हड़प्पा सभ्यता के स्थल

अब तक लगभग हड़प्पा सभ्यता के लगभग 1400 स्थलों का पता लग चुका है। इनमें से कुछ प्रमुख स्थल निम्नलिखित हैं।

 

हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल

1-हड़प्पा

हड़प्पा पुरास्थल पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के माण्टगोमरी जिले में (आधुनिक शाहीवाल) रावी नदी के बायें तट पर स्थित है। इसके ध्वंशावशेषों के विषय में सबसे पहले जानकारी “चार्ल्स मेसन” ने दी थी। दूसरी बार इसका उल्लेख तब आया जब 1856 में करांची से लाहौर रेलवे लाइन बिछाते समय जॉन ब्रंटन और विलयम ब्रंटन ने यहाँ से प्राप्त ईंटों का उपयोग रोड़ों के रूप में किया।

इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देश पर 1921 में दयाराम साहनी ने इस स्थल का उत्खनन कार्य करवाया। अतः हड़प्पा सभ्यता की खोज का श्रेय दयाराम साहनी को जाता है।

हड़प्पा क्षेत्रफल की दृष्टि से सिन्धु सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा स्थल है। यहाँ से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को नगर टीला तथा पश्चिमी टीले को दुर्ग टीले का नाम दिया गया। दुर्ग टीले के बाहर उत्तर दिशा में स्थित एक अन्य टीले से अन्नागार,अनाज कूटने के वृत्ताकार चबूतरे और श्रमिक आवास के साक्ष्य मिले हैं।

अन्नागार रावी नदी के तट पर स्थित था तथा इसमें 12 कक्ष थे। प्रत्येक कक्ष का आकार 50×20 मीटर है। वृत्ताकार चबूतरों की संख्या 18 है तथा ये पक्की ईंटों से निर्मित हैं। सम्भवतः इनका उपयोग अनाज पीसने के लिए होता था। श्रमिक आवास के रूप में 15 मकान दो पंक्तियों में बनाये गये थे।

सिन्धु घाटी सभ्यता की नगर योजना

श्रमिक आवास के नजदीक 16 भट्टियां और धातु बनाने की एक मूषा (Crucible) मिली है। सम्भवतः इन आवासों में ताम्रकार रहते थे। इसके अतिरिक्त यहाँ से एक बर्तन पर बना मछुआरे का चित्र, शंख का बना बैल, पीतल का बना इक्का आदि के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।

हड़प्पा नगर क्षेत्र के दक्षिण दिशा में एक कब्रिस्तान मिला है, जिसे “समाधि R-37” नाम दिया गया है। हड़प्पा में एक अन्य समाधि भी मिली है जिसे समाधि H नाम दिया गया है। इसका सम्बन्ध सिन्धु सभ्यता के बाद के काल से है।

2-मोहनजोदड़ो

इसके ध्वंशावशेष पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के दाहिने किनारे पर प्राप्त हुए। यह क्षेत्रफल की दृष्टि से सिन्धु सभ्यता का सबसे बड़ा नगर था, जो 250 हेक्टेयर में बसा था। इसकी जनसंख्या भी सर्वाधिक थी।

मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ होता है-मृतकों या प्रेतों का टीला। इसे “सिन्धु का बाग” भी कहा जाता है। मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में राखाल दास बनर्जी ने की।

मोहनजोदड़ो के दुर्ग टीले को स्तूप टीला भी कहते हैं क्योंकि इस टीले पर कुषाण शासकों ने एक स्तूप का निर्माण करवाया था। यही से एक विशाल स्नानागार, अन्नागार, सभा भवन तथा पुरोहित आवास के साक्ष्य मिले हैं।

इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्य साक्ष्यों में कुम्भकारों के 6 भट्टों के अवशेष,सूती कपड़ा, हाथी का कपाल खण्ड, गले हुए ताँबे के ढेर, कांसे की नृत्यरत नारी की मूर्ति आदि प्रमुख हैं।

सिन्धु सभ्यता की खोज

मोहनजोदड़ो का सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल विशाल स्नानागार है। इसकी लम्बाई उत्तर से दक्षिण 55 मीटर तथा चौड़ाई पूर्व से पश्चिम 33 मीटर है। इसके मध्य में स्थित स्नानकुण्ड की लम्बाई 11.8 मीटर, चौड़ाई 7.04 मीटर तथा गहराई 2.43 मीटर है। सम्भवतः इसका उपयोग सार्वजनिक रूप से धर्मानुष्ठान सम्बन्धी स्नान के लिए होता था। मार्शल से इसको तत्कालीन विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण बताया है।

3-चन्हूदड़ो

 यह सिन्धु नदी के बाएं तट पर स्थित है। इसकी खोज 1931 में एन. जी. मजूमदार ने की। यहाँ पर मुहर एवं गुड़ियों के निर्माण के साथ साथ हड्डियों से भी अनेक वस्तुओं का निर्माण होता था। यहाँ से सिन्धु संस्कृति के अतिरिक्त प्राक-हड़प्पा संस्कृति, झूकर संस्कृति तथा झांगर संस्कृति के भी साक्ष्य मिले हैं। मैके ने यहाँ से मनके बनाने का कारखाना खोजा है।

चन्हूदड़ो से एक ऐसी मुद्रा मिली है जिस पर तीन घड़ियाल तथा दो मछलियों का अंकन है। यह एक मात्र ऐसा स्थान है जहाँ वक्राकार ईंटें मिलती हैं तथा मिट्टी की पकी हुई नालियों का प्रयोग किया गया है।इसके अतिरिक्त अलंकृत हाथी, कुत्ते द्वारा बिल्ली का पीछा करते हुए पद चिन्ह तथा सौन्दर्य प्रसाधन में प्रयुक्त लिपिस्टिक के चिन्ह प्राप्त हुए हैं।

4-लोथल

इसे “लघु हड़प्पा” या “लघु मोहनजोदड़ो” भी कहा जाता है। इसकी खोज 1954 में रंगनाथ राव ने की थी। यह गुजरात जिले में भोगवा नदी के किनारे स्थित है। यहाँ की सर्वाधिक प्रसिद्ध उपलब्धि है- हड़प्पा कालीन बन्दरगाह (गोदीवाड़ा)। लोथल में दुर्ग और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं।

नगर क्षेत्र के बाहर उत्तरी पश्चिमी किनारे पर समाधि क्षेत्र था जहाँ से 20 समाधियां मिली हैं। यहाँ तीन युग्मित समाधियों के उदाहरण भी मिले हैं। जिससे यहाँ सती प्रथा के प्रचलन का अनुमान लगाया जाता है। चन्हूदड़ो की भाँति यहाँ से भी मनके बनाने का कारखाना मिला है। यहाँ से एक रंगाई कुण्ड भी मिला है।

5-कालीबंगा

कालीबंगा का अर्थ होता है-काले रंग की चूड़ियां। यह राजस्थान के गंगानगर जिले में (पूर्व हनुमानगढ़ जिला) घग्घर नदी के तट पर स्थित है। इसका उत्खनन बी. वी. लाल तथा बी. के. थापर द्वारा करवाया गया। यहाँ से प्राक हड़प्पा कालीन तथा हड़प्पा कालीन संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं।

हड़प्पा सभ्यता की कला

कालीबंगा में प्राक हड़प्पाई संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है-“एक जुते हुए खेत का साक्ष्य” इसकी जुताई आड़ी-तिरछी की गई थी, जिससे दो फसलों को एक साथ बोये जाने का अनुमान लगाया जाता है।

कालीबंगा के दुर्ग टीले के दक्षिणी भाग में मिट्टी एवं कच्ची ईंटों के बने पाँच चबूतरे मिले हैं, जिनके ऊपर कई हवन कुण्ड बने मिले हैं जो कि आयताकार है।

दुर्ग टीले के दक्षिण पश्चिम में एक कब्रिस्तान स्थित है। यहाँ से शव विसर्जन के 37 उदाहरण मिलते हैं। अन्त्येष्टि संस्कार की तीन विधियां प्रचलित थीं-पूर्ण समाधिकरण, आंशिक समाधिकरण एवं दाह संस्कार। एक युगल शवाधान भी प्राप्त हुआ है। कुछ अण्डाकार कब्रें भी प्राप्त हुई हैं।

यहाँ के मकान कच्ची ईंटों के बने थे। नगर टीले में अलंकृत ईंटों के साक्ष्य मिले हैं। इसके अतिरिक्त लघु पाषाण उपकरण, माणिक्य एवं मिट्टी के मनके, काँच एवं मिट्टी की चूड़ियां, साँड़ की खण्डित मृण्मूर्ति, सिलबट्टे आदि के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

6-बनवाली

यह स्थल हरियाण के हिसार जिले में सरस्वती नदी के किनारे स्थित था। इसकी खोज 1974 में आर. एस. विष्ट ने की। यहाँ से मिट्टी का हल तथा बढ़िया किस्म का जौ प्राप्त हुआ है। यहाँ से जल निकास प्रणाली का कोई प्रमाण नहीं मिला है। यहाँ से प्राक हड़प्पा, हड़प्पा तथा हड़प्पोतर काल के प्रमाण मिले हैं। बनावली के मकानों से कई अग्निवेदियां मिली है।

7-धौलावीरा

यह कच्छ के रण के मध्य स्थित “खडीर” द्वीप के उत्तर पश्चिमी कोने पर  स्थित है। 100 हेक्टेयर में बसे धौलावीरा के टीलों की खोज 1968 में  j P जोशी ने की। तथा इसका उत्खनन रविन्द्र सिंह विष्ट ने 1990 में करवाया।

भारत मे स्थित सिन्धु सभ्यता का यह दूसरा सबसे बड़ा स्थल है। इस नगर की योजना समानान्तर चतुर्भज के रूप में की गई थी। नगर के चारों ओर एक मजबूत दीवार के साक्ष्य मिलते हैं।

धौला का अर्थ होता है-सफेद तथा वीरा का अर्थ होता है- कुआँ। यहाँ से पॉलिसदार श्वेत पाषाण खण्ड बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं तथा यहाँ के टीले पर एक पुराना कुआँ है, जिसके कारण इसका नाम धौलावीरा पड़ गया।

इस नगर को तीन भागों किला, मध्यनगर तथा निचला नगर में विभाजित किया गया है। यहाँ के उत्खनन से हड़प्पा संस्कृति के तीन चरणों का पता चलता है। यहाँ से घोड़े के अवशेष मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र “क्रीड़ागार” कालीबंगा से ही प्राप्त होता है। यहाँ से “नेवले की पत्थर की मूर्ति” भी पायी गयी है।

हड़प्पा संस्कृति की विशेषताएं

धौलावीरा की सबसे बड़ी विशेषता थी-उन्नत जल प्रबन्ध व्यवस्था। यहाँ पर एक विशाल जलाशय मिला है इसका आकार 80 मीटर × 12 मीटर तथा गहराई 7.5 मीटर थी। इसमें 2 लाख 50 हजार घन मीटर पानी जमा करने की अद्भुद क्षमता थी।

धौलावीरा के निवासी जल संरक्षण की तकनीकि जानते थे, उन्होंने बाँध बनाये और जलाशयों में पानी संग्रहित किया। धौलावीरा के नगर के पश्चिम की ओर स्थित कब्रिस्तान के उत्खनन से कई तरह के शवाधान मिले हैं। जो धौलावीरा की विशिष्ट विशेषता है।

8-रोपड़

यह भारत के पंजाब प्रान्त के रोपड़ जिले में सतलज नदी के बाएं तट पर स्थित है। इसका उत्खनन 1953-56 में यज्ञ दत्त शर्मा ने करवाया। इसका आधुनिक नाम रूप नगर है। यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तन, ताँबे की कुल्हाड़ी महत्वपूर्ण है। यहाँ के एक कब्रिस्तान से मनुष्य के साथ पालतू कुत्ते को दफनाए जाने के साक्ष्य मिलते हैं। मकानों के अवशेषों से लगता है कि यहाँ के मकान पत्थर और मिट्टी से बनाये गये थे।

9-रंगपुर

अहमदाबाद जिले में भादर नदी पर स्थित इस स्थल की खोज 1964 में रंगनाथ राव ने की। यहाँ से धान की भूसी के ढेर मिले हैं।

10-आलमगीरपुर

यह मेरठ जिले में हिण्डन नदी के तट पर स्थित है। इसकी खोज भारत सेवक समाज द्वारा की गयी तथा इसका उत्खनन 1958 में यज्ञ दत्त शर्मा के निर्देशन में करवाया गया। यह हड़प्पा संस्कृति का सर्वाधिक पूर्वी स्थल है।

11-सुरकोटडा

यह गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। इसकी खोज 1964 ने जगपति जोशी ने की। इस स्थल से सिन्धु सभ्यता के पतन के अवशेष परिलक्षित होते हैं। यहाँ से घोड़े के अस्थि पंजर प्राप्त हुए है तथा एक अनोखी कब्रगाह मिली है। कब्र बनाने के लिए अण्डाकार गड्डा खोदकर उसमें मानव की हड्डियों से भरे हुए कलस रखे जाते थे। एक कब्र बड़े आकार की शिला से ढकी हुई मिली है।

12-नौसरो

इस स्थान से स्त्रियों की मिट्टी की कुछ ऐसी मूर्तियां पायी गयी है। जिनकी मांग में सिंदूर भरा हुआ है।

13-सुतकागेंडोर-यह एक बन्दरगाह नगर था।

14-बालाकोट-यह भी एक बन्दरगाह नगर था। यहाँ का सीप उद्योग प्रसिद्ध था।