भूकम्प की परिभाषा और कारण-Definition and causes of earthquake

भूकम्प भू-पृष्ठ पर होने वाला आकस्मिक कम्पन है जो भू-गर्भ में चट्टानों के लचीलेपन या गुरुत्वाकर्षण की समस्थिति में क्षणिक अव्यवस्था होने पर उत्पन्न होता है।

भूकम्प के कारण

भूकम्प आने के प्राकृतिक तथा मानवीय दोनों कारण हो सकते हैं। प्राकृतिक कारणों में ज्वालामुखी क्रिया, भू-सन्तुलन से सम्बन्धित समायोजन, प्लेटों की गतिशीलता, वलन तथा भ्रंशन, भूपटल का संकुचित होना, भू-गर्भिक गैसों की मात्रा में वृद्धि, पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन आदि शामिल किये जाते हैं।

कृत्रिम या मानव निर्मित कारणों में परमाणु परीक्षण, बांधों एवं विशाल जलाशयों का निर्माण आदि शामिल किये जाते हैं।

भूकम्प मूल एवं केन्द्र

विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत भूकम्पीय लहरों का सिस्मोग्राफ यंत्र द्वारा अंकन करके अध्ययन किया जाता है, भूकम्प विज्ञान कहलाती है।

पृथ्वी की उत्पत्ति एवं संरचना

भूकम्प तीव्रता की माप रिक्टर स्केल पर की जाती है। इस स्केल का विकास चार्ल्स रिक्टर द्वारा किया गया था। इसमें 0 से 9 तक कुल 10 खाने होते हैं।

जिस जगह से भूकम्पीय तरंगें उत्पन्न होती हैं उसे “भूकम्प मूल” कहते हैं। तथा जहाँ सबसे पहले भूकम्पीय लहरों का अनुभव होता है उसे “भूकम्प केन्द्र या भूकम्प अधिकेन्द्र” कहते हैं।

जिस क्षेत्र में भूकम्प आने वाला होता है, उस क्षेत्र के वायुमण्डल में “रेडॉन गैस” की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। अतः इस गैस की मात्रा में वृद्धि होना उस क्षेत्र में भूकम्प आने का संकेत होता है।

भूकम्पीय तरंगें

भूकम्प के दौरान भूकम्प मूल से जो ऊर्जा निकलती है, उसे “प्रत्यास्थ ऊर्जा” कहते हैं। भूकम्प के दौरान पृथ्वी में कई प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती है। इन तरगों को भूकम्पीय तरंगें कहा जाता है। जिन्हें तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है।

1-प्राथमिक या P- तरंगें

इन्हें संपीडनात्मक अथवा लम्बात्मक तरंगें भी कहते हैं। तीनों भूकम्पीय लहरों में सर्वाधिक वेग (8-14 km/sec.) इन्हीं तरगों का होता है। ये सीस्मोग्राफ स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती हैं। ये अनुदैर्ध्य तरंगें है एवं ध्वनि तरंगों की भाँति चलती हैं। ये ठोस, द्रव व गैस तीनों माध्यमों से होकर गुजर सकती हैं। ठोस माध्यम में इनकी गति सर्वाधिक होती है।

2-सेकेण्डरी या S- तरंगें

इन्हें अनुप्रस्थ या गौण तरंगें भी कहते हैं। ये प्रकाश तरंगों की भाँति चलती हैं। इनकी गति (4-6 km/sec.) होती है। ये सिर्फ ठोस माध्यम में ही चल सकती हैं, तरल माध्यम में प्रायः लुप्त हो जाती है। चूँकि ये पृथ्वी के क्रोड़ से होकर गुजर नहीं पाती। अतः अनुमान लगाया जाता है कि पृथ्वी का क्रोड़ तरल है।

3-धरातलीय तरंगें

इन्हे “L” तरंगें भी कहा जाता है। ये पृथ्वी के ऊपरी भाग को ही प्रभावित करती है। ये तरंगें अधिकेन्द्र पर सबसे बाद में पहुँचती हैं। क्योंकि इनका वेग (3 km/sec.) सबसे कम होता है। ये अत्यधिक प्रभावशाली तरंगें हैं। एवं पूरी पृथ्वी के धरातल पर भ्रमण करती हैं। ये ठोस एवं तरल दोनों माध्यमों में गति कर सकती हैं। ये तरंगें सर्वाधिक विनाशकारी होती हैं।

चट्टानों के प्रकार

(सभी भूकम्पीय तरंगों के वेग अधिक घनत्व वाले पदार्थों में से गुजरने पर बढ़ जाता है। तथा कम घनत्व वाले पदार्थों में से गुजरने पर घट जाता है।)

भूकम्पीय छाया क्षेत्र

भूकम्प अधिकेन्द्र से 105° से 145° के बीच का क्षेत्र “भूकम्प छाया क्षेत्र” कहलाता है। इस क्षेत्र में सीस्मोग्राफ पर कोई भी भूकम्पीय तरंग अभिलेखित नहीं होती।

भूकम्प के प्रकार

गुटेनबर्ग तथा रिटर ने भूकम्प मूल की गहराई के आधार पर भूकम्प को तीन भागों में विभक्त किया है।

साधारण भूकम्प-जब भूकम्प मूल की स्थिति धरातल से 0 से 50 km तक की गहराई पर होता है। तो उसे साधारण भूकम्प कहते हैं।

मध्यवर्ती भूकम्प-भूकम्प मूल की गहराई 50 से 250 km तक होती है।

पातालीय भूकम्प-जब भूकम्प की उत्पत्ति का केन्द्र 250 से 700 km की गहराई पर होता है। उसे पातालीय भूकम्प कहते हैं।

(समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को “सम भूकम्पीय रेखा या भूकम्प समाघात रेखा कहते हैं। तथा एक ही समय पर आने वाले भूकम्पीय क्षेत्रों को मिलाने वाली रेखा को होमोसीस्मल रेखा कहते हैं।)

भूकम्पों का विश्व वितरण

विश्व में भूकम्पों का वितरण उन क्षेत्रों से सम्बन्धित है जो भूगर्भिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर तथा अव्यवस्थित हैं। विश्व में भूकम्प की कुछ पेटियाँ निम्नलिखित हैं।

1-प्रशान्त महासागरीय तटीय पेटी

यह विश्व का सबसे विस्तृत भूकम्प क्षेत्र है। यहाँ पर सम्पूर्ण विश्व के 63% भूकम्प आते हैं। भूकम्प के लिए यहाँ चार प्रमुख दशायें उत्तरदायी है।

सागर तथा स्थल का मिलन बिन्दु

नवीन वलित पर्वतों का क्षेत्र

ज्वालामुखी सक्रिय क्षेत्र

विनाशी प्लेट सीमाओं का अपसरण

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार

इस क्षेत्र में चिली, कैलिफोर्निया, अलास्का, जापान, फिलीपींस, न्यूजीलैंड आदि क्षेत्र आते हैं।

2-मध्य महाद्विपीय पेटी

इस पेटी पर विश्व के 21% भूकम्प आते हैं। यह प्लेटीय अभिसरण का क्षेत्र है। यहाँ आने वाले अधिकांश भूकम्प सन्तुलन मूलक या भ्रंशन मूलक होते हैं। यह पेटी केप बर्ड से शुरू होकर अटलांटिक महासागर, भूमध्य सागर, आल्पस, काकेशस और हिमालय जैसी नवीन पर्वत श्रेणियों से होती हुई, दक्षिण की और मुड़ जाती है। और आगे जाकर प्रशान्त महासागरीय पेटी से मिल जाती है। भारत का भूकम्पीय क्षेत्र इसी पेटी के अन्तर्गत आता है।

3-मध्य अटलांटिक पेटी

यह पेटी मध्य अटलांटिक कटक से सहारे स्थित है। यह पेटी उत्तर में स्पिट बर्जेन और आइसलैंड से लेकर दक्षिण में बोवेट द्वीप तक विस्तृत है। यहाँ पर भूकम्प मुख्य रूप से प्लेटों के अपसरण के कारण रूपान्तरित भ्रंशों के निर्माण एवं ज्वालामुखी उद्गार के कारण आते हैं। सामान्यतः इस पेटी में कम तीव्रता के भूकम्प आते हैं। इस मेखला (पेटी) के सर्वाधिक भूकम्प भूमध्य रेखा के पास आते हैं।