धारणीय विकास-Sustainable development

धारणीय विकास की अवधारणा सर्वप्रथम ब्रैंटलैंड ने 1987 ई. में प्रस्तुत की थी। इस शब्द का पहली बार प्रयोग IUCN ने अपनी रिपोर्ट “विश्व संरक्षण रणनीति” में किया था।

 1987 ई. में WCED ने Our Common Future नामक रिपोर्ट में इस शब्द की परिभाषा दी। इस रिपोर्ट के अनुसार “धारणीय अथवा स्थायी विकास (Sustainable Development) वह विकास है जिसके अंतर्गत भावी पीढ़ियों के लिए आवश्यताओं की पूर्ति करने की क्षमताओं से समझौता किये बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यताओं को पूरा किया जाता है।” अतः पर्यावरण सुरक्षा के बिना विकास को सतत नहीं बनाया जा सकता।

धारणीय विकास क्या है?

भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक संसाधनों का वर्तमान समय में इस प्रकार प्रयोग करना जिससे आर्थिक विकास और पर्यावरण सुरक्षा के मध्य एक वांछित सन्तुलन स्थापित हो सके। धारणीय या स्थायी या निर्वहनीय या निरन्तर विकास कहलाता है।

वर्तमान में धारणीय विकास एक वैश्विक दृष्टिकोण बन गया है। 1992 ई. के पृथ्वी सम्मेलन में घोषित एजेंडा-21 (रियो घोषणा पत्र) में धारणीय विकास के प्रति पूर्ण समर्थन व्यक्त किया गया। वर्ष 2002 के जोहांसबर्ग सम्मेलन का मूल मुद्दा सतत विकास ही था।

IMPORTANT QUESTIONS

Question. धारणीय विकास की अवधारणा का प्रतिपादन सर्वप्रथम किसने किया?

Answer. ब्रैंटलैण्ड ने (1987 ई.)

Question. किस सम्मेलन को द्वितीय पृथ्वी सम्मेलन कहा जाता है?

Answer. जोहान्सबर्ग सम्मेलन को

Question. स्थायी विकास के मुख्य पांच क्षेत्र कौन से हैं?

Answer. जल, ऊर्जा, स्वास्थ्य, कृषि एवं जैव विविधता

Question. भारत में धारणीय विकास के दृष्टिकोण से विद्युत उत्पादन का सबसे अच्छा स्रोत कौन सा है?

Answer. जल विद्युत

Question. भारत में गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत विभाग की स्थापना कब की गयी?

Answer. 1982 ई. में

Question. भारतीय नवीनीकरण ऊर्जा विकास अधिकरण की स्थापना कब की गयी थी?

Answer. 1987 ई. में

स्थायी विकास के सिद्धांत

निम्नलिखित सिद्धान्तों के आधार पर सतत विकास के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

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पारिस्थितिकी मित्रवत प्रौद्योगिकी-उत्पादन प्रक्रिया के प्रत्येक क्षेत्र में पारिस्थितिकी मित्रवत प्रौद्योगिकी को अपनाकर निर्वहनीय विकास को प्राप्त किया जा सकता है।

परियोजना मूल्यांकन-विकास के अंतर्गत किसी परियोजना का मूल्याकंन तीन E अर्थात Environmental Protection, Ecological Balance, Economic Efficiency के आधार पर किया जाना चाहिए।

उत्पादन का विकेन्द्रीकरण-स्थायी विकास के लिए उत्पादन का विकेंद्रीकरण करके इस क्षेत्र में जन-सहभागिता को बढ़ाना।

संसाधन संरक्षण-भू-मण्डलीय आधार पर समस्त चक्रों का प्रबंधन करके संसाधनों का प्रभावी संरक्षण करना।

विश्व के सभी देशों द्वारा पर्यावरण के सम्बन्ध में वैश्विक संस्थाओं, सन्धियों व प्रोटोकॉल को पूर्ण मान्यता दी जाये और उनका पूर्णतः अनुपालन हो।

भारत में स्थायी विकास

भारत में भी स्थायी विकास को प्राप्त करने के प्रयास चल रहे हैं। भारत उन विकासशील देशों में आता है, जहाँ पर्यावरण के सम्बन्ध में व्यापक जागृति आयी है। भारत में स्थायी विकास प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों में कार्य प्रारम्भ हो चुका है।

वनारोपण एवं कृषि वानिकी

मृदा संरक्षण व परती भूमि विकास

कृषि जलवायुविक प्रादेशीकरण

वाटरशेड प्रबन्धन

शस्यक्रम एवं फसल चक्र

शुष्क कृषि विकास

इसके अलावा जीवमंडल विकास कार्यक्रम, राष्ट्रीय अभ्यारण्य, भूमिगत जल संरक्षण, मैंग्रोव संरक्षण, मलिन बस्तियों में सुधार एवं प्रदूषण नियन्त्रण के विभिन्न कानून आदि धारणीय विकास की दिशा में हो रहे प्रयासों में समाहित हैं।

 

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