मृदा अपरदन और उसके प्रकार-soil erosion

मृदा अपरदन एक भौतिक क्रिया है जिसमें मृदा का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण होता है। जल, वायु अथवा अन्य किसी कारक द्वारा मिट्टी के ऊपरी आवरण के क्रमिक कटाव तथा स्थानांतरण को मृदा अपरदन कहते हैं। इसके फलस्वरूप मिट्टी की गुणवत्ता में कमी आती है और बंजर भूमि की समस्या उत्पन्न होती है।

मृदा अपरदन के कारक

मृदा अपरदन के कई कारक हैं। जिनमें निर्वनीकरण, अत्यधिक पशुचारण, झूम कृषि, अवैज्ञानिक कृषि पद्धति, परिवहन एवं संचार के साधन, प्राकृतिक अपवाह का अपवर्तन एवं अवरोधन तथा अंधाधुंध खनन आदि प्रमुख हैं। मृदा क्षरण के प्राकृतिक कारकों में जल, वायु, समुद्री लहरें तथा हिमानी अपरदन आदि प्रमुख हैं।

 

प्रत्यक्ष कारक

वनों की कटाई तथा वन विनास

अत्यधिक चारागाह के रूप में भूमि का उपयोग

रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग

अवैज्ञानिक सिंचाई पद्धतियां, अतिकृषि, अल्पकृषि, फसल चक्र का प्रयोग नहीं करना आदि।

अप्रत्यक्ष कारक

बाँधों का निर्माण व बहुउद्देश्यीय परियोजनाएं

जल प्रवाह की समस्या

नगरीकरण, औद्योगिकरण, निर्माण कार्य व खनन कार्य आदि

मृदा अपरदन के प्रकार

अपस्फुरण

जब जल पत्तियों से नीचे गिरता है तो मृदा का अपरदन करता है। इस क्रिया को अपस्फुरण कहते हैं।

परत क्षरण

इस प्रकार के अपरदन में मृदा की ऊपरी सतह जल के साथ बह जाती है। जिसके कारण मिट्टी की उर्वरता में कमी आ जाती है। इसीलिए इस क्षरण को किसान की मौत की संज्ञा दी गयी है। गहन वर्षा के समय इस प्रकार का कटाव अधिक होता है।

रिल अपरदन

इस प्रकार के क्षरण में मिट्टी में छोटी एवं कम गहरी नालियां बन जाती हैं। इसे क्षुद्र नलिका क्षरण भी कहते हैं।

अवनालिका क्षरण

अवनालिका अपरदन रिल क्षरण का विकसित रूप है। ये नलिकाएं जुताई के समय नष्ट नहीं होती और कृषि कार्य में बाधा पहुँचाती हैं। आगे चलकर ये नालियों, नालों एवं नदियों का रूप धारण कर लेती हैं।

वनों के आर्थिक लाभ

ये अवनालिकायें U आकार या V आकार अथवा सुरंग का आकार ग्रहण कर लेती हैं। भारत में चम्बल अपवाह क्षेत्र इस अपरदन से अधिक प्रभावित हैं।

अवनालिका क्षरण सामान्यतः तीव्र ढालों पर होता है।जैसे हिमालय, पश्चिमी घाट, प्रायद्वीपीय उच्च भूमियां आदि। जिन क्षेत्रों यह अपरदन अधिक होता है। वहाँ उत्खात भूमि अथवा बंजर भूमि अधिक पायी जाती है। अर्थात इस प्रकार का क्षरण उपजाऊ भूमि को बंजर भूमि अथवा उत्खात भूमि में बदल देता है।

भू-स्खलन क्षरण

भू-गर्भिक हलचलों के कारण जब भूमि की सतह नीचे धस जाती है। तब इस प्रकार का अपरदन होता है।

सरिता तट क्षरण

जब जल एक मोटी धारा के रूप में प्रवाहित होने लगता है। तब वह निरन्तर तटों का अपरदन करता है।

सामाजिक वानिकी कार्यक्रम

वायु द्वारा अपरदन

ऐसे शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र जहाँ-

तापक्रम ऊंचा रहता है।

वायु का वेग अधिक रहता है।

मृदा शुष्क एवं मोटे कणों वाली होती है।

मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों का अभाव होता है।

वनस्पति का आवरण नहीं पाया जाता है।

ऐसे क्षेत्रों में वायु द्वारा मृदा का क्षरण अधिक होता है।

वर्षा द्वारा अपरदन

वर्षा का जल जब भूमि पर प्रहार करता है तो मृदा के कण अपने स्थान से छिटककर जल के साथ बह जाते हैं। वर्षा जल द्वारा अपरदन की मात्रा मृदा की किस्म, भूमि की ढाल, वनस्पति की उपस्थिति एवं वर्षा की प्रचण्डता तथा अवधि पर निर्भर करती है।

मृदा अपरदन के प्रभाव

ऊपरी उपजाऊ मिट्टी के आवरण की क्षति से धीरे-धीरे मृदा उर्वरता एवं कृषि उत्पादकता घटती जाती है।

कृषि योग्य भूमि में कमी एवं बंजर भूमि में वृद्धि होती है।

निक्षालन एवं जल जमाव द्वारा मृदा के पोषक तत्वों का ह्रास होता है।

भौम जल स्तर और मृदा आद्रता में गिरावट आती है।

वनस्पतियों का सूखना एवं शुष्क भूमि के क्षेत्र का विस्तार होता जाता है।

सूखे व बाढ़ जैसी स्थितियां अधिक उत्पन्न होने लगती हैं।

नदियों और नहरों के तल में रेत का जमाव बढ़ जाता है।

भू-स्खलन होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

वनस्पति आवरण नष्ट होने से इमारती लकड़ी एवं घरेलू ईंधन हेतु जलावन की लकड़ियों की कमी होने लगती है।

मृदा अपरदन को रोकने के उपाय

अधिक ढालों वाली भूमि कृषि कार्य को रोकना चाहिए। यदि ऐसी भूमि पर खेती करना जरूरी हो जाये तो इस पर सावधानी से सीढ़ीदार खेत बना लेने चाहिए।

भारत के विभिन्न भागों में अति चराई और स्थानांतरण कृषि को नियमित और नियंत्रित करना चाहिए। इसके लिए ग्रामवासियों को मृदा अपरदन के दुष्परिणामों से अवगत कराना चाहिए।

खेतों की मेढ़बन्दी करनी चाहिये।

नियमित रूप से वनीकरण करना चाहिए।

सतही और ऊर्ध्वाधर अपवाह तंत्र में सुधार कर जलमग्नता की समस्या का निदान करना चाहिए।

जैव उर्वरकों एवं वानस्पतिक खादों के उपयोग में वृद्धि करनी चाहिए।

मानव अपशिष्टों एवं शहरी कचरे को खाद में परिवर्तित करना चाहिए।

वैज्ञानिक फसल चक्र पर ध्यान देना चाहिये।

अवनालिकाओं की भराई करनी चाहिए।

तंग घाटियों का समतलीकरण एवं ढालों पर वृक्षारोपण और घासरोपण करना चाहिए।

सतत कृषि की तकनीक को अपनाना चाहिए।

IMPORTANT QUESTIONS

Question. भारत के कौन से क्षेत्र मृदा अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित हैं?

Answer. भारत में मिट्टी के क्षरण से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र निम्नलिखित हैं

चम्बल एवं यमुना नदियों के उत्खात भूमि क्षेत्र,

पश्चिमी हिमालय का गिरिपाद क्षेत्र (शिवालिक पहाड़ियों के पाद क्षेत्र इसमें शामिल हैं)

ताप्ती से साबरमती घाटी तक का क्षेत्र (मालवा का पठार)

छोटा नागपुर का पठार,

महाराष्ट्र का काली मिट्टी क्षेत्र,

हरियाणा, राजस्थान, गुजरात के शुष्क क्षेत्र आदि प्रमुख हैं।

भारत में वनों के प्रकार

Question. चम्बल घाटी में खड्डों का निर्माण किस अपरदन के कारण हुआ है?

Answer. चम्बल घाटी क्षेत्र में खड्डों का निर्माण (उत्खात भूमि) अवनालिका अपरदन के कारण हुआ है।

Question. मृदा क्षरण किन क्षेत्रों में अधिक होता है?

Answer. जिन क्षेत्रों में वनोन्मूलन अधिक किया जाता है वहाँ मृदा क्षरण अधिक मात्रा में होता है।

Question. पेड़-पौधे मृदा के क्षरण को किस प्रकार रोकते हैं?

Answer. पेड़-पौधों की जड़े मिट्टी को जकड़े रहती हैं, जिससे जल तथा वायु मिट्टी का अपरदन आसानी से नहीं कर पाते हैं। इसके अतिरिक्त पेड़ों के तने पानी के बहाव की गति को भी कम कर देते हैं।