मौलिक अधिकार-संविधान में मूल अधिकारों का वर्णन-Fundamental Rights

वे अधिकार जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक तथा अनिवार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए जाते हैं और जिन अधिकारों में राज्य द्वारा भी हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, मूल अधिकार कहलाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को वैश्विक मानवाधिकारों की घोषणा की गई थी। इसलिए प्रत्येक 10 दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है।

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकारों के वर्णन किया गया है। मूल भारतीय संविधान में कुल 7 मौलिक अधिकार थे। किन्तु 44 वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों से हटा दिया गया। वर्तमान में मूल अधिकारों की संख्या 6 है।

 

अनुच्छेद-12 में राज्य शब्द को परिभाषित किया गया है। जबकि अनुच्छेद-13 मूल अधिकारों से असंगत विधियों से सम्बंधित है। अनुच्छेद-13 मूल अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध न्यायालयों (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय) को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति प्रदान करता है।

1-समानता का मूल अधिकार – अनुच्छेद 14 से 18 तक

अनुच्छेद-14 – विधि के समक्ष समता

राज्य सभी व्यक्तियों के लिए एकसमान कानून बनायेगा तथा उन पर एक समान लागू करेगा।

अनुच्छेद-15, केवल धर्म , मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर नागरिकों के मध्य विभेद करने से राज्य को रोकता है।

अनुच्छेद-16, लोक नियोजनों के विषय में अवसर की समानता

अनुच्छेद-17, अस्पृश्यता का अन्त

अनुच्छेद-18, उपाधियों का अन्त

2-स्वतंन्त्रता का मूल अधिकार – अनुच्छेद 19 से 22 तक

अनुच्छेद-19, कुल 6 मूलभूत स्वतन्त्रताओं को प्रदान करता है।

वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

शान्तिपूर्ण एवं निरायुध सम्मेलन की स्वतन्त्रता

संगठन या संघ बनाने की स्वतन्त्रता

भारत के राज्य क्षेत्र में अबाध संचरण की स्वतन्त्रता

भारत के किसी राज्य क्षेत्र के भाग में निवास करने या बस जाने की स्वतंत्रता

कोई भी व्यापार या जीविका चलाने की स्वतंत्रता

अनुच्छेद-20, अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण प्रदान करता है।

अनुच्छेद-21, प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता को संरक्षित करता है।

अनुच्छेद-21क, 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करता है। इसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा अन्तः स्थापित किया गया।

अनुच्छेद-22, कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण प्रदान करता है।

3-शोषण के विरूद्ध मूल अधिकार – अनुच्छेद 23 व 24

अनुच्छेद-23, मानव दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिषेध करता है।

अनुच्छेद-24, कारखानों आदि और जोखिम पूर्ण कार्यो में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध करता है।

4-धार्मिक स्वतंन्त्रता का मूल अधिकार – अनुच्छेद 25 से 28 तक

अनुच्छेद-25, अंतः करण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है।

अनुच्छेद-26, धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतन्त्रता प्रदान करता है।

अनुच्छेद-27, धर्म की अभिवृद्धि हेतु करों से छूट की स्वतंत्रता के बारे में है।

अनुच्छेद-28, शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक स्वतन्त्रता सुनिश्चित करता है।

5-शिक्षा एवं संस्कृति का मूल अधिकार – अनुच्छेद 29 व 30

अनुच्छेद-29, अल्पसंख्यक वर्गों के हितों को संरक्षण दिया गया है।

अनुच्छेद-30, अल्पसंख्यक वर्गों शिक्षण संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है।

6-संवैधानिक उपचारों का मूल अधिकार – अनुच्छेद 32 (डॉ. अम्बेडकर ने इसे संविधान की आत्मा कहा है।)

44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा सम्पत्ति के मूल अधिकार को समाप्त कर दिया गया। सम्पत्ति का अधिकार अनुच्छेद- 19(1)च तथा अनुच्छेद -31 था। अब सम्पत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300क के तहत एक विधिक अधिकार है। अतः वर्तमान में भारतीयों को कुल 6 मूल अधिकार प्राप्त हैं।

समानता का मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता के मूल अधिकारों की बात करता है। ये अधिकार निम्नलिखित हैं।

विधि के समक्ष समता-अनुच्छेद-14

“राज्य किसी व्यक्ति को भारतीय राज्य क्षेत्र में विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा”।

नीति निदेशक तत्व

अनुच्छेद-14 द्वारा प्रदत्त अधिकार व्यक्तियों को प्राप्त है। अर्थात यह अनुच्छेद नागरिकों, अनागरिकों एवं विधिक व्यक्तियों जैसे कम्पनी, व्यक्ति समूह आदि सभी पर लागू होता है।

अनुच्छेद -14 के वाक्यांश “विधि के समक्ष समता” को ब्रिटेन के संविधान से लिया गया है। यह प्रो. डायसी के “विधि के शासन के समरूप है तथा एक अन्य वाक्यांश “विधियों के समान संरक्षण” को अमेरिका के संविधान से लिया गया है। इसका तात्पर्य यह है कि समान परिस्थिति वाले व्यक्ति को समान विधियों के अधीन रखना तथा समान रूप से लागू करना।

न्यायमूर्ति पतंजलि शास्त्री ने विधियों के समान संरक्षण को  विधि के समक्ष समता का ही एक उपसिद्धान्त कहा। दोनों का एक ही उद्देश्य है – समान न्याय

अनुच्छेद-14 मूल सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। इसमें नैसर्गिक न्याय का सिद्धान्त अन्तर्निहित है। अनुच्छेद 14 में निहित “विधि का शासन” को संविधान का आधारभूत ढांचा घोषित किया गया है।

(मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 1980)

अनुच्छेद-14 वर्ग विभेद की अनुमति नहीं देता है। अर्थात एक वर्ग के व्यक्तियों में कोई विभेद नहीं किया जा सकता है। किन्तु वर्गीकरण की अनुमति देता है लेकिन वर्गीकरण अयुक्तियुक्त और स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिए।

ई. पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य के वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि “समता और स्वेच्छाचारिता” एक दूसरे के  शत्रु हैं।

वर्गीकरण के युक्ति संगत आधार

अनुच्छेद-14 के अनुसार  वर्गीकरण बोधगम्य अन्तरक पर आधारित हो तथा अन्तरक और अधिनियम के उद्देश्य में तार्किक सम्बन्ध हो। वर्गीकरण निम्न आधार पर किया जा सकता है।

भौगोलिक स्थिति के आधार पर

राज्य के पक्ष में

कराधान विधियों के सम्बन्ध में

प्रशासनिक अधिकारियों की वैवेकीय शक्ति के सम्बन्ध में

ऐतिहासिक आधार पर

विशेष न्यायालय और प्रक्रिया के सम्बन्ध में

शिक्षा के आधार पर

व्यक्तियों की प्रकृति के आधार पर

चिरंजीत लाल बनाम भारत संघ के वाद में यह निर्णय दिया गया कि एक व्यक्ति स्वयं एक वर्ग माना जायेगा।

धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध-अनुच्छेद -15

अनुच्छेद 15 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार केवल नागरिकों के लिए हैं। अर्थात (अनुच्छेद-15(1) के अनुसार) राज्य केवल नागरिकों के मध्य धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग,जन्म स्थान अथवा इनमें से किसी आधार पर विभेद नहीं करेगा। जबकि अनागरिकों या अन्य व्यक्तियों के साथ विभेद कर सकता है।

अनुच्छेद15(2), यह नागरिकों तथा राज्य दोनों को भेदभाव करने से रोकता है। इसके अनुसार, कोई भी नागरिक किसी अन्य नागरिक को धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग,जन्म स्थान या इनमें से किसी आधार पर निम्न में प्रवेश करने या उपयोग करने से नहीं रोक सकता है।

दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों, सार्वजनिक मनोरंजन के स्थलों

राज्य निधि से पोषित या सार्वजनिक उपयोग हेतु समर्पित जैसे कुआँ, तालाब, स्नानघाट, सड़क या सार्वजनिक समागम स्थल आदि।

अनुच्छेद-15(3),15(4) तथा 15(5) अनुच्छेद 14 तथा अनुच्छेद -15(1) व 15(2) के अपवाद हैं। ये राज्य को संरक्षणात्मक भेदभाव की करने की अनुमति देते हैं।

नागरिकों के कर्तव्य

अनुच्छेद-15(3), राज्य स्त्रियों और बच्चों के लिए विशेष उपबन्ध कर सकता है।

अनुच्छेद-15(4), राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ों, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।

अनुच्छेद-15(5), इसे 93वें संविधान संशोधन अधिनियम 2005 द्वारा जोड़ा गया। यह प्राइवेट शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान करता है।

अवसर की समानता-अनुच्छेद-16

अनुच्छेद-16 लोक नियोजन में अवसर की समानता का उपबन्ध करता है। यह अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त है।

अनुच्छेद-16(1) तथा 16(2) में अवसर की समानता के मूल अधिकार का वर्णन किया गया है। जबकि अनुच्छेद-16(3), 16(4) व 16(5) इसके अपवाद हैं।

अनुच्छेद-16(1), सब नागरिकों को सरकारी पदों पर नियुक्ति के समान अवसर प्राप्त होंगे। यह नियम पदोन्नति, पदच्युति, वेतन, अवकाश, पेंशन आदि पर भी लागू होता है।

अनुच्छेद-16(2), अनुच्छेद-16(1) के सम्बन्ध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान, उद्भव एवं निवास के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं किया जाये गा। किन्तु राज्य किसी पद के लिए अहर्ताओं और मापदण्डों का निर्धारण कर सकता है। अहर्ता पद की प्रकृति के अनुसार होनी चाहिए। इस प्रकार अनुच्छेद-16 अनुच्छेद-15 से व्यापक है क्योंकि इसमें उद्भव व निवास के आधार पर भी विभेद को निषेध किया गया है।

अनुच्छेद-16(3), यह अनुच्छेद-16(2) का अपवाद है।  यह संसद को शक्ति प्रदान करता है कि वह विधि द्वारा किसी राज्य की कुछ सरकारी सेवाओं में निवास की अहर्ता विहिप कर सकती है। इस शक्ति के माध्यम से संसद ने लोक नियोजन अधिनियम 1957 पारित किया।

अनुच्छेद-16(4), इसमें पिछड़े वर्गों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार राज्य जाति के आधार पर विभेद कर सकता है।

संविधान की प्रस्तावना

अनुच्छेद-16(5), यह राज्य को धर्म के आधार पर विभेद की अनुमति देता है। राज्य किसी विशिष्ट धार्मिक या साम्प्रदायिक संस्था में उसी विशिष्ट धर्म या सम्प्रदाय के लोगों के नियोजन का प्रावधान कर सकता है।

अस्पृश्यता का अन्त-अनुच्छेद-17

सामाजिक समानता को और अधिक पूर्णता देने के लिए अस्पृश्यता का निषेध किया गया है। अनुच्छेद 17 में कहा गया है कि ’’अस्पृश्यता का अन्त किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी अयोग्यता को लागू करना एक दण्डनीय अपराध होगा।’’।

अनुच्छेद-35 संसद को अस्पृश्यता के सम्बन्ध में विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है। इसके तहत संसद ने अस्पृश्यता अपराध अधिनियम-1955 पारित किया। इसके अनुसार अस्पृश्यता का अपराध दण्डनीय है। 1976 में इसमें संशोधन करके इसका नाम सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम-1955 कर दिया गया। 1989 में इस कानून को और अधिक कठोर बनाते हुए इसे अनुसूचित जाति व जनजाति निरोधक कानून 1989 का नाम दे दिया गया। यह कानून अस्पृश्यता के अन्त के लिए अब तक बनाये गये कानूनों में सबसे अधिक कठोर है।

उपाधियों का अन्त-अनुच्छेद-18

अनुच्छेद 18 में व्यवस्था की गई है कि ’’सेना अथवा विद्या सम्बन्धी उपाधियों के अलावा राज्य अन्य कोई उपाधियां प्रदान नहीं कर सकता।’’ (अनुच्छेद-18(1) ] इसके साथ ही भारत का कोई नागरिक बिना राष्ट्रपति की आज्ञा के विदेशी राज्य से भी कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता। [अनुच्छेद-18(2)]

अनुच्छेद-18(3), ऐसे विदेशी व्यक्तियों के बारे में है जो भारत में कोई लाभ या विश्वास का पद धारण करता है। ऐसा व्यक्ति बिना राष्ट्रपति की सहमति के विदेशी राज्य की उपाधि धारण नहीं करेगा।

अनुच्छेद 18 की उपर्युक्त व्यवस्था के बावजूद भारत में 1950 से ही भारत सरकार द्वारा भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पदम् श्री की उपाधियां प्रदान की जाती रही है। बालाजी राघवन बनाम भारत संघ 1996 के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इस सम्बन्ध में कहा है कि, ’उपाधियां प्रदान करने की यह व्यवस्था संविधान के प्रतिकूल नहीं है, लेकिन इस सम्बन्ध में शासन की समस्त कार्य विवेक संगत रूप में और उचित मापदण्डों पर आधारित होना चाहिए।’

स्वतंन्त्रता का मौलिक अधिकार

अनुच्छेद -19 से 22 स्वतन्त्रता के अधिकार से सम्बन्धित हैं।

अनुच्छेद-19, कुल 6 मूल स्वतन्त्रताओं को प्रदान करता है। अनुच्छेद-19 के दो भाग हैं। अनुच्छेद-19(1)क से छ तक जिसमें  स्वतन्त्रता के मूल अधिकारों का वर्णन किया गया है।

अनुच्छेद-19(2) से (6) जिसमें स्वतन्त्रता के मूल अधिकारों पर निर्बन्धन लगाया गया है। अनुच्छेद-19 द्वारा प्रदत्त अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं।

भारतीय संविधान की विशेषताएं

वाक् एवं अभिव्यक्ति के स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-19(1)क

वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अर्थ है। अपने विचारों और दृष्टिकोण को व्यक्त करने का अधिकार। विचारों की अभिव्यक्ति किसी भी माध्यम से की जा सकती है। निम्न को भी वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अन्तर्गत मूल अधिकार माना गया है।

प्रेस की स्वतन्त्रता (साकल पेपर्स लि. बनाम भारत संघ-1962 के वाद में प्रेस की स्वतन्त्रता को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के तहत मूल अधिकार माना गया।)

44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा व्यवस्था की गई  कि प्रेस संसद तथा राज्य विधान मण्डलों की कार्यवाही के प्रकाशन के सम्बन्ध में पूर्ण स्वतन्त्र है और राज्य के द्वारा इस सम्बन्ध में प्रेस पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकेगा।

राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार (भारत संघ बनाम नवीन जिंदल-2004)

वाणिज्यिक विज्ञापन की स्वतन्त्रता

जानने का अधिकार

मतदाता को सूचना का अधिकार (उम्मीदवारों के सम्बन्ध में)

चुप रहने का अधिकार (विजय इमैनुअल बनाम केरल राज्य-1986 के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी को राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, यदि उसका धार्मिक विश्वास ऐसा करने की अनुमति नहीं देता है। राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य करना वाक् स्वतन्त्रता का उल्लंघन होगा।)

सूचनाओं तथा समाचारों को जानने का अधिकार

विदेश जाने का अधिकार (मेनका गांधी बनाम भारत संघ)

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा किसी घटना को प्रसारित करने का अधिकार

धरना प्रदर्शन का अधिकार (शान्तिपूर्ण)

अनुच्छेद-19(2) अनुच्छेद-19(1)क पर कुछ निर्बन्धन लगाता है। निम्न में से किसी एक या अधिक के प्रभावित होने पर राज्य वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर निर्बन्धन लगा सकता है।

भारत की प्रभुता एवं अखण्डता

राज्य की सुरक्षा

विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध

लोक व्यवस्था

शिष्टाचार एवं सदाचार के हित में

न्यायालय का अवमान

मानहानि

अपराध उद्दीपन के सम्बन्ध में

सभा एवं सम्मेलन की स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-19(1)ख

व्यक्तियों के द्वारा अपने विचारों के प्रचार के लिए शान्तिपूर्वक और बिना किन्हीं शस्त्रों के सभा या सम्मेलन किया जा सकता है तथा उनके द्वारा जुलूस या प्रदर्शन का आयोजन भी किया जा सकता है। यह स्वतन्त्रता भी असीमित नहीं है और राज्य के द्वारा अनुच्छेद-19(3) के अन्तर्गत निम्न आधार पर निर्बन्धन लगाया जा सकता है।

भारत की प्रभुता और अखण्डता के प्रभावित होने पर

लोक व्यवस्था के हित में

संघठन या संघ बनाने की स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-19(1)ग

यह अनुच्छेद नागरिकों को संगठन या संघ बनाने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। इसी अधिकार के तहत राजनैतिक दलों, श्रमिक संगठनों, कम्पनी आदि का गठन किया जाता है।

संविधान पर विदेशी प्रभाव

अनुच्छेद-19(4) के माध्यम से राज्य निम्न आधार पर इस पर निर्बन्धन लगा सकता है।

भारत की प्रभुता और अखण्डता

लोकव्यवस्था

सदाचार के हित में

संचरण की स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-19(1)घ

इसके अनुसार, भारत के समस्त नागरिकों को भारत में बिना किसी प्रतिबन्ध के घूमने की स्वतन्त्रता प्राप्त होगी। परन्तु राज्य अनुच्छेद-19(5) के अन्तर्गत निम्नलिखित आधार पर निर्बन्धन लगा सकता है।

साधारण जनता के हित में

किसी अनुसूचित जनजाति के हितों के संरक्षण के लिए

निवास की स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-19(1)ड़

इस अनुच्छेद में नागरिकों को भारत में कहीं भी बस जाने की स्वतन्त्रता दी गई है।

कोई वृत्ति, आजीविका या कारोबार करने की स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-19(1)छ

अनुच्छेद-19(1)छ  भारत के सभी नागरिकों को अपनी इच्छा अनुसार कोई भी वृत्ति या उपजीविका या कारोबार करने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। किन्तु राज्य साधारण जनता के हित में इस पर कुछ प्रतिबन्ध लगा सकता है। तथा कोई ऐसी विधि बना सकता है। जो  किसी वृत्ति या कारोबार से सम्बन्धित योग्यता का निर्धारण करती हो।

दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण- अनुच्छेद-20

अनुच्छेद-20 अपराध के लिए दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण प्रदान करता है। इसके अन्तर्गत 3 प्रकार के संरक्षण प्रदान किये गए हैं।

कार्योत्तर विधियों से संरक्षण- अनुच्छेद-20(1)

“किसी व्यक्ति को उस समय तक अपराधी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि उसने अपराध के समय में लागू किसी कानून का उल्लंघन न किया हो।’’ अर्थात केवल वर्तमान समय में प्रवत्त किसी विधि का अतिक्रमण करने पर ही दोषसिद्ध किया जायेगा अन्यथा नहीं।

यदि कोई ऐसा कार्य जो करते समय अपराध नहीं है। किन्तु कुछ समय पश्चात् बनाई गई किसी विधि के अधीन अपराध  है तो विधि बनने से पूर्व किये गए उस कार्य के लिए व्यक्ति को वर्तमान विधि के अनुसार अपराधी नहीं माना जाये गा। अर्थात दाण्डिक विधि भूतलक्षी प्रभाव से लागू नहीं की जा सकती है।

दोहरे दण्ड से संरक्षण-अनुच्छेद-20(2)

किसी व्यक्ति को एक अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा। यह अंग्रेजी विधि के सिद्धान्त पर आधारित है। इसे दोहरा संकट का सिद्धान्त कहते हैं। दोहरे दण्ड से संरक्षण न्यायालय या न्यायिक अधिकरण के समक्ष की कार्यवाहियों पर ही प्राप्त होता है। विभागीय, अनुशासनिक या अन्य कार्यवाहियों पर नहीं।

आत्म अभिशंसन से संरक्षण- अनुच्छेद-20(3)

किसी अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए विवश नहीं किया जायेगा। यदि अभियुक्त स्वेच्छा से साक्ष्य देता है तो वह वर्जित नहीं है।

प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-21

किसी व्यक्ति को उसके प्राण एवं दैहिक स्वतन्त्रता से “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। अन्यथा नहीं।

अनुच्छेद-21 विधायिका तथा कार्यपालिका दोनों के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। यह संरक्षण सभी व्यक्तियों को प्राप्त है।(नागरिक तथा विदेशी दोनों)

मेनका गांधी बनाम भारत संघ-1978 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि किसी व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करने वाली विधि में निम्न लिखित शर्ते होनी चाहिए।

भारतीय राज्य क्षेत्र

विधि में प्रक्रिया विहिप होनी चाहिए

प्रक्रिया नैसर्गिक, न्यायपूर्ण और युक्तियुक्त होनी चाहिए

विधि अनुच्छेद-14 व अनुच्छेद-19 के अनुरूप होनी चाहिए।

अनुच्छेद-21 के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों को भी मूल अधिकार माना गया है।

विदेश जाने का अधिकार

एकान्तता का अधिकार

जीविकोपार्जन का अधिकार

शिक्षा पाने का अधिकार

निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार

चिकित्सा सहायता पाने का अधिकार

आश्रय का अधिकार

निःशुल्क खाद्य सामग्री पाने का अधिकार(जो भूख से पीड़ित हैं।)

शिक्षा का अधिकार- अनुच्छेद-21क

86वें संविधान संशोधन अधिनियम-2002 द्वारा अनुच्छेद-21क के अन्तर्गत शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया। अनुच्छेद-21क के अनुसार राज्य 6 से 14 वर्ष के सभी बालकों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का उपबन्ध करेगा।

गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण-अनुच्छेद-22

अनुच्छेद-22 गिरफ्तार किये गए व्यक्तियों के अधिकार एवं स्वतन्त्रता से सम्बन्धित है। यदि अनुच्छेद-21 द्वारा किसी व्यक्ति को “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया ” के अन्तर्गत प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित किया जाता है। तब भी उसे अनुच्छेद-22 द्वारा प्रदत्त अधिकार एवं स्वतंत्रताएँ उपलब्ध रहती हैं।

अनुच्छेद-22 में दो प्रकार की गिरफ्तारियां वर्णित हैं।

★सामान्य दाण्डिक विधि के अधीन

अनुच्छेद-22(1) तथा अनुच्छेद-22(2) में सामान्य दाण्डिक विधि के अधीन गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों का वर्णन किया गया है। ये अधिकार निम्नलिखित हैं।

गिरफ्तारी के कारण जानने का अधिकार

अपनी रूचि के विधि अधिवक्ता से परामर्श लेने का अधिकार

गिरफ्तारी के 24 घंटे के अन्दर(यात्रा का समय छोड़कर) निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किये जाने का अधिकार

मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना 24 घण्टे से अधिक समय तक गिरफ्तार न रखने का अधिकार

★निवारक निरोध विधि के अधीन

अनुच्छेद-22(3), 22(4), 22(5), 22(6) व 22(7) में निवारक निरोध विधि का वर्णन है। इसके अनुसार किसी व्यक्ति को अपराध करने से पूर्व सन्देह के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता है।

शोषण के विरुद्ध मौलिक अधिकार

अनुच्छेद-23 व 24 शोषण के विरुद्ध मूल अधिकार प्रदान करता है।

बलातश्रम का प्रतिषेध- अनुच्छेद-23(1)

अनुच्छेद-23(1) में मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य बलातश्रम को निषिद्ध कर दिया गया है। तथा इसका उल्लंघन अपराध घोषित किया गया है।

अनुच्छेद 23 द्वारा प्राप्त संरक्षण राज्य तथा व्यक्ति दोनों के विरुद्ध हैं। अर्थात न तो राज्य किसी व्यक्ति को बलातश्रम के लिए विवश करेगा और न ही व्यक्ति किसी व्यक्ति को।

मानव दुर्व्यापार तथा बेगार शब्द में निम्नलिखित सम्मिलित हैं।

दासप्रथा

बेगार अथवा बलातश्रम

मनुष्यों का वस्तुओं की भाँति क्रय-विक्रय

स्त्रियों एवं बच्चों का अनैतिक व्यापार

बंधुआ-मजदूरी

अनुच्छेद-35 के अन्तर्गत संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह अनुच्छेद-23 के उल्लंघन के सम्बन्ध में विधि बनाकर दण्ड निर्धारित कर सकती है। संसद ने अपने इस अधिकार का प्रयोग कर “बंधुआ मजदूरी प्रणाली उन्मूलन अधिनियम-1976” तथा “महिला एवं बाल अनैतिक व्यापार(निवारण) अधिनियम-1986” पारित किया।

भारत की नागरिकता

अनुच्छेद-23(2), अनुच्छेद-23(1) का अपवाद है इसके अनुसार राज्य को सार्वजनिक प्रयोजनों हेतु अनिवार्य सेवा लागू करने का अधिकार है। किन्तु राज्य ऐसी सेवा लागू करते समय केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर नागरिकों में विभेद नहीं करेगा।

बालकों के नियोजन का प्रतिषेध- अनुच्छेद-24

14 वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों, खानों अथवा अन्य किसी जोखिम पूर्ण कार्य में नियोजित नहीं किया जा सकता है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य 14 वर्ष से कम आयु के बालकों के स्वास्थ्य एवं जीवन की रक्षा करना तथा शोषण से बचाना है। अनुच्छेद-24 द्वारा आरोपित निषेध असीमित है। अर्थात इसका कोई अपवाद नहीं है।

धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान का भाग-3 अनुच्छेद-25 से 28 सभी व्यक्तियों (विदेशियों और भारतीयों) को धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार देता है।

42वें संविधान संशोधन-1976 द्वारा उद्देशिका में “पंथनिरपेक्ष” शब्द जोड़कर स्पष्ट किया गया है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखेगा। पंथनिरपेक्षता को सर्वप्रथम अमेरिका ने अपनाया था।

अन्तः करण आदि की स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-25

अनुच्छेद-25(1) सभी व्यक्तियों को अन्तः करण की स्वतन्त्रता (आन्तरिक स्वतन्त्रता) और धर्म के अबाध रूप से मानने (खुलकर आस्था और विश्वास की घोषणा करना),आचरण करने तथा प्रचार करने के अधिकार को प्रदान करता है।

धर्म के प्रचार करने से तात्पर्य है कि अपने धार्मिक विचार को दूसरों के समक्ष प्रकट करना तथा उस धर्म को मानने के लिए समझाना-बुझाना, किन्तु इसके अन्तर्गत लालच या दबाव के द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करना नहीं आता है।

धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार अत्यान्तिक नहीं है। राज्य निम्न आधार पर निर्बन्धन लगा सकता है।

लोक व्यवस्था के आधार पर

सदाचार के आधार पर

स्वास्थ्य के आधार पर

अनुच्छेद-25(2), राज्य को यह अधिकार देता है कि धार्मिक स्वतन्त्रता के होते हुए भी राज्य निम्नलिखत के सम्बन्ध में विधि का निर्माण कर सकता है।

धार्मिक आचरण से सम्बद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य लौकिक गतिविधि जिसका निर्धारण राज्य कर सकता है।

समाज कल्याण के हित में

हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं को उसके सभी वर्गों को खोलने के लिए

यहाँ हिन्दू शब्द के अन्तर्गत हिन्दू, सिक्ख, जैन तथा बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग आते हैं।

धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-26

अनुच्छेद-26 में धार्मिक कार्यों के प्रबन्धन की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। यह स्वतन्त्रता केवल धार्मिक सम्प्रदायों को प्राप्त है। अनुच्छेद-26 के अनुसार प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय या उसके अनुभाग को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त होंगे।

★धार्मिक और दानशील(पूर्त) प्रयोजनों के लिए संस्थानों की स्थापना और पोषण का अधिकार

★अपने धर्म विषयक कार्यों के प्रबन्धन का अधिकार

★जंगम और स्थावर सम्पत्ति के अर्जन और स्वामित्व का अधिकार

★अर्जित सम्पत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन का अधिकार

राज्य इन अधिकारों पर निम्न आधार पर निर्बन्धन लगा सकता है।

लोकव्यवस्था

सदाचार

स्वास्थ्य

राष्ट्रपति की शक्तियां

अनुच्छेद-26 द्वारा प्रदत्त अधिकार केवल व्यक्तियों द्वारा स्थापित संस्थाओं को प्राप्त है। यदि राज्य कोई संस्था स्थापित करता है तो उसे धार्मिक कार्यों के प्रबन्धन की स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होगी।

धार्मिक अभिवृद्धि हेतु कर मुक्ति- अनुच्छेद-27

किसी व्यक्ति की उस आय पर कर नहीं लगाया जायेगा। जिसका प्रयोग किसी विशेष धर्म या धार्मिक सम्प्रदाय की अभिवृद्धि के लिए किया गया हो।

शिक्षण संस्थाओं के बारे में स्वतन्त्रता- अनुच्छेद-28

अनुच्छेद-28(1) के अनुसार, राज्य निधि से पूर्णतः पोषित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा निषेध होगी। किन्तु अनुच्छेद-28(2) यह अधिकार देता है कि यदि किसी शिक्षण संस्था की स्थापना किसी ऐसे उद्देश्य के लिए हुई है। जिसके तहत उस संस्था में धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक है। तो ऐसी संस्था में धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है।

अनुच्छेद-28(3) के अनुसार, किसी व्यक्ति को, राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य निधि से सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान में दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा में भाग लेने या उसमें होने वाली धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जाये गा।

संस्कृति और शिक्षा से सम्बंधित मौलिक अधिकार

भारत की सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करने के उद्देश्य से संविधान में “संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार” को अनुच्छेद-29 व 30 के अन्तर्गत मूल अधिकार के रूप में स्थान दिया गया है।

अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण- अनुच्छेद-29

अनुच्छेद-29(1) के अनुसार, भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा, लिपि एवं संस्कृति को बनाये रखने का अधिकार होगा।

अनुच्छेद-29(2) शिक्षण संस्थानों में प्रवेश से सम्बन्धित है। इसके अनुसार कोई संस्था जो राज्य द्वारा पोषित या राज्य निधि से सहायता प्राप्त है, किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं करे गी।

अनुच्छेद-29 द्वारा दिये गये अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं।

शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार- अनुच्छेद-30

अनुच्छेद-30(1) के अनुसार भाषा या धर्म पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।

अनुच्छेद-30(2) के अनुसार राज्य किसी शिक्षण संस्था को सहायता देने में इस आधार पर भेद-भाव नहीं करेगा। कि उसका प्रबन्धन किसी अल्पसंख्यक वर्ग के हाथ में है। अनुच्छेद-30 द्वारा प्रदत्त अधिकार सभी व्यक्तियों को प्राप्त हैं।

संवैधानिक उपचारों का मौलिक अधिकार

अनुच्छेद-32 संवैधानिक उपचारों के अधिकार को प्रदान करता है। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मूल अधिकार है। संवैधानिक उपचारों के अधिकार को डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने संविधान का  हृदय और आत्मा कहा।

अनुच्छेद-32(1) व्यक्तियों को यह अधिकार देता है। कि वह उच्चतम न्यायालय में मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

अनुच्छेद-32(2) उच्चतम न्यायालय को अधिकार देता है कि वह मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए आदेश, निदेश या रिट जारी कर सकता है।

मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय निम्नलिखित 5 प्रकार की रिट जारी कर सकता है।

1-बन्दी प्रत्यक्षीकरण

यह रिट ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध जारी की जाती है, जिसने किसी व्यक्ति को अवैध रूप से बन्दी बनाया हो। बन्दी प्रत्यक्षीकरण का शाब्दिक अर्थ होता है – शरीर को प्रस्तुत किया जाये।

2-परमादेश

इसका अर्थ है -हम आदेश देते हैं। इस रिट का प्रयोग ऐसे अधिकारी, सरकार, निगम या अधीनस्थ को आदेश देने के लिए किया जाता है जो सार्वजानिक कर्तव्यों को करने से इंकार करता है।

3-प्रतिषेध

इसका शाब्दिक अर्थ होता है-मना करना। यह रिट वरिष्ठ न्यायालयों द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों या अर्ध न्यायिक अधिकरणों के विरुद्ध जारी की जाती है। इस रिट के द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों या न्यायिक अधिकरणों को ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने से रोका जाता है। जिसके प्रयोग का उसे अधिकार प्राप्त नहीं है। यह रिट केवल न्यायिक कृत्यों के विरुद्ध जारी की जाती है। और केवल उस स्थिति में जारी की जाती है जब कारवाही किसी न्यायालय या अधिकरण के समक्ष लम्बित हो।

4-उत्प्रेषण

इसका अर्थ होता है-पूर्णतया सूचित कीजिए। यह रिट भी अधीनस्थ न्यायालयों या न्यायिक अधिकरणों के विरुद्ध जारी की जाती है। इसके द्वारा वरिष्ठ न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय के मामलों को अपने पास भेजने के निर्देश देता है।

भारत का प्रधानमंत्री

प्रतिषेध तथा उत्प्रेषण दोनों रिटें अधीनस्थ न्यायालयों के विरुद्ध जारी की जाती है। किन्तु दोनों रिटों का उद्देश्य भिन्न भिन्न है।

प्रतिषेध रिट कार्यवाही के दौरान कार्यवाही को रोकने हेतु जारी की जाती है। जबकि उत्प्रेषण रिट कार्यवाही की समाप्ति पर निर्णय को रद्द करने हेतु जारी की जाती है।

5-अधिकार पृच्छा

इसका अर्थ होता है- आपका प्राधिकार क्या है? यह रिट ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जारी की जाती है, जो किसी लोकपद को अवैध रूप से धारण किये हुए है।

अनुच्छेद-33 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह विशिष्ट वर्गों के सम्बन्ध में प्रयोजनों की पूर्ति हेतु मूल अधिकारों को निर्बन्धित या निराकृत करने वाली विधि बना सकती है।

अनुच्छेद-34 भारत के किसी राज्य क्षेत्र में सेना विधि के लागू होने पर संसद की विधि बनाने की शक्ति के बारे में है।

अनुच्छेद-35 में संसद को शक्ति दी गयी है कि वे कार्य जो भाग -3 के अन्तर्गत अपराध घोषित किये गये है, दण्ड निर्धारित करने के लिए विधि बनायेगी।

मूल अधिकारों से सम्बन्धित सिद्धान्त

Question. आच्छादन का सिद्धान्त क्या है?

Answer. संविधान के प्रवर्तन के पूर्व से भारत में प्रवृत्त सभी विधियाँ जो भाग-3 के उपबन्धों से असंगत हैं, संविधान के लागू होने पर प्रभाव हीन हो जाती हैं। किन्तु अतीत कालीन संव्यवहारों के लिए यह विधि अस्तित्व में होती हैं। अर्थात मूल अधिकारों से असंगत संविधान पूर्व विधियाँ संविधान के लागू होने पर मूलाधिकारों से आच्छादित हो जाती हैं। और सुषुप्ता अवस्था में चली जाती हैं। आच्छादन हटने पर वह पुनर्जीवित हो जाती हैं।

भीखाजी बनाम मध्यप्रदेश राज्य (1955 )के वाद में सर्वोच्य न्यायालय ने आच्छादन का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। इसे ग्रहण का सिद्धान्त भी कहते हैं। पहले सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आच्छादन का सिद्धान्त केवल संविधान पूर्व विधियों पर लागू होगा। परन्तु गुजरात बनाम श्री अम्बिकामिल (1974) के वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि आच्छादन का सिद्धान्त संविधान पश्चात् विधियों पर भी लागू होगा।

Question. प्रथक्करणीयता का सिद्धान्त क्या है?

Answer. राज्य द्वारा निर्मित कोई ऐसी विधि जिसका एक भाग मूल अधिकारों का उलंघन करता हो और शेष भाग नहीं। इस स्थिति में न्यायालय द्वारा उस भाग को शून्य घोषित कर दिया जाये गा जो मूल अधिकारों का उलंघन करता है। अर्थात अधिनियम को वैध तथा अवैध भागों में प्रथक कर अवैध भाग को शून्य घोषित कर दिया जाता है। परन्तु शर्त यह है कि अवैध भाग को पृथक करने से अधिनियम का मूल उद्देश्य नष्ट न हो। यदि ऐसा होता है तो न्यायालय द्वारा पूरा अधिनियम ही शून्य घोषित कर दिया जायेगा।

Question. अधित्याग का सिद्धान्त क्या है?

Answer. इस सिद्धान्त के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपने मूल अधिकारों को स्वेच्छा से त्याग नहीं सकता है। क्योंकि मूल अधिकार संविधान द्वारा राज्य पर लगाये गए कर्तव्य है। कोई व्यक्ति राज्य को ऐसे कर्तव्यों से मुक्त नहीं कर सकता है।

IMPORTANT QUESTIONS

Question. मूल अधिकार क्या हैं?

Answer. मूल अधिकार वे अधिकार होते हैं, जो व्यक्ति के जीवन के लिए मूल तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये गये हैं। ये एक ही समय पर शासकीय शक्ति से व्यक्ति स्वातंत्र्य की रक्षा करते हैं और शासकीय शक्ति द्वारा व्यक्ति स्वातन्त्र्य को सीमित करते हैं। इस प्रकार मूल अधिकार व्यक्ति और राज्य के बीच सामंजस्य स्थापित कर राष्ट्रीय एकता और शक्ति में वृद्धि करते हैं।(एम. वी. पायली)

Question. मूल अधिकार का सर्वप्रथम विकास कहाँ हुआ था?

Answer. मूल अधिकार का सर्वप्रथम विकास ब्रिटेन में हुआ था। ब्रिटिश सम्राट “जान” ने 1215 ई. में एक “अधिकार पत्र(Manga Carta)  पर हस्ताक्षर कर इंग्लैंड वासियों को लिखित रूप से मूल अधिकार प्रदान किये थे। इसके द्वारा सम्राट ने ब्रिटिश नागरिकों को कुछ मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया था। मूल अधिकार से सम्बंधित यह प्रथम लिखित दस्तावेज था।

Question. बिल ऑफ राइट्स किससे सम्बन्धित है?

Answer. बिल ऑफ राइट्स मूल अधिकारों से सम्बन्धित एक अन्य दस्तावेज है। इसे 1689 ई. में लिखा गया था। इसमें विभिन्न सम्राटों द्वारा समय समय पर ब्रिटिश नागरिकों को दिये गए महत्वपूर्ण अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं का संकलन किया गया है।

Question. फ्रांस के नागरिकों को मूल अधिकार किस घोषणा पत्र द्वारा दिए गए थे?

Answer. फ्रांस में एक लम्बे संघर्ष के पश्चात् 1789 ई. में “मानव एवं नागरिकों के अधिकार घोषणा पत्र” द्वारा फ्रांस की जनता को कुछ मूल अधिकार प्रदान किये गये थे।

Question. फ्रांस के शासक लुई 16वें को किस कारण फाँसी दी गई थी?

Answer. मूल अधिकारों के उल्लंघन के कारण लुई 16वें को 1789 ई. में फाँसी दी गई थी।

Question. अमेरिकी संविधान में मूल अधिकारों को कब जोड़ा गया?

Answer. अमेरिका के मूल संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख नहीं था। 1791 ई. में अमेरिकी संविधान में संशोधनों द्वारा अधिकार पत्र (बिल ऑफ राइट्स) को जोड़कर मूल अधिकार का प्रावधान किया गया।

Question. अमेरिका के सर्वोच्य न्यायालय ने किस सिद्धान्त को प्रतिपादित कर राज्य को मूल अधिकारों पर निर्बन्धन लगाने की शक्ति प्रदान की।

Answer. राज्य शक्ति का सिद्धान्त

Question. सर्वप्रथम किस देश के संविधान में मूल अधिकारों का प्रावधान किया गया था?

Answer. अमेरिका के संविधान में 1791 ई. में (ब्रिटिश तथा फ्रांस में मूल अधिकारों को घोषणा पत्र द्वारा लागू किया गया था नाकि संवैधानिक प्रावधान द्वारा)

Question. मूल अधिकारों को कब निलंबित किया जा सकता है?

Answer. मौलिक अधिकार नैसर्गिक एवं अप्रतिदेय अधिकार है ये राज्यकृत्य विरुद्ध एक गारंटी के रूप में है। इन्हे केवल आपात स्थिति में निलंबित किया जा सकता है।

Question. क्या मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय है?

Answer. मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय है।  अर्थात मौलिक अधिकार वाद योग्य है।

Question. न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार किन-किन न्यायालयों को प्राप्त है?

Answer. अनुच्छेद-13 मूल अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध न्यायालयों को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति प्रदान करता है। प्रो. कारबिन के अनुसार” न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति न्यायालयों की वह शक्ति है जिसके अन्तर्गत वह विधानमंडल से पारित अधिनियमों की संवैधानिकता की जांच करता है।”

यह शक्ति केवल उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद-32) तथा उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद-226) को प्राप्त है।

Question. मूल अधिकारों का अल्पीकरण करने वाली विधियाँ किस अनुच्छेद के अन्तर्गत शून्य घोषित की गईं हैं?

Answer. अनुच्छेद -13

Question. मूल अधिकारों से असंगत कौन सी विधियाँ प्रारम्भ से ही शून्य होती हैं?

Answer. संविधानोत्तर विधियाँ

Question. भारत में सर्वप्रथम मूल अधिकारों की मांग किस विधेयक के माध्यम से की गयी?

Answer. भारत में मूल अधिकारों की मांग सर्वप्रथम संविधान विधेयक 1895 ई. के माध्यम से की गयी थी।

Question. भारतीयों को मूल अधिकार प्रदान करने की मांग 1895 के बाद कब और किसके द्वारा की गयी?

Answer. भारतीयों को मूल अधिकार प्रदान करने की मांग 1917 से 1919 के दौरान कांग्रेस द्वारा, 1925 ई. में श्रीमती एनीबेसेन्ट द्वारा(कॉमन वेल्थ ऑफ इंडिया बिल के माध्यम से), 1928 ई. में मोतीलाल नेहरू द्वारा(नेहरू रिपोर्ट के माध्यम से) तथा 1931 ई. में दूसरे गोल मेज सम्मेलन में गाँधी जी द्वारा यह मांग की गयी।

Question. कांग्रेस के किन अधिवेशनों में मूल अधिकार से सम्बन्धित प्रस्ताव पास किया गया?

Answer. 1927 ई. में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन तथा 1930 ई. के करांची अधिवेशन में मूल अधिकार से सम्बन्धित प्रस्ताव पास किया गया था।

Question. मूल अधिकारों की मांग को सरकार की किस समिति ने अस्वीकार कर दिया था?

Answer. 1934 ई. में ब्रिटिश सरकार की संयुक्त संसदीय समिति ने मूल अधिकारों की मांग को अस्वीकार कर दिया। अतः 1935 ई. के भारत शासन अधिनियम में मूल अधिकारों को शामिल नही किया गया।

Question. 1945 ई. में तेज बहादुर सप्रू ने संविधान से सम्बन्धित रिपोर्ट में किसकी वकालत की?

Answer. भारतीयों को मूल अधिकार दिए जाने की।

Question. संविधान सभा द्वारा किसकी अध्यक्षता में मूल अधिकार एवं अल्पसंख्यक अधिकार के सम्बन्ध में एक परामर्श समिति का गठन किया गया था?

Answer. सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में

Question. अल्पसंख्यक एवं मूल अधिकार पर परामर्श हेतु किसकी अध्यक्षता में उपसमिति का गठन किया गया था?

Answer. जे. बी. कृपलानी की अध्यक्षता में, इन समिति की सिफारिश के आधार पर भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकार सम्बन्धी प्रावधान किए गए।

Question. भारतीय संविधान के भाग -3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार किस देश के संविधान से लिए गये हैं?

Answer. अमेरिका के संविधान से

Question. वे कौन से मूल अधिकार हैं जिन्हें व्यक्ति के विरुद्ध राज्य को प्रदान किये गए है?

Answer. सामान्यता मूल अधिकार राज्य कृत्य के विरुद्ध नागरिकों को प्रदान किये गए हैं, किन्तु कुछ मूल अधिकार व्यक्तियों के विरुद्ध राज्य को प्रदान किये गये है। जो राज्य को यह शक्ति देते हैं कि राष्ट्रहित और लोकहित में वह मूल अधिकारों पर निर्बन्धन लगा सकता है।

अनुच्छेद-15(2), अनुच्छेद-17, अनुच्छेद-23 और अनुच्छेद 24 के अन्तर्गत प्रदत्त मूल अधिकार व्यक्तियों के विरुद्ध हैं।

Question. किस संविधान संशोधन द्वारा यह उपबन्ध किया गया कि आपात स्थिति में भी अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं किये जा सकते हैं?

Answer. 44वें संविधान संशोधन द्वारा

Question. किन परिस्थितियों में अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार स्वतः निलम्बित हो जाता है?

Answer. युद्ध एवं बाह्म आक्रमण की परिस्थितियों अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है। किन्तु सशस्त्र विद्रोह की परिस्थिति में स्वतः निलम्बित नहीं होता है।

Question. यदि कोई व्यक्ति अपने मूल अधिकारों का त्याग करना चाहे तो क्या वह कर सकता है?

Answer. कोई भी व्यक्ति अपने मूल अधिकारों का त्याग नहीं कर सकता है। क्योंकि उस व्यक्ति को केवल व्यक्तिगत हित के लिए नहीं वरन लोकनीति के रूप में पूरे समाज के हित के लिए संविधान में शामिल किया गया है।

Question. आपात स्थिति के समय राष्ट्रपति किन मूल अधिकारों का निलम्बन कर सकता है?

Answer. अनुच्छेद-20 और 21 के सिवाय सभी मूल अधिकारों का(अनुच्छेद-359 के अनुसार)

Question. भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों की प्रकृति कैसी है?

Answer. भारतीय संविधान द्वारा दिये गये मूल अधिकारों की प्रकृति सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनो हैं। अनुच्छेद 19,25,26,27एवं 28 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार सकारात्मक प्रवृति के हैं। जबकि अनुच्छेद 14,15,16 एवं 21 आदि द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार नकारात्मक मूल अधिकार है। नकारात्मक मूल अधिकार राज्य की शक्ति पर निर्बन्धन के रूप में हैं।

Question. राज्य शब्द को किस अनुच्छेद के तहत परिभाषित किया गया है?

Answer. भाग 3 के प्रयोजनों के लिए राज्य शब्द को अनुच्छेद-12 में परिभाषित किया गया है। अनुच्छेद 12 के अनुसार राज्य शब्द में

1-भारत की सरकार एवं संसद

2-राज्यों की सरकारें एवं विधानमण्डल

3-सभी स्थानीय एवं अन्य प्राधिकारी

शामिल हैं।

Question. संसद किस अनुच्छेद के तहत मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती हैं?

Answer. संसद अनुच्छेद- 368 के तहत मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती हैं। अन्य किसी भी प्रकार से नहीं।

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