ब्रह्मांड का स्वरूप-Nature of the universe

भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग ने अपनी पुस्तक “समय का संक्षिप्त इतिहास (A Brief History of time)” मे बताया है कि आज से लगभग 15 अरब वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व एक मटर के दाने के रूप में था। महाविस्फोट (Big-Bang) के पश्चात ब्रह्मांड का स्वरूप विकसित हुआ।

ब्रह्माण्ड का भौतिक स्वरूप

ब्रह्माण्ड के भौतिक स्वरूप की रचना ब्रह्माण्ड में उपस्थित बलों के कारण हुई है।  बल चार प्रकार के होते हैं।

 

गुरुत्वाकर्षण बल(Gravitational force)

गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पिण्ड (ग्रह, उपग्रह, तारें, आकाशगंगायें तथा अन्य पिण्ड) एक व्यवस्था मे बंधे हुए हैं। गुरुत्वाकर्षण बल की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता हैं। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण बल के लिए एक गणितीय नियम किया और बताया कि विशाल पिण्डों के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव अनन्त दूरियों तक रहता है। परन्तु यह बल दो आकाशीय पिण्डों के बीच किस माध्यम और वेग से कार्य करता है। इसके विषय मे न्यूटन ने कोई जानकारी नहीं दी।

आइंस्टीन ने गुरुत्वाकर्षण को नए ढंग से प्रस्तुत किया और बताया कि इस बल के माध्यम के लिए गुरुत्वीय तरंगों और प्रसारण के लिए विशेष प्रकार के सूक्ष्म कणों ग्रेविटोन का होना चाहिए।

विद्युत चुम्बकीय बल(Electro Magnetic Force)

यह बल अणुओं तथा परमाणुओं को एक दूसरे से बांधता है। यह बल आवेशी कणों के बीच फोटोन की सहायता से कार्य करता है।यह बल गुरुत्वाकर्षण बल से 10 की पॉवर40 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है। इस बल मे आकर्षण तथा प्रतिकर्षण दोनों कार्य करतें हैं। जबकि गुरुत्वाकर्षण बल मे केवल आकर्षण काम करता है।

दृढ़ बल(Strong Force)

यह बल परमाणु के नाभिक मे पाया जाता है। जो नाभिक के प्रोटॉनों को दृढ़ता से बाँधे रहता है। यह विद्युत चुम्बकीय बल से 10 to pawer 2 गुना अधिक शक्तिशाली होता है। यह बल नाभिक के भीतर 10 to pawar-15 मीटर की दूरी तक काम करता है।

कमजोर या क्षीण बल(Weak Force)

यह बल भी नाभिक मे पाया जाता है। परन्तु यह बल स्थाई नहीं होता है। यह नाभिक मे एकाएक उत्पन्न होता है।और क्षण भर में समाप्त हो जाता है। इसी बल के कारण कुछ तत्वों मे Radioactivity  पायी जाती है।

यही चार बल पूरे ब्रह्माण्ड को व्यवस्थित ढंग से बांधे रखते हैं। जब महाविस्फोट के साथ ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई तब ब्रह्माण्ड का तापमान बहुत ऊँचा था। उस समय ये चारों बल एकीकृत थे। महाविस्फोट के कुछ मिनट पश्चात् जब तापमान कम हुआ तो strong force सक्रिय हो गया। इस बल ने प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन को बांधकर नाभिक निर्माण कर दिया। इसके लगभग 5 लाख वर्ष बाद विद्युत चुम्बकीय बल सक्रिय हुआ। इस बल ने नाभिकों और इलेक्ट्रॉनों को आपस मे बांधकर परमाणुओं का निर्माण किया। और बाद मे जब तारें, ग्रह, उपग्रह तथा अन्य पिण्ड अस्तित्व में आये तो गुरुत्वाकर्षण बल सक्रिय हो गया।

ब्रह्मांड का पदार्थीय स्वरूप

ब्रह्मांड अदृश्य तथा दृश्य पदार्थों से मिलकर बना है। अदृश्य पदार्थों को डार्क एनर्जी एवं डार्क मैटर तथा दृश्य पदार्थों को सामान्य पदार्थ कहते हैं। डार्क मैटर की खोज जेम्स वाटसन क्रोनिन ने की थी। इनके अनुसार ब्रह्माण्ड का 96 %भाग डार्क मैटर तथा डार्क एनर्जी से निर्मित है। इस बात की पुष्टि नासा के उपग्रह WAMP तथा अन्तरिक्ष में परिक्रमा कर रही वेधशाला Wilkinson Microwave Anisotropy Probe(WMAP) द्वारा भेजें गये आंकड़ो से होती हैं। ये आंकड़ो के अनुसार कॉस्मिक ऊर्जा का 73% डार्क एनर्जी तथा 23% डार्क मैटर के रूप में है। शेष बचे 4% में वे सामान्य पदार्थ आते हैं। जो हमे दिखलाई पड़ते हैं।

भारत की नदियों से सम्बंधित प्रश्न

कैलिफोर्निया इंस्टीट्यट ऑफ टेक्कोलॉजी के वैज्ञानिकों ने डार्क मैटर की 3-डी तस्वीर बनाने मे सफलता प्राप्त की। इस तस्वीर को बनाने में वैज्ञानिकों ने ग्रेविटेशनल लेंसिंग तकनीकी का प्रयोग किया ।

ब्रह्मांड का प्रसारीय स्वरूप

खगोलविद् एडविन हब्बल ने बताया कि आकाश गंगाओं के बीच की दूरी बढ़ रही हैं। जैसे जैसे आकाश गंगाओं के बीच की दूरी बाद रही हैं। वैसे वैसे इनके दूर जाने की गति तेज होती जा रही हैं। आकाशगंगाओं के दूर जाने की पुष्टि डाप्लर प्रभाव द्वारा होती हैं।

डाप्लर प्रभाव

“प्रकाश स्रोत तथा प्रक्षेक की सापेक्ष गति के कारण, प्रकाश की आवृत्ति में प्रेक्षित आभासी परिवर्तन को प्रकाश मे डॉप्लर प्रभाव कहते है।”

भारत और विश्व की प्रमुख झीलें

तारों से आने वाले प्रकाश के स्पेक्ट्रम में हाइड्रोजन, हीलियम,सोडियम आदि तत्वों की स्पेक्ट्रमी रेखाएं पायी जाती हैं। यदि कोई तारा पृथ्वी पर स्थित प्रेक्षक से दूर जा रहा है। तो इसके प्रकाश की स्पेक्ट्रमी रेखाएं दीर्घ तरंग दैर्ध्य (red shift) की ओर विस्थापित हो जाती हैं। और यदि पास आ रहा है। तो स्पेक्ट्रमी रेखायें लघु तरंग दैर्ध्य (blue shift) की ओर विस्थापित हो जाती हैं। वे सभी आकाशगंगायें जिनके लिए डॉप्लर विस्थापन का मापन किया गया,सभी मे red shift पाया गया।अतः सभी आकाशगंगायें हमसे दूर जा रही हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ब्रह्माण्ड का प्रसार हो रहा है।

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