घाघरा और चंदेरी का युद्ध

घाघरा का युद्ध 6 मई 1529 ई. में अफगान सरदारों तथा बाबर के मध्य लड़ा गया। इसमें अफगान पराजित हुए। यह बाबर का अन्तिम युद्ध था।

पानीपत के प्रथम युद्ध में पराजित होने के बाद अफगान पूरी तरह निर्बल नहीं हुए थे। खानवा के युद्ध में राणा सांगा के पराजित होने के बाद अफगान सरदारों ने बिहार में शरण ली। वहां अफगानों ने सिकन्दर लोदी के भाई महमूद लोदी के नेतृत्व में एक विशाल सेना का गठन किया।

बंगाल का शासक नुसरतशाह जो बाबर का समकालीन था, अफगानों की सहायता कर रहा था। जबकि बाबर अफगानों की शक्ति को पूर्णतया नष्ट करना चाहता था। अतः बाबर ने अफगानों और बंगाल की संयुक्त सेना को पराजित करने का निश्चय किया।

बाबर तथा अफगान सेना में 6 मई 1529 ई. में घाघरा नदी तट पर युद्ध हुआ। जिसमें बाबर विजयी हुआ। भारत के मध्यकालीन इतिहास में घाघरा का युद्ध पहला युद्ध था जो जल एवं थल दोनों पर लड़ा गया।

चंदेरी का युद्ध

चंदेरी का युद्ध 29 जनवरी 1528 ई. में मुगल शासक बाबर तथा राजपूत शासक मेदिनीराय के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में बाबर विजयी रहा। खानवा का युद्ध जीतने के बाद बाबर ने चंदेरी की ओर ध्यान दिया। क्योंकि चंदेरी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान था। उत्तर भारत पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए चंदेरी को जीतना आवश्यक था। दूसरा कारण यह भी था कि मेदिनीराय एक शक्तिशाली राजपूत शासक था बाबर ने इसे स्वतन्त्र छोड़ना उचित नहीं समझा।

 

उपर्युक्त कारणों के आधार पर बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण का निश्चय किया। उसने 29 जनवरी 1528 ई. में चन्देरी के दुर्ग का घेरा डाला। मेदिनीराय वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। बाबर की सेनाओं ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। बाबर ने मुल्ला अपाक को चंदेरी का शिकदार नियुक्त किया।

  उपरोक्त दोनों युद्धों में विजय के बाद भारत में बाबर की शक्ति स्थापित हो गई। उसका साम्राज्य सिन्धु से लेकर बिहार तक तथा हिमालय से लेकर ग्वालियर एवं चन्देरी तक विस्तृत गया। बाबर की चंदेरी विजय ने राजपूत शक्ति को तथा घाघरा की विजय ने अफगान शक्ति को समाप्त कर दिया।