उपयोगी हो सकता है। गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और भाषा का अधिगम बच्चों के वास्तविक जीवन में विभिन्न क्रियाकलापों के प्रदर्शन में उनकी सहायता करता है।

अधिगम निरन्तर प्रक्रिया– व्यक्ति के जीवन में, चाहे वह घर, समाज या संगठन में रहे, सीखने की क्रिया निरन्तर चलती रहती है। सीखने का कोई निश्चित समय या उम्र नहीं होती है।

प्रबलीकरण (Reinforcement)- अनुभव अथवा अभ्यास का सुदृढ़ीकरण (प्रबलन) आवश्यक है। यदि अनुभव या अभ्यास का पुनर्बलन (Reinforce) नहीं हुआ तो सीखा हुआ व्यवहार अन्ततः मिट जायेगा। किसी क्रिया के प्रबलीकरण के लिए पुरस्कार, दण्ड या कार्य की आवृत्ति होना आवश्यक है।

अधिगम के अनेकों रूप– सीखने की क्रिया के विभिन्न स्वरूप एवं प्रकार हैं। ‘सीखना’ प्रत्यक्ष रूप से या अपने आदर्श के अनुसार अथवा स्व-नियन्त्रण द्वारा हो सकता है। इस प्रकार सीखने के विभिन्न सैद्धान्तिक आधार हैं।

अधिगम की प्रक्रिया दिखाई नहीं देती– सीखने की क्रिया आन्तरिक एवं मनोवैज्ञानिक है जो बाद में व्यवहार में बाह्य रूप से प्रकट होती है। अतः सीखना दिखाई नहीं देता। हम केवल परिवर्तन घटते देख सकते हैं, स्वयं सीखने की क्रिया को नहीं। वास्तव में सीखने की अवधारणा सैद्धान्तिक है, अतः यह प्रत्यक्ष रूप से अवलोकन योग्य नहीं है।

अधिगम का अर्थ एवं परिभाषाएं

अधिगम की प्रकृति

अधिगम की विशेषताएं

अधिगम के प्रकार

अधिगम की प्रमुख विधियां