बालक में संवेगात्मक विकास, विशेषताएं, और प्रभावित करने वाले कारक-Emotional Development, Characteristics, and Influencing Factors in Child

जीवन में संवेगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तथा व्यक्ति के वैयक्तिक एवं सामाजिक विकास में संवेगों का योगदान होता है। संवेगों के विकास के सन्दर्भ में दो मत हैं-

1-संवेग जन्मजात होते हैं

इस मत को मानने वालों में वेकविन तथा हालिंगवर्थ आदि हैं। हालिंगवर्थ का मानना है कि प्राथमिक संवेग जन्मजात होते हैं। वाटसन ने बताया कि जन्म के समय बच्चे में तीन प्राथमिक संवेग भय, क्रोध व प्रेम होते हैं।

 

2-संवेग अर्जित किए जाते हैं

कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि संवेग विकास एवं वृद्धि की प्रक्रिया के दौरान प्राप्त किए जाते हैं। इस सम्बन्ध में हुए प्रयोग स्पष्ट करते हैं कि जन्म के समय संवेग निश्चित रूप से विद्यमान नहीं होते हैं। बाद में धीरे-धीरे बच्चा ऐसी निश्चित प्रतिक्रियाएँ करता है जिससे ज्ञात होता है कि उसे सुखद व दुखद अनुभूति हो रही है।

संवेगों की विशेषताएं

संवेगात्मक अनुभव किसी मूल प्रवृति या जैविकीय उत्तेजना से जुड़े होते हैं।

सामान्यतः संवेग प्रत्यक्षीकरण का उत्पाद होते हैं।

प्रत्येक संवेगात्मक अनुभव के दौरान प्राणी में अनेक शारीरिक परिवर्तन होते हैं।

संवेग किसी स्थूल वस्तु या परिस्थिति के प्रति अभिव्यक्त किए जाते हैं।

प्रत्येक जीवित प्राणी में संवेग होते हैं।

विकास के सभी स्तरों में संवेग होते हैं और बच्चे व बूड़ों में उत्पन्न किए जा सकते हैं।

एक ही संवेग को अनेक प्रकार के उत्तेजनाओं से उत्पन्न किया जा सकता है।

संवेग शीघ्रता से उत्पन्न होते हैं और धीरे-धीरे समाप्त होते हैं।

बालकों के संवेगों की विशेषताएं

बालकों के संवेग थोड़े समय के लिए होते हैं बालक अपने संवेगों की अभिव्यक्ति बाहरी व्यवहार द्वारा तुरन्त कर देते हैं जब कि बड़े होने पर बाहरी व्यवहार पर सामाजिक नियन्त्रण होता है।

बालकों के संवेग तीव्र होते हैं। बालक डर, क्रोध व खुशी आदि की अभिव्यक्ति अत्यधिक तीव्रता से करते हैं।

बालकों के संवेग अस्थिर होते हैं। बच्चों के संवेगों में शीघ्रता से बदलाव होता है जैसे- अभी लड़ाई और थोड़ी ही देर में तुरन्त दोस्ती कर लेते हैं।

बच्चों के संवेग बार-बार दिखाई देते हैं क्योंकि वे अपने संवेगों को छिपाने में असमर्थ होते हैं। बच्चे दिन में अनेक बार गुस्सा करते हैं या खुश होते हैं।

बच्चों की संवेगात्मक प्रतिक्रिया में भिन्नता पाई जाती है एक ही संवेग की अवस्था में प्रत्येक बच्चा अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है- जैसे अजनबी के सामने एक बच्चा भाग जाएगा व दूसरा रोने लगेगा।

बालकों में उत्पन्न होने वाले प्रमुख संवेग

डर– प्रथम वर्ष के अंत तक डर से सम्बन्धित उत्तेजनाएं बालक पर प्रभाव डालने लगती हैं और समय के साथ उन वस्तुओं की संख्या बढ़ती जाती है जो बालक को डराती हैं। मानसिक विकास के साथ-साथ वह इस योग्य होता है कि उन वस्तुओं और व्यक्तिओं को पहचान सके जो उसे डराती हैं। डर चाहे तार्किक हो या अतार्किक इसकी जड़ बालकों के अनुभवों में होती हैं। छोटा बच्चा सामान्यतः जोर की आवाज, अजनबी-लोग, जगह, वस्तुएँ, अंधेरी जगह व अकेले रहने से डरते हैं। यह डर अवस्था के साथ-साथ कम हो जाता है।

डर के प्रति बच्चे की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी शारीरिक व मानसिक दशा क्या है। यदि बच्चा थका हुआ है तो ऐसी स्थितियाँ डर को और बढ़ाती हैं। बोस्ट्न ने अपने अध्ययनों में पाया कि बुद्धिमान बच्चे डर अधिक प्रदर्शित करते हैं क्योंकि वे खतरे की सम्भावनाओं को समझते हैं। डर तब उपयोगी होता है जब यह खतरे से सावधान करता है।

क्रोध– यह संवेगात्मक प्रतिक्रिया बच्चे ज्यादा प्रदर्शित करते हैं क्योंकि वातावरण में क्रोध दिलाने वाले उत्तेजक डर की अपेक्षा अधिक होते हैं। अधिकतर बच्चे शीघ्र ही यह समझ जाते हैं कि क्रोध ध्यान आकृष्ट करने का अच्छा तरीका है। इससे उनकी इच्छा की पूर्ति होती है।

छोटे बालक को आराम न मिलने पर क्रोध आता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है तो वह स्वयं काम करना चाहता है और कार्य न कर पाने पर गुस्सा दिखाता है। विद्यालय जाने से पूर्व की आयु के बच्चे उन पर गुस्सा करते हैं जो उनके खेल की चीजों को छूते हैं व उनके खेलने में बाधा उत्पन्न करते हैं।

उत्तर बाल्यावस्था में बच्चे की मजाक उड़ाने, उनकी गलती निकालने व दूसरे बच्चों से तुलना करने पर उनको गुस्सा आता है। क्रोध को अभिव्यक्त करने का ढंग वातावरण से सीखा जाता है।

ईर्ष्या– ईर्ष्या बच्चे तब दिखाते हैं जब प्यार की कमी के लिए वास्तव में कोई स्थिति जिम्मेदार होती है या बालक प्यार की कमी महसूस करता है। ईर्ष्या इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरे उससे कैसा व्यवहार करते हैं व बच्चे को कैसा प्रशिक्षण मिला है। कभी-कभी माता-पिता दूसरों की प्रशंसा अत्याधिक करते हैं उस प्रकार वे अपने बच्चों में प्रतिद्वन्दिता व स्पर्धा उत्पन्न करते हैं। ईर्ष्या की स्थिति में बच्चे विभिन्न प्रतिक्रिया देते हैं-

गुस्सा करना– बालक द्वारा गुस्सा दो प्रकार से प्रकट की जा सकती है- प्रथम प्रत्यक्ष रूप से इसमें बालक को जिससे ईर्ष्या होती है उसके रास्ते में मिल जाने पर प्रहार करना। दूसरा अप्रत्यक्ष रूप से इसमें बालक को जिससे ईर्ष्या होती है उसकी अनुपस्थिति में उसके बस्ते से उसकी कॉपी या किताब चुरा लेना।

आत्मीकरण करना– जिससे ईर्ष्या होती है उससे बालक आत्मीकरण कर लेता है।

दमन– बालक अपनी भावनाओं को यह कहते हुए दबा देता है कि मैं परवाह नहीं करता

मार्गान्तीकरण– यदि छात्र पढ़ने में तेज बालक से ईर्ष्या करता है तो वह खेल में स्वयं को आगे कर लेता है।

हर्ष, सन्तोष तथा सुख– ये तीनों सुखद संवेग हैं। इनमें मात्रा का अन्तर है। ये निश्चयात्मक संवेग है। क्योंकि व्यक्ति उस परिस्थिति को स्वीकार करता है जो इस संवेग को उत्पन्न करती है। छोटे बच्चों में ये संवेग शारीरिक कष्ट न होने पर देखा जाता है। बड़े बच्चों को सन्तोष व हर्ष तब होता है जब उन्हें सफलता मिलती है, दूसरों से प्रशंसा मिलती है व दूसरों से उच्चता या श्रेष्ठता का अनुभव होता है।

स्नेह– बालक, स्नेह किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति दिखाते हैं। छोटे बच्चे उनके प्रति स्नेह दिखाते हैं जो उनकी आवश्यकताओं की परवाह करते हैं, उनसे खेलते हैं, सामान्यतः जो उन्हें हर्ष एवं सन्तोष प्रदान करते हैं। परिवार के सदस्यों एवं ऐसे लोग जिनसे खून का सम्बन्ध नहीं है, बच्चा स्नेह दिखाएगा या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे के प्रति इन लोगों का व्यवहार कैसा है।

उत्सुकता व कौतुहल– छः से सात महीने के बाद बच्चे नई चीजों को पकड़ना चाहते हैं। पकड़ने के बाद सब तरफ से देखकर, छूकर, पटककर, हिलाडुला कर, मुँह में डालकर विभिन्न इन्द्रिय ज्ञान प्राप्त करते हैं। जैसे ही बच्चे बोलना सीखते हैं वे अपने कौतुहल को प्रश्न पूछकर कौतुहल को शान्त करते हैं आठ से नौ वर्ष के बच्चे इसी इच्छा के कारण अपना अधिक समय पढ़ने में लगाते हैं।

किशोर में उत्पन्न होने वाले प्रमुख संवेग

डर– किशोर सामाजिक परिस्थितियों, अपरिचित व्यक्तियों एवं नई स्थिति में जाने से डरते हैं। डर की अभिव्यक्ति में लिंग भेद पाया जाता है। क्योंकि लड़के व लड़कियों के मूल्यों में अन्तर होता है। लड़कियाँ व्यक्तिगत सुरक्षा को विशेष महत्व देती हैं इसलिए अपरिचित के सामने डरती हैं जबकि लड़कों में ऐसा नहीं पाया जाता। डर पर सामाजिक-आर्थिक स्तर का भी प्रभाव पड़ता है।

चिन्ता– चिन्ता डर से उत्पन्न होती है। ये काल्पनिक कारणों से होती है। इसमें वास्तविकता का अंश भी होता है लेकिन ये अनावश्यक रूप से बड़ी छुपी अवस्था है अर्थात् परेशानी अभी है नहीं, लेकिन आ सकती है इस बात की चिन्ता होती है।

चिन्ता किसी वस्तु, व्यक्ति एवं स्थिति से सम्बन्धित हो सकती है। जैसे परीक्षा में अच्छे नम्बर आयेंगे या नहीं, नौकरी मिलेगी या नहीं या फिर दूसरों के सामने बोलने से डरते हैं। लड़के व लड़कियों के मूल्यों में अन्तर अलग-अलग होते हैं। जैसे लड़के नौकरी व व्यवसाय को लेकर चिन्तित होते हैं जबकि लड़कियाँ बाहय आकृति एवं सामाजिक मान्यता को लेकर अधिक चिन्तित रहती हैं।

दुश्चिन्ता– दुश्चिन्ता आन्तरिक द्वन्द्व के कारण उत्पन्न होती है। यह लगातार रहने वाली कष्टकारी मानसिक दशा है। व्यक्ति बेचैनी का अनुभव करता है। उसे यह स्पष्ट नहीं होता है कि वह क्या करें और क्या न करे। जब अनेक चिन्ताएँ एकत्रित होती हैं तो वह दुश्चिन्ता का रूप धारण कर लेती हैं। उदाहरण के लिए यदि किशोर ऐसे सांस्कृतिक समूह में रहता है जहाँ बाह्य आंकृति, प्रसिद्धि, अध्ययन व सम्प्राप्ति को महत्व दिया जाता है और किशोर स्वयं को इन सांस्कृतिक आशाओं के अनुरूप नहीं पाता तो दुश्चिन्ता हो जाती है।

क्रोध– किशोरों को पक्षपातपूर्ण व्यवहार से गुस्सा आता है। यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार घर पर भी हो सकता है। यदि कोई उन पर रोब जमाता है तो गुस्सा आता है। भाई-बहनों द्वारा एक दूसरे का सामान प्रयोग करने पर, व्यंग्यात्मक बातों का प्रयोग करने पर, आदतों में बाधा होने पर, योजना को सफलतापूर्वक सम्पन्न न करने पर क्रोध आता है। क्रोध की अभिव्यक्ति में किशोर चीजों को तोड़ते, फेंकते हैं, तेज बोलते हैं। कभी-कभी बोलना बन्द कर देते हैं।

ईर्ष्या– इसमें दो संवेग शामिल होते हैं। सामाजिक स्तर खोने का डर और क्रोध। किशोरावस्था में ईर्ष्या भाई बहनों के प्रति कम और संगी साथियों के प्रति ज्यादा होती है। जितना अधिक किशोर सामाजिक स्थितियों में असुरक्षा का अनुभव करेगा उतना अधिक उन लोगों से ईर्ष्या करेगा जिनकों सामाजिक मान्यता प्राप्त है। असन्तुष्ट बच्चा ईर्ष्या का शिकार होता है। इस संवेग की अनुभूति पर मौखिक अभिव्यक्ति होती है। जैसे मजाक उड़ाना या व्यंग्य करना।

जलन की भावना– जलन की भावना व्यक्ति की चीजों के प्रति होती है जैसे कोई अमीर घर का लड़का कार में आता है, अच्छे कपड़े पहनता है, अच्छे खिलौने रखता है। तो गरीब घर के लड़के को उसकी इन सुविधाओं से जलन होती है।

नाराज होना– यह गुस्से से कम तीव्र संवेग है। किशोर गुस्से की तुलना में नाराज अधिक होते हैं। किशोर उन चीजों के बारे में बात करके सुख का अनुभव करते हैं। जो उसे नाराज करती हैं। किशोर दूसरे लोगों के भाषण, व्यवहार करने के तरीके से अधिक नाराज होते हैं। किशोर जब आशा के अनुरूप कार्य नहीं कर पाता, उसका समायोजन अच्छा नहीं होता वे नाराज होते हैं।

जिज्ञासा/उत्सुकता– किशोर लिंग, वैज्ञानिक चीजों, संसार की घटनाओं, धर्म व नैतिकता में उत्सुकता दिखाते हैं और इन विषयों पर वे प्रश्न भी करते हैं। वे किताबें, पत्र पत्रिकाएँ पढ़कर अपनी जिज्ञासा को शान्त करते हैं।

स्नेह– यह व्यक्ति, वस्तु या जानवर के प्रति कोमल लगाव है। यह सुखद अनुभवों पर आधारित होता है। किशोरावस्था व बाल्यावस्था के इस संवेग में अन्तर होता है। किशोर स्नेह निर्जीव व जानवरों की तुलना में व्यक्तियों के प्रति अधिक करते हैं। किशोर के लिए स्नेह में भी तीव्रता होती है लेकिन किशोर बच्चों की तरह केवल घर के लोगों से ही स्नेह नहीं करते वरन् संगी, साथी व बाहर के लोगों से भी करते हैं।

दुःख– इस संवेग की अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति ऐसी चीज खो देता है जिसको वो बहुत महत्व देता है तथा उससे उसे संवेगात्मक लगाव होता है। किशोर को इस संवेग का अनुभव बार-बार होता है क्योंकि किशोर में अब सोचने समझने की शक्ति बढ़ जाती है। किशोर बच्चों की तरह रोते नहीं हैं वरन् अपने चारों तरफ के लोगों व चीजों में रूचि नहीं लेते हैं, एकान्त में रहते हैं, भूख कम लगती है व नींद कम आती है। इसका किशोर के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

खुशी– किशोर खुशी का अनुभव तब करता है जब उसका समायोजन अच्छा होता है। प्रशिक्षण व योग्यता से किशोर इस योग्य होता है कि वह परिस्थिति के साथ ठीक से समायोजन कर सके। अच्छा समायोजन व्यक्ति को आत्म सन्तोष देता है। यदि किशोर समाज द्वारा मान्यता प्राप्त कार्यों को सफलतापूर्वक करता है तो उसमें उच्चता की भावना आती है उससे भी उसे सन्तोष मिलता है। अन्ततः वह खुशी का अनुभव करता है।

संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारक

परिपक्वता– व्यक्ति के विकास पर संवेगात्मक विकास निर्भर करता है विशेष रूप से स्नायु तन्त्र के विकास पर। यदि Frontal Lobe को हटा दिया जाए तो संवेगों में स्थिरता नहीं रहती है।

स्वास्थ्य और शारीरिक विकास– बच्चे के स्वास्थ्य, शारीरिक विकास एवं संवेगात्मक विकास में धनात्मक सहसम्बन्ध होता है। स्वास्थ्य में गिरावट से संवेगात्मक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

बुद्धि– हरलोक ने अध्ययनों में पाया कि सामान्य व कम बुद्धि के लोगों में अपने संवेगों पर नियन्त्रण कम होता है। चूंकि बुद्धिमान व्यक्ति के पास चिन्तन व तर्क की योग्यता होती है इसलिए संवेगों पर नियन्त्रण कर लेते हैं।

सीखना– व्यक्ति समाज व संस्कृति द्वारा मान्य ढंग से संवेगों को व्यक्त करना सीखता है। उदाहरण के लिए नीग्रों के डर को व्यक्त करने का तरीका भारतीयों से भिन्न प्रकार का होता है। बच्चे संवेगात्मक व्यवहार को दो प्रकार से सीखते हैं-

अनुबन्धन द्वारा– वाटसन ने अलबर्ट नामक बच्चे पर प्रयोग किया। यह बच्चा खरगोश से बहुत प्यार करता था और उसके साथ खेलता था। वाटसन ने इस बच्चे को खरगोश से डरना सिखाया। अतः जब कभी बच्चा खरगोश के साथ खेलता था तो वे जोर की आवाज (जो डरावनी थी) करते थे। इससे बच्चा डरने लगा। धीरे-धीरे बच्चा खरगोश से डरने लगा। बाद में वह सफेद दिखने वाली सभी चीजों से डरना सीख गया।

अनुकरण– यदि माता-पिता चिन्तित रहते हैं तो बच्चे चिन्तित रहना सीख जाते हैं। इसी प्रकार माता – पिता शान्त तो बच्चे भी शान्त होते हैं। टर्नर ने पाया कि शिक्षकों के संवेगात्मक व्यवहार का प्रभाव छात्रों पर पड़ता है ।

विद्यालयी वातावरण– शिक्षकों का अपने व्यवसाय एवं छात्रों के प्रति मनोवृत्ति, विद्यालय अनुशासन, विद्यालय में अकादमिक सुविधाएँ, भौतिक सुविधाएँ, शिक्षण विधि, पाठ्य सहगामी क्रियाएँ आदि का बच्चे के संवेगात्मक विकास पर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए विद्यालय में अत्यन्त कठोर अनुशासन होता है या अनुशासन विहीन विद्यालय दोनों का बच्चे के संवेगात्मक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

संगी-साथी– संवेगात्मक व्यवहार अनुकरण द्वारा सीखे जाते हैं। अतः बच्चों के संवेगात्मक विकास पर मित्रों, संगी साथियों व सहपाठियों के व्यवहार का प्रभाव पड़ता है।

पारिवारिक वातावरण– माता-पिता व बच्चे के मध्य सम्बन्ध, बच्चे का जन्म क्रम, लड़का व लड़की, परिवार का आकार, परिवार का सामाजिक आर्थिक स्तर, अनुशासन, माता-पिता का बच्चे के प्रति मनोवृत्ति आदि बच्चे के संवेगात्मक विकास को प्रभावित करते हैं।

संवेगात्मक विकास के शैक्षिक निहितार्थ

सीखने की सभी क्रियाओं का सम्बन्ध संवेगों से होता है। विद्यालय में दिया जाने वाला शिक्षण सफल नहीं होगा यदि छात्रों का बौद्धिक विकास तो हो रहा हों लेकिन वे संवेगात्मक रूप से विचलित हों।

कक्षा में पढ़ाते समय शिक्षक को इस बात के लिए संवेदनशील होना चाहिए कि उनके प्रति छात्रों के कैसे संवेग हैं।

प्रत्येक कक्षा में हम भावना होती है। जिसके कारण छात्र कक्षा में सुरक्षित महसूस करते हैं। शिक्षक का प्रयास होना चाहिए कि यह भावना बनी रहे और छात्र कक्षा में किसी भी प्रकार का तनाव का अनुभव न करें।

छात्रों के संवेगों व संवेगात्मक व्यवहार के प्रति शिक्षक का सकारात्मक दृष्टिकोण होना चाहिए।

स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को महत्व देना चाहिए।

परीक्षा में नम्बरों पर बहुत बल नहीं होना चाहिए।

सम्पूर्ण उपस्थिति के स्थान पर बच्चे के स्वास्थ्य पर बल देना चाहिए।

संवेगात्मक समस्याओं के समाधान हेतु निर्देशन का प्रबन्ध होना चाहिए।

छात्रों को सामाजिक मान्यता प्राप्त ढंग से संवेगात्मक व्यवहार करने का तरीका सिखाना चाहिए।

छात्रों के संवेगों को समझते समय शिक्षक का पक्षपात रहित व वस्तुनिष्ठ व्यवहार होना चाहिए ।

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