बहादुरशाह प्रथम

बहादुरशाह प्रथम 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। इसे मुअज्जम और शाह आलम नाम से भी जाना जाता है।

इतिहासकार खफी खाँ ने इसे “शाहे बेखबर” की उपाधि दी। औरंगजेब के समय में मुअज्जम पेशावर का सूबेदार था। 3 मार्च 1707 में औरंगजेब की मृत्यु का समाचार सुनकर मुअज्जम पेशावर से आगरा की और रवाना हुआ।

रास्ते में मई 1707 में शाहदौला नामक पुल पर इसने स्वयं को सम्राट घोषित किया और बहादुरशाह की उपाधि धारण की। उत्तराधिकार को लेकर मुअज्जम को अपने छोटे भाइयों आजमशाह तथा कामबख्स से युद्ध करना पड़ा।

पहला युद्ध मुअज्जम तथा आजमशाह में मध्य 12 जून 1707 को सामूगढ़ के समीप जजाओं नामक स्थान पर हुआ। जिसमें मुअज्जम की विजय हुई।

दूसरा युद्ध 13 जनवरी 1709 को मुअज्जम तथा कामबख्स में बीच हैदराबाद के नजदीक हुआ। इस युद्ध में भी मुअज्जम विजयी रहा। मुअज्जम बहादुरशाह प्रथम की उपाधि के साथ दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।

औरंगजेब के जीवित पुत्रों में बहादुरशाह सबसे ज्येष्ठ पुत्र था। इसका जन्म 1643 ई. में राजौरी के राजा राजू की पुत्री नवाब बाई के गर्भ से हुआ था। जिस समय बहादुरशाह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा उस समय उसकी आयु 63 वर्ष थी।

बहादुरशाह एक सक्रिय राजा की भाँति कार्य नहीं कर पाया। इसने दरबारी गुटों का सहयोग प्राप्त करने के लिए “शान्तिपूर्ण मैत्री की नीति” अपनाई।

1711 ई. में “जोसुआ केटेलर” के नेतृत्व डच शिष्ट मण्डल का बहादुरशाह के दरबार में आना एक महत्वपूर्ण घटना थी।इस शिष्ट मण्डल का स्वागत पुर्तगाली स्त्री “जुलियाना” ने किया था। जुलियाना को बीबी, फिदवा आदि नामों से भी जाना जाता है।

बहादुरशाह प्रथम की नीतियां

जब जोधपुर के शासक राणा अजीतसिंह ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित किया और मुगल प्रदेश पर आक्रमण कर दिया। तब बहादुरशाह पहले आमेर गया तथा विजयसिंह को आमेर का राजा घोषित किया। वहां से जोधपुर गया तथा अजीतसिंह को परास्त किया और क्षमा प्रदान की।

बहादुरशाह ने अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा बनाया तथा 3500 का मनसब तथा महाराज की उपाधि प्रदान की। इसके बाद बहादुरशाह कामबख्स के विरुद्ध दक्षिण की ओर चला गया। तब अजीतसिंह तथा दुर्गादास ने आमेर के राजा विजय सिंह को परास्त कर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया।

जब बहादुरशाह दक्षिण में था तब मेवाड़ के राजा अमरजीत सिंह के नेतृत्व में अजीतसिंह, दुर्गादास तथा कछवाह राजा जयसिंह ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर लिया।

अतः बहादुरशाह को पुनः राजपूताना जाना पड़ा। किन्तु इस बार उसने युद्ध करने से बेहतर सन्धि करना समझा और इन शासकों की स्वतंत्रता को मान्यता दे दी। इस प्रकार उसने हिन्दू सरदारों और राजाओं के प्रति सहष्णुता की नीति अपनाई।

बहादुरशाह प्रथम की मराठों के प्रति नीति

बहादुरशाह की मराठों के प्रति नीति “अस्थिर” रही। बहादुरशाह ने जुल्फिकार खां के प्रस्ताव पर 1689 से मुगलों के पास कैद शिवाजी के पौत्र साहू को 1707 में मुक्त कर दिया। और महाराष्ट्र जाने की अनुमति दे दी और उसे दक्कन की सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार प्रदान किया। किन्तु चौथ वसूलने के अधिकार को स्वीकार्य नहीं किया। अर्थात उसने शाहू को विधिवत राजा नहीं माना। इस प्रकार उसने ताराबाई और शाहू को आपस में लड़ने के लिए छोड़ दिया। जिससे मराठा असन्तुष्ट रहे। अतः उन्होंने मुगल सीमाओं पर आक्रमण करने की प्रथा की नींव डाली। जिससे दक्कन अव्यवस्था का शिकार हुआ।

औरंगजेब द्वारा लगाई गई जजिया की वसूली बहादुरशाह ने बन्द कर दी। (जजिया- एक प्रकार का धार्मिक कर जो गैर मुस्लिमों से लिया जाता था।)

बहादुरशाह की सिक्खों के प्रति नीति

बहादुरशाह ने गुरु गोविन्द सिंह के साथ सन्धि कर सिक्खों से मेल मिलाप की कोशिश की। क्योंकि उत्तराधिकार के युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह ने बहादुरशाह की सहायता की थी। किन्तु 1708 में गुरु गोविन्द सिंह की मृत्यु के बाद सिक्ख नेता बन्दाबहादुर ने मुगलों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसने अपने आप को सच्चा बादशाह घोषित किया।

बन्दाबहादुर ने एक स्वतन्त्र सिक्ख राज्य की स्थापना की तथा गुरु नानक और गुरु गोविन्द सिंह नाम के सिक्कें जारी किये। बन्दाबहादुर की सबसे महत्वपूर्ण विजय 1710 में सरहिन्द की विजय थी।

बहादुरशाह ने सिक्ख नेता बन्दाबहादुर को दण्ड देने के लिए 1710 में सधौरा में घेरा डाला। बन्दा भागकर लौहगढ़ किले में आ गया। बहादुरशाह ने लौहगढ़ किले पर कड़े संघर्ष के बाद कब्जा कर दिया। किन्तु बन्दा वहाँ से भी भाग निकला। इस प्रकार 1711 में मुगलों ने पुनः सरहिन्द पर कब्जा कर लिया।

27 फरवरी 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु के बाद बन्दाबहादुर ने पुनः लौहगढ़ और सधौरा पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार बहादुरशाह सिक्खों को मित्र नहीं बना सका और न ही कुचल सका।

बहादुरशाह ने बुंदेला सरदारों एवं जाट सरदारों से भी मित्रता की नीति अपनाई। फलतः बुंदेला सरदार छत्रसाल निष्ठावान रहा जबकि जाट सरदार चूड़ामन ने बन्दा के खिलाप अभियान में मुगलों का साथ दिया।

बहादुरशाह ने मीरबख्सी के पद पर आसीन जुल्फिकार खाँ को दक्कन की सूबेदारी प्रदान की। इस प्रकार उसने एक ही अमीर को एक साथ दो महत्वपूर्ण पद प्रदान करने की भूल की।

बहादुरशाह के समय में वजीर के पद के सम्मान में वृद्धि हुई। जिसके कारण वजीर पद प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्द्धा बढ़ गई। 27 फरवरी 1712 ई. में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई।

प्रसिद्ध लेखक सर सिडनी ओवन ने बहादुरशाह की मृत्यु लिखा कि “यह अन्तिम मुगल सम्राट था जिसके विषय में कुछ अच्छे शब्द कहे जा सकते हैं। इसके पश्चात मुगल साम्राज्य का तीव्रगामी और पूर्ण पतन मुगल सम्राटों की राजनैतिक तुच्छता और शक्तिहीनता का द्योतक था”। बहादुरशाह के शव को औरंगजेब के मकबरे के आंगन में दफनाया गया।