नादिरशाह का आक्रमण

नादिर शाह का आक्रमण 1739 ई. में मुहम्मद शाह के शासन काल में हुआ था। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य की उत्तरी-पश्चिमी सीमाएं असुरक्षित होने लगीं। दरबार में व्याप्त स्वार्थ, भ्रष्टाचार और असावधानी के कारण गुजरात और मालवा मराठों के आक्रमण का शिकार बने।

दरबार में पक्षपात के कारण आयोग्य वाइसराय नियुक्त हुए। उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर तैनात सैनिकों की उपेक्षा की गई। इन कमजोरियों को देखते हुए नादिरशाह के मन में भारत पर आक्रमण करने की महत्वाकांक्षा जाग्रत हुई।

 

नादिरशाह

नादिरशाह का जन्म 1688 में खुरासन (फारस राज्य में) के तुर्कमान वंश में हुआ था। उसका यौवन संघर्ष करते हुए गुजरा।

जब अफगानों ने फारस पर आक्रमण कर कन्धार तथा फारस (ईरान) की राजधानी इस्फहान पर कब्जा कर लिया तब नादिर फारसी लोगों का रक्षक बनकर सामने आया। शीघ्र ही उसने समस्त फारस को अफगानों से मुक्त करा लिया।

फारस के कृतज्ञ शाह ने उसे आधा राज्य दे दिया। जिसमें वह स्वतन्त्र रूप से अपने सिक्के चला सकता था। 1736 में शाह की मृत्यु के बाद सम्पूर्ण फारस का नादिरशाह स्वामी बन गया।

नादिरशाह एक महत्वाकांक्षी शासक था। उसे “ईरान का नेपोलियन” कहा जाता है।

नादिरशाह के आक्रमण का कारण

शासक बनने के बाद उसने अपना राज्य विस्तार करना चाहा। उसका पहला लक्ष्य था कन्धार। अतः उसने मुहम्मद शाह को लिखा कि कन्धार के मुगल शासकों को काबुल में शरण नहीं मिलनी चाहिए। परन्तु 1738 में जब उसने कन्धार पर आक्रमण किया तो वहाँ के कुछ अफगान शासकों ने काबुल तथा गजनी में शरण ले ली।

फारस सैनिकों ने मुगल साम्राज्य की सीमाओं का आदर किया। काबुल और गजनी में अफगानों का पीछा नहीं किया।

नादिरशाह ने एक दूत दिल्ली भेजा। इस दूत मण्डल के सदस्यों की मुगल सैनिकों ने जलालाबाद में हत्या कर दी। इसी घटना को उसने भारत पर आक्रमण का कारण बना लिया।

दूसरा कारण यह भी था कि मुगलों द्वारा फारस के साथ राजनैतिक सम्बन्ध विच्छेद कर लेना। मुगलों और ईरानियों के बीच लम्बे समय से राजनैतिक सम्बन्ध बने हुए थे। दोनों राज्य दूतों का आदान-प्रदान करते थे।

नादिरशाह के सत्ता में आने के बाद मुहम्मद शाह ने यह प्रथा बन्द कर दी। इसे नादिरशाह ने अपना अपमान समझा।

तीसरा कारण था कि वह भारत से अपार धन लूटने की अभिलाषा रखता था और उसे कुछ मुगल दरबारियों ने भारत पर आक्रमण का निमन्त्रण भी भेजा था।

नादिरशाह का भारत पर आक्रमण

नादिरशाह ने 11 जून 1738 में गजनी को जीत लिया तथा काबुल की ओर बढ़ा। काबुल के मुगल शासक नादिर खाँ ने 29 जून 1738 को बिना किसी विरोध के उसके आगे घुटने टेक दिये और क्षमा याचना कर, उससे काबुल तथा पेशावर की गवर्नरी प्राप्त कर ली।

नादिरशाह ने बड़ी आसानी से अटक के स्थान पर सिन्धु नदी को पार किया और बहुत सरलता से लाहौर के गवर्नर को हरा दिया। अतः लाहौर का गवर्नर भी उसके साथ मिल गया।

करनाल का युद्ध 24 फरवरी 1739

जब मुहम्मद शाह को नादिरशाह के आक्रमण का समाचार ज्ञात हुआ। तो वह लगभग 80 हजार सैनिक और निजामुलमुल्क, कमरुद्दीन खान दौरान और सआदत खाँ (अवध का नवाब) को साथ लेकर करनाल नामक स्थान पर पहुँचा।

यहीं पर 24 फरवरी 1739 में करनाल का युद्ध हुआ जिसमें तीन घण्टे में मुगल सेना पराजित हो गयी। मुगलों की दुर्बलता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि सम्राट को पता ही नहीं था कि आक्रमणकारी किस स्थान पर है। इस युद्ध में खान दौरान मारा गया तथा सआदत खाँ को बंदी बना लिया गया।

अब निजामुलमुल्क ने शान्तिदूत की भूमिका निभाई। अतः यह निश्चित हुआ कि नादिरशाह को 50 लाख रुपया मिलेगा। मुहम्मद शाह निजामुलमुल्क की इस सेवा से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने निजाम को मीरबख्सी नियुक्त कर दिया। क्योंकि यह स्थान खान दौरान की मृत्यु से रिक्त हो चुका था।

नादिरशाह का दिल्ली की ओर प्रथान

सआदत खाँ  जो स्वयं मीरबख्सी बनना चाहता था, जब यह देखा कि निजामुलमुल्क को मीरबख्सी का पद मिल चुका है तो उसने नादिरशाह से भेंट की और कहा यदि आप दिल्ली पर आक्रमण करें तो आपको 50 लाख नहीं 20 करोड़ मिलेगा।

अतः 20 मार्च 1739 को नादिर शाह ने बड़ी शान से दिल्ली में प्रवेश किया। उसके नाम का खुत्बा पढ़ा गया तथा सिक्के जारी किये गये।

22 मार्च को दिल्ली में यह अफवाह फैल गई कि नादिरशाह की मृत्यु हो गई है। नगर में विद्रोह हो गया और उसके 700 सैनिक मारे गए। इस पर नादिर ने आम नर-संहार की आज्ञा दे दी। जिसके फलस्वरूप लगभग 30 हजार लोगों का कत्ल कर दिया गया। मुहम्मद शाह की प्रार्थना पर आज्ञा को वापस लिया गया।

नादिरशाह का वापस लौटना

नादिरशाह दिल्ली में 2 माह तक ठहरा और अधिक से अधिक लूटने का प्रयत्न किया। सआदत खाँ से कहा गया कि यदि 20 करोड़ रुपये का प्रबन्ध नहीं हुआ तो उसे शारीरिक यातना दी जाये गी। इस डर से उसने विष खा लिया। ईरानी शासक 15 मई तक दिल्ली में रहा।

लौटते समय वह अपने साथ 30 करोड़ रुपया नगद, सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात, 100 हाथी, 7 हजार घोड़े, 10 हजार ऊंट, 100 हिजड़े, 130 लेखपाल, 200 लुहार, 200 बढ़ई तथा “शाहजहाँ का तख्ते ताउस” ले गया। इसके अतिरिक्त नादिरशाह को कश्मीर एवं सिन्ध के पश्चिमी प्रदेश, थट्टा प्रान्त एवं बन्दरगाह, कोहिनूर हीरा भी मिला।

पंजाब के गवर्नर ने 20 लाख रुपया वार्षिक कर देना स्वीकार किया। मुहम्मद शाह ने अपनी पुत्री का विवाह नादिरशाह के पुत्र नासिरुल्लाह मिर्जा से कर दिया। दूसरी ओर उसने मुहम्मद शाह को पुनः सम्राट घोषित कर दिया। खुत्बा पढ़ने तथा सिक्के जारी करने का अधिकार भी लौटा दिया।