बालक का शारीरिक विकास-Physical development of child

बालक के विकास का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका शारीरिक विकास है। बालक का शारीरिक विकास उसके समस्त व्यवहार तथा विकास के अन्य सभी पक्षों को प्रभावित करता है। शारीरिक विकास के अन्तर्गत शरीर रचना, स्नायु मण्डल, माँसपेशीय वृद्धि अन्तःस्रावी ग्रन्थियों आदि प्रमुख रूप से आती हैं।

 

बालक के शारीरिक विकास का उसके मानसिक तथा सामाजिक विकास पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। यही कारण है, कि शैक्षिक दृष्टि से शारीरिक विकास को अत्यधिक महत्वपूर्ण स्वीकार किया जाता है।

विकास की विभिन्न अवस्थाओं में शारीरिक विकास की प्रक्रिया भिन्न-भिन्न होती है। प्रस्तुत अध्याय में भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में होने वाले शारीरिक विकास की चर्चा की गई है। मनोविज्ञानियों ने मनुष्य के विकास क्रम को निम्नलिखित अवस्थाओं में विभाजित किया गया है।

भ्रूणावस्था ( जन्म से पूर्व )

शैशवावस्था ( जन्म से लगभग 6 वर्ष तक )

बाल्यावस्था ( 7 से 12 वर्ष तक )

किशोरावस्था ( 12 से 18 वर्ष तक )

प्रौढ़ावस्था ( 35 वर्ष से लेकर 60 वर्ष तक )

भ्रूणावस्था में बालक शारीरिक विकास

जैसे ही अण्ड शुक्राणु से मिलकर निषेचित होता है, वैसे ही मानव जीवन का प्रारम्भ हो जाता है। निषेचित अण्ड सर्वप्रथम दो कोषों में विभाजित होता है, जिसमें से प्रत्येक कोष पुनः दो-दो में विभाजित हो जाता हैं। कोष विभाजन की यह प्रक्रिया अत्यन्त तीव्र गति से चलने लगती है। इनमें ये कुछ कोष प्रजनन कोष बन जाते हैं तथा अन्य शरीर कोष बन जाते हैं।

शरीर कोषों से ही माँसपेशियों, स्नायुओं तथा शरीर के अन्य भागों का निर्माण होता है। निषेचन से जन्म तक के समय को जन्म पूर्वकाल अथवा जन्म पूर्व विकास का काल कहा जाता है। सामान्यतः जन्म पूर्वकाल दस चन्द्रमास अथवा नौ कैलेण्डर मास अथवा चालीस सप्ताह अथवा 280 दिन का होता है। भ्रूणावस्था में शारीरिक विकास तीन चरणों में होता है।

डिम्बावस्था

डिम्बावस्था, शुक्राणु एवं डिम्ब के संयोग के समय से लेकर दो सप्ताह तक मानी जाती है। इस अवस्था में कोषों का विभाजन होता है। जाइगोट में महत्वपूर्ण परिवर्तन होने लगते हैं। कोषों के भीतर खोखलापन विकसित होने लगता है।

निषेचित डिम्ब, डिम्बवाहिनी नलिका द्वारा गर्भाशय में आ जाता है, गर्भाशय में पहुँचने पर इसका आकार हुक के समान हो जाता है। कुछ दिनों पश्चात् यह गर्भाशय की दीवार से चिपक जाता है यहाँ से गर्भ अपना पोषण माता से प्राप्त करने लगता है।

कभी-कभी डिम्ब डिम्बवाहिनी नलिका से ही चिपक कर वृद्धि करने लगता है , ऐसे गर्भ को नलिका गर्भ कहते हैं। इस प्रक्रिया को आरोपण कहते हैं। आरोपण हो जाने के पश्चात् संयुक्त कोष एक परजीवी हो जाता है तथा जन्म पूर्व का काल वह इसी अवस्था में व्यतीत करता है।

डिम्बावस्था तीन कारणों से महत्वपूर्ण है-

प्रथम, निषेचित अण्ड गर्भाशय में आरोपित होने से पूर्व निष्क्रिय हो सकता है।

द्वितीय , आरोपण गलत स्थान पर हो सकता है।

तृतीय , आरोपण होना सम्भव नहीं हो सकता है।

पिण्डावस्था

जन्म पूर्व विकास का द्वितीय काल पिण्डावस्था अथवा पिण्ड काल कहलाता है। यह अवस्था निषेचन के तीसरे सप्ताह से शुरू होकर आठवें सप्ताह तक चलती है। लगभग छः सप्ताह तक चलने वाली पिण्डावस्था परिवर्तन की अवस्था है, जिसमें कोषों का समूह एक लघु मानव के रूप में विकसित हो जाता है।

शरीर की लगभग समस्त मुख्य विशेषताएँ, बाह्य तथा आन्तरिक, इस लघु अवधि में स्पष्ट हो जाती है। इस काल में विकास मस्तक-अधोमुखी दिशा में होता है अर्थात् सर्वप्रथम मस्तक क्षेत्र का विकास होता है तथा फिर धड़ क्षेत्र का विकास होता है और अन्त में पैर क्षेत्र का विकास होता है।

कुपोषण, संवेगात्मक सदमों, अत्याधिक शारीरिक गतिशीलता, ग्रन्थियों के कार्यों में व्यवधान अथवा अन्य किसी कारण से भ्रूण गर्भाशय की दीवार से विलग हो सकता है। जिसके फलस्वरूप स्वतः गर्भपात हो जाता है।

भ्रूणावस्था

यह समय गर्भ तिथि के दूसरे मास से लेकर बालक के जन्म तक अर्थात् दसवें चन्द्रमास अथवा नवें कैलेण्डर मास तक रहता है। तीसरे मास में 3.5 इंच लम्बा एवं 3/4 औंस भार का गर्भ होता है। दो मास बाद इसकी लम्बाई 10 इंच एवं भार 9 से 10 औंस हो जाता है। आठवें महीने में इसकी लम्बाई 10 इंच व भार 4 से 5 पौण्ड तथा जन्म के समय तक गर्भाशय भ्रूण की लम्बाई 20 इंच एवं भार 7 से 7.5 पौण्ड हो जाता है।

भ्रूणावस्था चार दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानी गई है।

1-गर्भाधान के उपरान्त पाँच माह तक गर्भपात की सम्भावना बनी रहती है।

2-माता के गर्भ में बालक को मिल रहे वातावरण की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भ्रूण के विकास को प्रभावित कर सकती है।

3-अपरिपक्व प्रसव हो सकता है।

4-प्रसव की सरलता अथवा जटिलता सदैव ही जन्म पूर्व परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं।

शैशवावस्था में बालक का शारीरिक विकास

सामान्यतः मनोवैज्ञानिकों ने शैशवावस्था का अर्थ उस अवस्था से लगाया जो औसतन जन्म से 5-6 वर्ष तक चलती है। एडलर के अनुसार- “शैशवावस्था द्वारा जीवन का पूरा क्रम निश्चित होता है। शैशवावस्था में विशेषकर जन्म से 3 वर्ष तक की आयु होने के दौरान शारीरिक विकास की गति अत्यन्त तीव्र रहती है।” शैशवावस्था में होने वाले शारीरिक विकास से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य अधोलिखित हैं।

कोमल अंग– जन्म के पश्चात् शिशु और उसके अंग कोमल एवं निर्बल होते हैं। माता-पिता पर वह सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आश्रित रहता है।

लम्बाई व भार– जन्म के समय शिशु की लम्बाई लगभग 51 सेन्टीमीटर होती है। प्रायः बालक जन्म के समय बालिकाओं से लगभग आधा सेन्टीमीटर अधिक लम्बे होते हैं।

मस्तिष्क तथा सिर– नवजात का सिर उसके शरीर की अपेक्षा बड़ा होता है। जन्म के समय सिर की लम्बाई कुल शरीर की लगभग एक चौथाई होती है। मस्तिष्क का भार जन्म के समय लगभग 300-350 ग्राम होता है।

दाँत– जन्म के समय शिशु के दाँत नहीं होते हैं, लगभग छठे या सातवें माह में अस्थायी दूध के दाँत निकलने लगते हैं। एक वर्ष की आयु तक दूध के सभी दाँत निकल आते हैं।

हड्डियाँ– कई मनोवैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि शिशु की बनावट और उसकी हड्डियों के परिपक्व होने की गति के मध्य एक सम्बन्ध होता है। जिनका शरीर अधिक मजबूत और गठीला होता है, उनके शरीर की हड्डियों में परिपक्वता तेजी से आती है।

स्नायु विकास– स्नायु मण्डल तथा स्नायु केन्द्रों का विकास भी 3 वर्ष तक शीघ्रता से होता है।

माँसपेशियाँ– नवजात शिशु की माँसपेशियों का भार उसके शरीर के कुल भार का लगभग 23 प्रतिशत होता है। माँसपेशियों के प्रतिशत भार में धीरे-धीरे बढोत्तरी होती जाती है।

अन्य अँग– शिशु की भुजाओं तथा टाँगों का विकास भी तीव्र गति से होता है। जन्म के समय शिशु के हृदय की धड़कन अनियमित होती है। कभी वह तीव्र हो जाती है तथा कभी धीमी हो जाती है। जैसे-जैसे हृदय बड़ा होता है वैसे-वैसे धड़कन में स्थिरता आ जाती है।

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास

छः वर्ष की आयु से लेकर बारह वर्ष की आयु तक की अवधि बाल्यावस्था कहलाती है। बाल्यावस्था के प्रथम तीन वर्षों के दौरान अर्थात् 6 से 9 वर्ष की आयु तक शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है। बाद में शारीरिक विकास की गति कुछ धीमी हो जाती है। बाल्यावस्था में होने वाले शारीरिक विकास से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन निम्नलिखित हैं।

लम्बाई व भार– 6 वर्ष से 12 वर्ष की आयु तक चलने वाली बाल्यावस्था में शरीर की लम्बाई लगभग 5 सेंटीमीटर से 7 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की गति से बढ़ती है। बाल्यावस्था के प्रारम्भ में जहाँ बालकों की लम्बाई बालिकाओं की लम्बाई से लगभग एक सेंटीमीटर अधिक होती है वहीं इस अवधि की समाप्ति पर बालिकाओं की औसत लम्बाई बालकों की औसत लम्बाई से लगभग 1 सेंटीमीटर अधिक हो जाती है। बाल्यावस्था के दौरान बालकों के भार में काफी वृद्धि होती है। 9 से 10 वर्ष की आयु तक बालकों का भार बालिकाओं के भार से अधिक होता है।

सिर तथा मस्तिष्क– बाल्यावस्था में सिर के आकार में क्रमश: परिवर्तन होता रहता है, परन्तु शरीर के अन्य अंगों की तुलना में यह भी अपेक्षाकृत बड़ा होता है। बाल्यावस्था में मस्तिष्क का आकार तथा भार दोनों ही दृष्टि से लगभग पूर्णरूपेण विकसित हो जाता है।

दाँत– लगभग 5-6 वर्ष की आयु में स्थायी दाँत निकलने प्रारम्भ हो जाते हैं। 16 वर्ष की आयु तक लगभग सभी स्थायी दाँत निकल आते हैं। स्थायी दाँतों की संख्या लगभग 28 से 32 होती है।

हड्डियाँ– बाल्यावस्था में हड्डियों की संख्या तथा उनकी दृढ़ता दोनों में ही वृद्धि होती है। इस अवस्था में हड्डियों की संख्या 270 से बढ़कर 320 हो जाती है। इस अवस्था के दौरान हड्डियों का दृढिकरण अथवा अस्थिकरण तेजी से होता है।

माँसपेशियाँ– बाल्यावस्था में माँसपेशियों का धीरे-धीरे विकास होता जाता है। इस अवस्था में बालक माँसपेशियों पर पूर्ण नियंत्रण करने लगता है।

शरीर के आकार में भिन्नता– बालक जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, उसमें शारीरिक भिन्नता अधिक स्पष्ट होने लगती है। चेहरा, धड़, भुजाएँ या टाँगें आदि में पहले से भिन्नता परिलक्षित होने लगती है।

आन्तरिक अवयव– शरीर के आन्तरिक अवयवों का विकास भी अनेक रूपों में होता है यह विकास रक्त संचार, पाचन संस्थान तथा श्वसन प्रणाली में होता है।

किशोरावस्था में बालक का शारीरिक विकास

किशोरावस्था विकास की अत्यन्त महत्वपूर्ण सीढ़ी है। किशोरावस्था का महत्व कई दृष्टियों से दिखाई देता है प्रथम यह युवावस्था का दरबाजा है जिसके ऊपर जीवन का समस्त भविष्य पाया जाता है। द्वितीय यह विकास की चरमावस्था है। तृतीय यह संवेगात्मक दृष्टि से से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

किशोरावस्था के लिए अंग्रेजी का शब्द Adolescence है यह लैटिन भाषा को Adolecere शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है- “परिपक्वता की ओर बढ़ना अतः स्पष्ट है कि किशोरावस्था वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति बाल्यावस्था के बाद पदार्पण करता है, किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक विकास से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन अग्रलिखित हैं।

लम्बाई तथा भार– किशोरावस्था में बालक तथा बालिकाओं की लम्बाई बहुत तीव्र गति से बढ़ती है। बालिकाएँ प्रायः 16 वर्ष की आयु तक तथा बालक लगभग 18 वर्ष की आयु तक अपनी अधिकतम लम्बाई प्राप्त कर लेते हैं। किशोरावस्था में भार में काफी वृद्धि होती है । बालकों का भार बालिकाओं के भार से तेज गति बढ़ता है। इस अवस्था के अन्त में बालकों का औसत भार बालिकाओं के औसत भार से अधिक हो जाता  है।

सिर तथा मस्तिष्क– किशोरावस्था में सिर तथा मस्तिष्क का विकास जारी रहता है, परन्तु इसकी गति काफी मंद हो जाती है। लगभग 16 वर्ष की आयु तक सिर तथा मस्तिष्क का पूर्ण विकास हो जाता है।

हड्डियाँ– किशोरावस्था में हड्डियों के दृढिकरण की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। जिसके परिणामस्वरूप अस्थियों का लचीलापन समाप्त हो जाता है तथा वे दृढ़ हो जाती हैं किशोरावस्था में हड्डियों की संख्या कम होने लगती है। प्रौढ़ व्यक्ति में केवल 206 हड्डियाँ होती हैं।

दाँत– किशोरावस्था में प्रवेश करने से पूर्ण बालक तथा बालिकाओं के लगभग 28-32 स्थायी दाँत निकल आते हैं।

माँसपेशियाँ – किशोरावस्था में माँसपेशियों का विकास तीव्र गति से होता है। किशोरावस्था की समाप्ति पर माँसपेशियों का भार शरीर के कुल भार का लगभग 45 प्रतिशत हो जाता है।

अंगों की वृद्धि– आन्तरिक अंगों की वृद्धि होती है। पाचन प्रणाली, रक्त संचार प्रणाली, ग्रन्थिप्रणाली, श्वास तन्त्र आदि में विकास चरमोत्कर्ष पर होता है।

गले की ग्रन्थि का विकास– गले के थायराइड ग्रन्थि बढ़ने से किशोर-किशोरियों की वाणी में अन्तर आ जाता है। किशोरों की वाणी कर्कश होने लगती है जबकि किशोरियों की वाणी में कोमलता और क्षीणता आने लगती है।

काम ग्रन्थि का विकास– काम ग्रन्थि के विकास फलस्वरूप किशोर तथा किशोरियों में लिंगीय परिवर्तन होने लगते हैं। किशोरियों में मासिक रक्त स्राव आरम्भ होता है तथा किशोरों में रात्रि-दोष के लक्षण पाए जाते हैं।