मौर्य वंश के शासक

नन्द वंश के अन्तिम शासक धनानन्द को पराजित कर चन्द्रगुप्त मौर्य ने मगध राज्य में मौर्य वंश की स्थापना की। यूनानी साहित्य में चन्द्रगुप्त को “सैन्ड्रोकोट्स” कहा गया है।

 

सर्वप्रथम सर “विलियम जोंस” ने सैन्ड्रोकोट्स की पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में की। चन्द्रगुप्त के चन्द्रगुप्त नाम का सर्वप्रथम उल्लेख रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में मिलता है।

मौर्य वंश का प्रथम शासक

चन्द्रगुप्त मौर्य की गणना भारत के महान शासकों में होती हैं। यह भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट था। जिससे वृहत्तर भारत पर अपना शासन स्थापित किया।

इसके राज्य की सीमा ईरान से मिलती थी। चंदगुप्त मौर्य ने ही भारत को सर्वप्रथम राजनैतिक रूप से एकबद्ध किया। इसे मौर्य वंश का संस्थापक माना जाता है।

चंदगुप्त मौर्य अपने गुरु विष्णुगुप्त (चाणक्य) की सहायता से नन्द वंश के अन्तिम शासक धनानन्द को हराकर मगध के सिंहासन 323 ईसा पूर्व बैठा।

चन्द्रगुप्त मौर्य की जाति

चन्द्रगुप्त मौर्य की जाति और जन्म के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं।

शुद्र- ब्राह्मण साहित्य में चन्द्रगुप्त मौर्य को शुद्र बताया गया है।

विशाखदत्त कृत “मुद्राराक्षस” में चन्द्रगुप्त को धनानन्द का पुत्र बताया गया है तथा इसके लिए “वृषल” शब्द का प्रयोग किया गया है।

कुछ विद्वान वृषल शब्द का अर्थ शुद्र मानते हैं। तथा कुछ विद्वान इस शब्द को सामाजिक हीनता का द्योतक मानते है। अतः वृषल शब्द का आशय निम्न कुल से है।

पारसीक- स्पूनर के अनुसार चन्द्रगुप्त पारसीक था।

क्षत्रिय- बौद्ध तथा जैन ग्रंथों में इसे क्षत्रिय बताया गया है। इनके अनुसार चन्द्रगुप्त मोरिय क्षत्रिय कुल से सम्बन्धित था।

इस मत की पुष्टि अशोक के लौरिया नन्दगढ़ के स्तम्भ के नीचे के भाग में उत्कीर्ण मयूर की आकृति से भी हो जाती है। सर्वप्रथम ग्रुनवेडेल ने बताया कि मयूर मौर्यों का राजवंशीय चिन्ह था।

वैश्य- रोमिला थापर ने मौर्यों को वैश्य जाति का माना है।

चन्द्रगुप्त के राज्यारोहण की तिथि

323 ईसा पूर्व में बेबीलोन में सिकन्दर की मृत्यु के बाद इसके सेनापतियों में राज्य के बंटवारे के लिए “बेबीलोन की सन्धि” हुई। इस बंटवारे में सिकन्दर द्वारा विजित भारतीय प्रदेश सम्मिलित थे।

इसके बाद 321 ईसा पूर्व में पुनः राज्य के बंटवारे को लेकर सिकन्दर के सेनापतियों में “ट्रिपरैंडिस” की सन्धि हुई परन्तु इस सन्धि में भारतीय प्रदेशों का उल्लेख नहीं मिलता।

अतः भारतीय प्रदेश 321 ईसा पूर्व तक विदेशी शासन से मुक्त हो चुके थे। इस आधार पर चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक 323 ईसा पूर्व के लगभग माना जाता है।

मगध के राज सिंहासन पर बैठकर चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक ऐसे साम्राज्य की नींव डाली जो सम्पूर्ण भारत में फैला था। उसने छः लाख की सेना लेकर सम्पूर्ण भारत को रौंद डाला और उस पर अपना अधिकार कर लिया।

चन्द्रगुप्त मौर्य ने उत्तरी-पश्चिमी भारत को सिकन्दर के उत्तराधिकारियों से मुक्त कराया, नन्दों का उन्मूलन किया तथा सेल्युकस को सन्धि के लिए विवश किया।

चन्द्रगुप्त के साम्राज्य की सीमायें उत्तर-पश्चिम में ईरान की सीमा से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक तक तथा पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में सोपारा तथा सौराष्ट्र तक फैली थी।

सेल्युकस से युद्ध

सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात सेल्युकस बेबीलोन का राजा बना। बैक्ट्रिया विजय करने के बाद उसके मन में भारत विजय करने की लालसा जाग उठी। अतः वह काबुल के मार्ग से होते हुए सिन्धु नदी की ओर बड़ा और उसने सिन्धु नदी को पार किया।

जहाँ 305 ईसा पूर्व या 304 ईसा पूर्व में सेल्युकस और चन्द्रगुप्त के बीच युद्ध हुआ जिसमें सेल्युकस पराजित हुआ। 303 ईसा पूर्व में दोनों के बीच एक संधि सम्पन्न हुई।

इस सन्धि के फलस्वरूप सेल्युकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया तथा दहेज में चार राज्य एरिया (हेरात), अराकोशिया (कन्धार), जेड्रोशिया (मकरान तट), पेरीपेनिषदाई (काबुल) प्रदान किये।

प्लूटार्क के अनुसार चन्द्रगुप्त ने सेल्युकस को 500 हाथी उपहार में दिये। सेल्युकस ने अपने एक राजदूत “मैगस्थनीज” को चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा।

चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण भारत विजय की जानकारी तमिल ग्रंथ “अहनामूर” और “मुरनानुरू” तथा अशोक के अभिलेख में मिलती है।

अपने जीवन के अन्तिम समय में चन्द्रगुप्त ने जैन साधु भद्रबाहु से जैन धर्म की शिक्षा ली। और अपने पुत्र सिंहसेन को सिंहासन सौंपकर श्रवनवेलगोला स्थित चन्द्रगिरि पर्वत चला गया। यहां पर चन्द्रगुप्त मौर्य ने चन्द्रगुप्त बस्ती का निर्माण कराया।

श्रवनवेलगोला में ही चन्द्रगुप्त मौर्य ने 298 ईसा पूर्व में संलेखना पद्धति द्वारा अपने शरीर को त्याग दिया।

मौर्य वंश का द्वितीय शासक

चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र बिन्दुसार मौर्य साम्राज्य का अगला उत्तराधिकारी बना, यूनानी साहित्य में इसे “अमित्रचेट्स या अमित्रघात” कहा गया है। इसका अर्थ होता है-शत्रुओं का नाश करने वाला। वायुपुराण में इसे मद्रसार तथा जैन ग्रंथों में सिंहसेन कहा गया है।

बिन्दुसार के समय तक्षशिला में दो विद्रोह हुए, जिसमें पहले विद्रोह को दबाने के लिए बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को तथा दूसरे विद्रोह को दबाने के लिए सुसीम को भेजा। इसका विवरण “दिव्यावदान” में मिलता है।

स्ट्रैबो के अनुसार, यूनानी शासक एण्टियोकस ने बिन्दुसार के दरबार में “डाइमेकस” नाम के राजदूत को भेजा। डाइमेकस को मेगस्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है।

एथिनिअस नामक यूनानी लेखक के उल्लेख से स्पष्ट होता है कि बिन्दुसार ने पत्र लिखकर एण्टियोकस से “अंगूरी मदिरा, अंजीर एवं दार्शनिक” भेजने को कहा था। इनमें दार्शनिक को छोड़कर एण्टियोकस ने अन्य वस्तुओं को बिन्दुसार के पास भेजा था।

प्लिनी के अनुसार मिस्त्र नरेश टॉलमी द्वितीय फिलाडेल्फस ने “डायनोसिस” नामक राजदूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा था।

बिन्दुसार धर्म सहिष्णु था तथा आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था। दिव्यावदान में उल्लेख मिलता है कि आजीवक सम्प्रदाय के पिंगलवत्स से बिन्दुसार के मधुर सम्बन्ध थे।

बौद्ध विद्वान तारानाथ ने बिन्दुसार को 16 राज्यों का विजेता बताया। आर्यमंजूश्रीमूलकल्प के अनुसार बिन्दुसार के राज्य का संचालन चाणक्य करता था। 

मौर्य वंश का तीसरा महान शासक

बिन्दुसार की मृत्यु के बाद अशोक विशाल मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। अशोक को उसके अभिलेखों में सामान्यतः “देवानांपिय, देवानांपियदशि तथा राजा” के सम्बोधन से सम्बोधित किया गया है।

भाब्रू अभिलेख में उसे “प्रियदर्शी” जबकि मास्की अभिलेख में “बुद्ध शाक्य” कहा गया है।

सर्वप्रथम मास्की अभिलेख में ही इसका नाम अशोक मिलता है। गुर्जरा, नेत्तूर और उडेगोलम अभिलेखों में भी इसका नाम अशोक मिलता है।

रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में भी अशोक नाम का उल्लेख मिलता है। पुराणों में इसे अशोक वर्धन कहा गया है।

बौद्ध ग्रंथ महाबोधिवंश में इसकी माता का नाम धम्मा मिलता है। जबकि दिव्यावदान में इसकी माता का नाम सुभद्रांगी मिलता है।

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक की कई पत्नियां थीं। किन्तु अशोक के अभिलेखों में उसकी एक पत्नी कारूवाकी का उल्लेख मिलता है।

अशोक की दो पुत्रियों संघमित्रा तथा चारूमती एवं दो पुत्रों कुणाल और महेन्द्र का उल्लेख बौद्ध ग्रंथों में मिलता है।

अशोक के तीसरे पुत्र जालौक का उल्लेख राजतरंगिणी में मिलता है। प्रयाग स्तम्भ लेख में अशोक के एक और पुत्र तीवर का भी उल्लेख मिलता है।

अशोक का राज्याभिषेक (269 ईसा पूर्व)

अशोक 273 ईसा पूर्व मगध के राजसिंहासन पर बैठा। किन्तु उसका राज्याभिषेक 4 वर्ष बाद 269 ईसा पूर्व में हो सका। क्योंकि उत्तराधिकार के लिए उसे अपने सौतेले भाईयों से युद्ध करना पड़ा।

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक को राज्य सिंहासन के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या करनी पड़ी इसीलिए अशोक को भ्रातृ हन्ता भी कहते हैं। किन्तु यह सत्य प्रतीत नहीं होता क्योंकि अशोक के पांचवें अभिलेख में उसके जीवित भाइयों और उनके परिवारों का उल्लेख है।

अशोक के राजगद्दी पर बैठने और राज्याभिषेक के 4 वर्ष का अन्तर को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनसे शायद अपने भाइयों को बंधी बना लिया होगा।

अशोक की विजयें

राज्याभिषेक के सातवें वर्ष अशोक ने कश्मीर एवं खोतान क्षेत्रों के अनेक भागों को जीतकर मगध साम्राज्य में मिला लिया।

कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार अशोक ने कश्मीर में वितस्ता नदी के तट पर श्री नगर नामक नगर बसाया। तथा नेपाल में देवपत्तन नमक नगर बसाया।

कलिंग विजय (261 ईसा पूर्व)

अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष कलिंग पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। कलिंग युद्ध का उल्लेख अशोक के 13वें शिलालेख में मिलता है।

हाथीगुम्फा अभिलेख से पता चलता है कि उस समय कलिंग पर नदराज का शासन था कलिंग की राजधानी तोलसी थी।

विद्वानों के अनुसार कलिंग युद्ध के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।

1-अशोक ने अपनी साम्राज्यवादी एवं विस्तारवादी नीति के अन्तर्गत कलिंग राज्य जीता हो।

2-कलिंग व्यापार और व्यवसाय की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। समुद्र तट के नजदीक होने के कारण इसकी विदेशी व्यापार के लिए महत्ता अधिक थी। अतः कलिंग राज्य को मौर्य साम्राज्य में मिलाना आवश्यक था।

3-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार कलिंग हाथियों के लिए प्रसिद्ध था। इन्हीं हाथियों को प्राप्त करने के लिए अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया।

कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार तथा विजित देश की जनता के कष्ट से अशोक की अंतरात्मा को गहरा आघात पहुँचा। इस युद्ध में करीब एक लाख लोग मारे गए तथा डेढ़ लाख युद्ध बन्दी बना लिये गये। युद्ध की भीषणता का अशोक पर गहरा प्रभाव पड़ा।

अतः अशोक ने युद्ध की नीति को सदा के लिए त्याग दिया और दिग्विजय (भेरीघोष) के स्थान पर धम्म विजय (धम्मघोष) की नीति को अपनाया।

अशोक के प्राप्त सभी अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि उसका राज्य उत्तर में अफगानिस्तान, दक्षिण में कर्नाटक, पश्चिम में काठियावाड़ तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैला था।

असम में अशोक कालीन साक्ष्यों के न मिलने से स्पष्ट होता है कि असम उसके राज्य क्षेत्र से बाहर था। 

अशोक का धर्म परिवर्तन

अशोक पहले ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। और अनेक देवी देवताओं की पूजा करता था। कल्हण की राजतरंगिणी से पता चलता है कि वह शैव धर्म का उपासक था।

दीपवंश और महावंश के अनुसार अशोक ने अपने राज्याभिषेक के चौथे वर्ष “निग्रोध” के प्रवचन से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। बाद में वह मोग्गलिपुत्त तिस्स के प्रभाव में आ गया।

ह्वेनसांग के अनुसार उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। बाद में अशोक आजीवकों के सम्पर्क में आया।

बराबर की पहाड़ियों में अशोक ने आजीवकों के रहने के लिए चार गुफाओं का निर्माण करवाया था। जिनका नाम कर्ण, चोपार, सुदामा तथा विश्व झोपड़ी था।

अशोक अपने राज्याभिषेक के 10वें वर्ष में “धम्मयात्रा” के अन्तर्गत बोधगया पहुँचा। इस यात्रा का विवरण भाब्रू लघु शिलालेख में मिलता है। अशोक की यह प्रथम धम्म यात्रा थी।

इसी क्रम में वह राज्याभिषेक के 12वें वर्ष निगालि सागर तथा 20वें वर्ष लुम्बनी गया। यह स्थान बुद्ध के जन्म से सम्बन्धित होने के कारण अशोक ने इस स्थान को धार्मिक करों से मुक्त कर दिया। केवल भूमि उपज का आठवां भाग लेना निश्चित किया।

यात्रा के अन्तिम चरण में वह कुशीनगर पहुँचा, जहां बुद्ध को महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ था।

अशोक के बाद मौर्य वंश के उत्तराधिकारियों में कुणाल, सम्प्रति, दशरथ (आजीवक धर्म का उपासक) तथा वृहद्रथ थे। वृहद्रथ मौर्य वंश का अन्तिम शासक था। उसकी हत्या उसके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ईसा पूर्व कर दी। तथा मगध में एक नये राजवंश शुंग वंश की नींव डाली।