मौर्य काल की कला

मौर्य काल की कला को दो भागों में बांटा जा सकता है-राजकीय कला और लोक कला। राजकीय कला के अन्तर्गत नगर निर्माण, स्तूप, गुफाएं एवं स्तम्भ आते हैं। जबकि लोक कला के अन्तर्गत पत्थर की मूर्तियां एवं मृद्भांड आते हैं।

राजकीय कला का सबसे पहला उदाहरण चन्द्रगुप्त का प्रासाद (महल) है। यह गंगा और सोन नदियों के संगम पर बना हुआ था।

फाह्यान ने इस महल के बारे में लिखा है कि यह “निश्चित रूप से देवताओं द्वारा निर्मित होगा क्योंकि मनुष्य इतना अच्छा निर्माण कर ही नहीं सकते”।

कौटिल्य ने नगर निर्माण के बारे में लिखा है कि नगर गहरी खाइयों एवं रक्षा प्राचीरों से घिरे होने चाहिए तथा नगर में तीन प्रकार के मार्ग होने चाहिए-वीथि (छोटे मार्ग), रथ्या (मध्यम मार्ग), महापथ (बड़े मार्ग)।

मौर्य कालीन कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन अशोक के स्तम्भों में दिखाई देता है। जो धम्म प्रचार के लिए देश के विभिन्न भागों में निर्मित कराये गये थे।

अशोक के स्तम्भों की संख्या लगभग 20 है। ये स्तम्भ मथुरा और चुनार की पहाड़ियों से लाये गये लाल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं।

प्रत्येक स्तम्भ एकाश्मक पत्थर (एक ही पत्थर) का बना है। ये पत्थर 30 से 50 फीट तक ऊँचे हैं। इन स्तम्भों पर चमकदार पालिश की गई।

स्तम्भ के शीर्ष पर किसी न किसी जानवर की आकृति बनायी गयी है। जैसे-बखेड़ा स्तम्भ (मौर्य काल का पहला स्तम्भ, शीर्ष पर सिंह की आकृति), संकिया स्तम्भ (शीर्ष पर हाथी की आकृति), रामपुरवा स्तम्भ (शीर्ष पर वृषभ की आकृति), इसी प्रकार लौरिया नन्दनगढ़ के शीर्ष पर सिंह

साँची और सारनाथ के स्तम्भों के शीर्ष पर एक साथ चार सिंहों की आकृतियां बनायीं गयीं हैं।

सारनाथ का स्तम्भ

स्तम्भ शीर्षों में सारनाथ का स्तम्भ शीर्ष सबसे उत्कृष्ट है। स्मिथ के अनुसार इस स्तम्भ में पशुओं के चित्रण में जिस प्रकार की कला का प्रदर्शन है, विश्व में कहीं भी इतनी सुन्दर कला का प्रदर्शन नहीं है।

सारनाथ के स्तम्भ के फलक (शीर्ष) पर चार सिंह पीठ से पीठ सटाये हुए चारों दिशाओं की ओर मुख किये हुए बैठे हैं। जो चक्रवर्ती सम्राट अशोक की शक्ति के प्रतीक हैं।

सिंहों के मस्तिष्क पर एक महाधर्म चक्र स्थापित है जो शक्ति के ऊपर धर्म की विजय का प्रतीक है। इस चक्र में 32 तीलियाँ हैं। इसी स्तम्भ में सिंहों के ठीक नीचे चार पशु (गज, अश्व, बैल,सिंह) एवं एक चक्र दर्शाया गया है। इस चक्र में 24 तीलियाँ हैं।



साँची के स्तम्भ में भी चार सिंह पीठ से पीठ सटाये हुए बैठे हैं। इसमें सिंहों के नीचे दाना चुगते हुए हंस दर्शाये गये हैं।

अशोक ने स्तूप निर्माण परम्परा को प्रोत्साहन दिया। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक ने 84 हजार स्तूपों का निर्माण करवाया।

अशोक के समय के दो महत्वपूर्ण स्तूप हैं-साँची का महास्तूप और सारनाथ का धर्मराजिक स्तूप। मौर्य कालीन स्तूप ईंटों के बने हुए हैं।

पत्थरों को काटकर गुफाओं का निर्माण भी मौर्य से ही प्रारम्भ हुआ। अशोक एवं उसके पौत्र दशरथ ने बाराबर एवं नागार्जुन पहाड़ियों में आजीवकों के लिए गुफाएं बनवायीं थी। 

मौर्य काल की लोक कला

मौर्य काल की लोक कला का ज्ञान मौर्य कालीन स्थलों से प्राप्त पत्थर मूर्तियां एवं मृद्भांडों से होता है। इनमें कुछ महत्वपूर्ण मूर्तियां हैं-दीदारगंज से प्राप्त चाँवरधारणी की यक्षी मूर्ति, मथुरा जिले के परखम से प्राप्त यक्ष की मूर्ति जिसे मणिभद्र कहा जाता है।

मौर्य कालीन मृद्भांडों में सबसे उत्कृष्ट उत्तरी काली पॉलिश वाले मृद्भांड हैं। मुख्य रूप से ये छोटे कटोरों, रकाबियों और मर्तबान के रूप में प्राप्त होते हैं। ये मृद्भांड दक्षिण भारत के अलावा देश के अन्य सभी भागों से प्राप्त हुए हैं।

राजगीर नामक स्थान के उत्खनन से उत्तरी काली पालिशदार मृद्भांडों के साथ सादे मृद्भांड और सादे काले मृद्भांड भी प्राप्त हुए हैं। शिशुपालगढ़ में इन मृद्भांडों के साथ लाल मृद्भांड भी पाए गए हैं। इस प्रकार मौर्य काल की कला का भारतीय कला के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है।