कर्नाटक का तीसरा युद्ध-Third battle of karnataka

कर्नाटक का तीसरा युद्ध आस्ट्रिया और प्रशा के बीच 1756 ई. में शुरू हुए सप्तवर्षीय युद्ध का प्रसार मात्र था। इस युद्ध में फ्रांस आस्ट्रिया की ओर से तथा इंग्लैंड प्रशा की ओर से था।

यूरोप में फ्रांस और इंग्लैंड के आमने सामने होने के कारण भारत में भी अंगेजों और फ्रांसीसियों के मध्य युद्ध प्रारम्भ हो गया।

भारत में अंग्रेजों के प्रभाव को कम करने के लिए फ्रांसीसी सरकार ने 1757 ई. में काउण्ट-डी-लाली को एक विशाल सेना के साथ भारत भेजा। लाली अप्रैल 1758 ई. में भारत पहुँचा।

 

फ्रांसीसियों की फोर्ट सेण्ट डेविड पर विजय

भारत पहुँचते ही लाली ने अंग्रेजों के फोर्ट सेण्ट डेविड को जून 1758 ई. में जीत लिया। इसके बाद लाली ने तंजौर का घेरा डाला। किन्तु वह तंजौर विजय करने में असफल रहा। इस असफलता से फ्रांसीसी प्रभाव को काफी हानि पहुँची।

अब लाली ने मद्रास पर आक्रमण करने की सोची। अतः उसने युद्ध में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए हैदराबाद से बुस्सी को बुला लिया। यह लाली की बहुत बड़ी भूल थी। क्योंकि हैदराबाद से बुस्सी के हट जाने के कारण हैदराबाद में फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त हो गया।

फ्रांसीसियों ने मद्रास का घेरा डाला। किन्तु लाली को यहाँ भी असफलता हाथ लगी। दूसरी ओर समुद्र में भी पोकॉक के नेतृत्व में अंग्रेजी बेड़े ने डआश के नेतृत्व वाले फ्रांसीसी बेड़े को तीन बार पराजित किया तथा उसे लौटने के लिए बाध्य कर दिया।

कर्नाटक का तीसरा युद्ध

मद्रास के घेरे के एक वर्ष बाद तक अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच छोटी-छोटी झड़पें होती रही। जिसमें फ्रांसीसियों की स्थिति निरन्तर ही खराब होती गयी।

1760 ई. में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच एक निर्णायक युद्ध हुआ। यह मद्रास तथा पांडिचेरी के मध्य स्थित वांडिवास नामक स्थान पर लड़ा गया। इस युद्ध में अंग्रेज सेना का नेतृत्व सर आयरकूट के हाथ में था। इस युद्ध में फ्रांसीसी बुरी तरह से पराजित हुए।

सेनापति बुस्सी को युद्धबन्दी बना लिया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने 1761 ई. में पांडिचेरी, माहे तथा अगले एक वर्ष में भारत में फ्रांसीसियों से सारे भू-भाग छीन लिये।

पेरिस की सन्धि-1763 ई.

यूरोप में चल रहे सप्तवर्षीय युद्ध का अन्त 10 फरवरी 1763 ई. में पेरिस की सन्धि के साथ हो गया। अतः भारत में भी युद्ध समाप्त हो गया।

अंग्रेजों ने चन्द्रनगर को छोड़कर शेष सभी प्रदेश जो 1749 ई. तक फ्रांसीसियों के अधिकार में थे, उन्हें  लौटा दिये। किन्तु यह शर्त लगा दी कि अब फ्रांसीसी भारत में सेना नहीं रखेंगे और न ही किलेबन्दी करेंगे।

इस प्रकार कर्नाटक का तृतीय युद्ध निर्णायक सिद्ध हुआ। इस युद्ध ने भारत में फ्रांसीसियों की शक्ति का पूर्ण रूप से पतन कर दिया। अंग्रेजों के लिए भारत में मार्ग प्रशस्त हो गया क्योंकि पुर्तगालियों और डचों को तो वे पहले ही पराजित कर चुके थे।