मौर्य कालीन सामाजिक जीवन

मौर्य कालीन सामाजिक जीवन वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित था। कौटिल्य ने वर्णाश्रम व्यवस्था के महत्व को स्पष्ट करते हुए इसकी रक्षा को राजा के कर्तव्य से जोड़ा, इन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कार्यों को अलग-अलग निर्धारित किया।

 

कौटिल्य ने शूद्रों को भी आर्य कहा। उसके अनुसार शूद्र का कार्य शिल्प, व्यापार, कृषि तथा पशुपालन भी हो सकता है। इन्हें दास बनाये जाने पर प्रतिबन्ध था।

मौर्य काल में शिक्षक, यज्ञ सम्पन्न कराने वाले पुरोहित एवं वेद का पाठ करने वाले पुरोहितों को “ब्रह्मदेव” नामक भूमि दान में दी जाती थी।

चाणक्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में कुछ वर्णसंकर जातियों जैसे-अम्बष्ठ, निषाद, पारशव, रथकार, क्षत्ता, वैदेहक, मागध, सूत, पुल्कस, वेण, चाण्डाल व स्वपाक आदि का उल्लेख किया है।

इनकी उत्पत्ति विभिन्न वर्गों के अनुलोम और प्रतिलोम विवाह से बताई जाती है। इनमें चाण्डाल को छोड़कर शेष सभी वर्णसंकर जातियाँ शूद्र जातियों में आती थीं।

अशोक के शिलालेखों में दास और कर्मकर का उल्लेख मिलता है। ये भी शूद्र वर्ग के अन्तर्गत आते थे।

मौर्य कालीन समाज में स्त्रियों की दशा

स्मृतिकाल की तुलना में मौर्य काल में स्त्रियों की दशा बेहतर थी। उन्हें पुनर्विवाह व नियोग करने की अनुमति थी, फिर भी स्त्रियों की स्थिति को ज्यादा उन्नत नहीं कहा जा सकता। उन्हें घर से बाहर जाने की स्वतंत्रता नहीं थी।

सम्भ्रांत घर की स्त्रियां प्रायः घर के अन्दर ही रहती थीं। अर्थशास्त्र में इन्हें “अनिष्कासिनी” कहा गया है। इस समय सती प्रथा का कोई प्रमाण नहीं मिलता है, किन्तु यूनानी लेखकों ने उत्तर पश्चिम में मृत सैनिकों के साथ उनकी स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है।

मौर्य काल में गणिकाओं या वेश्याओं का भी उल्लेख मिलता है। स्वतन्त्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियां रूपाजीवा कहलाती थीं। बहुत से गणिकाएं गुप्तचर विभाग में कार्य करती थी। गणिकाओं के कार्यों का निरक्षण गणिकाध्यक्ष करता था।

समाज में विधवा विवाह का प्रचलन था। जो विधवाएं विवाह नहीं करती थीं तथा स्वतन्त्र रूप से अपना जीवन व्यतीत करती थीं। ऐसी विधवाओं को “छंदवासिनी” कहा जाता था।

मौर्य काल के समाज में शिक्षा एवं मनोरंजन

मौर्य काल में शिक्षा वर्णाश्रम धर्म के अनुसार दी जाती थी। धर्म, व्याकरण, अर्थ तथा राजनीति (व्रत) शिक्षा के अनिवार्य अंग थे।

तक्षशिला, उज्जैन तथा वाराणसी शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे। इस काल में गायन, वादन तथा नृत्य मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। इसके अतिरिक्त जुआ, शराब व शिकार करना भी मनोरंजन के साधन थे।

अर्थशास्त्र में प्रेक्षागृहों (रंगशालाओं) का भी वर्णन मिलता है। इन रंगशालाओं में भाग लेने वाले पुरुषों के रंगोपजीवी तथा स्त्रियों को रंगोपजीविनी कहा जाता था। प्रवहण एक प्रकार का सामूहिक समारोह था। जिसमें भोज्य पदार्थों की अधिकता होती थी। 

मौर्य कालीन समाज में दास प्रथा

इस समय दास प्रथा प्रचलित थी। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में 9 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है।

1-ध्वजाहृत- युद्ध में जीता हुआ दास

2-उदरदास- जन्म से दास

3-दण्ड प्रणीत- दण्ड के परिणाम स्वरूप बनाया गया दास

4-दायागत- पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त दास

5-लब्ध- दान में प्राप्त हुआ दास

6-क्रीत- खरीदा हुआ दास

7-गृहजात- घर में दासी द्वारा उत्पन्न दास

8-अहितक- ऋण के बदले धरोहर के रूप में रखा गया दास

9-आत्मविक्रयी- अपने आप को बेचने वाला दास