पुरापाषाण काल

पुरापाषाण काल को आखेटक एवं खाद्य संग्राहक काल के रूप में भी जाना जाता है। पुरापाषाण काल में प्रयुक्त होने वाले पत्थर के उपकरणों के आकार एवं बनावट तथा जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर इस काल को तीन अवस्थाओं में विभाजित किया गया है।

1-पूर्व पुरापाषाण काल (25 लाख ईसा पूर्व से 9 लाख ईसा पूर्व)

भारत के विभिन्न भागों से पूर्व पुरापाषाण काल से सम्बन्धित विवरण प्राप्त होते हैं। इस समय मानव मूलतः क्वार्टजाइट पत्थर का उपयोग करता था। इस काल के उपकरणों को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है।

चापर-चालिंग पेबुल संस्कृति के उपकरण

इसके उपकरण सर्वप्रथम पंजाब की सोहन नदी घाटी से प्राप्त हुये। इसी कारण इसे सोहन संस्कृति भी कहा जाता है। पेबुल, पत्थर के उन टुकड़ों को कहा जाता है। जिनके किनारे पानी के बहाव में रगड़ खाकर चिकने व सपाट हो जाते हैं। इनका आकार गोल मटोल होता है। इन्हीं पत्थरों का उपयोग करके चापर तथा चाकिंग नामक उपकरण बनाये जाते थे।

चापर बड़े आकार वाला वह उपकरण है जिसमें एक तरफ धार होती है। जबकि चाकिंग में दोनों तरफ धार होती है।

हैन्ड-एक्स-संस्कृति के उपकरण

इस संस्कृति के उपकरण सर्वप्रथम मद्रास के समीप वादमदुराई तथा अतिरमपक्कम से प्राप्त हुए। इसलिए इसे “मद्रासी संस्कृति” भी कहा जाता है। ये उपकरण साधारण पत्थरों से निर्मित थे। इन उपकरणों को कोर तथा फ्लैक प्रणाली द्वारा बनाया गया था।

पूर्व पुरापाषाण कालीन बस्तियां

कश्मीरी घाटी

यह दक्षिण पश्चिम में पीरपंजाल पहाड़ियों तथा उत्तरपूर्व में हिमालय से घिरी है। यहाँ पर लिद्दर नदी के किनारे स्थित पहलगांव से पूर्व पुरापाषाण कालीन कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है।

मध्य पाषाण काल

पोतवार क्षेत्र

यहाँ से हस्तकुठार और काटने के औजार प्राप्त हुए। अडियाल, बलवाल, चौतारा आदि इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण पुरपाषाणीय बस्तियां थी।

राजस्थान

यहाँ लूनी नदी के आसपास के क्षेत्र से पुरापाषाण कालीन बस्तियां पायी गयी हैं। राजस्थान के वागौर तथा दिदवाना क्षेत्र से पुरापाषाण कालीन औजार प्राप्त हुए हैं।

ऐसे ही गुजरात से हस्तकुठार, खुरचनी एवं अन्य प्रस्तर औजार प्राप्त हुए हैं। उत्तर प्रदेश में पूर्व पुरापाषाण काल से सम्बन्धित 44 पुरास्थल प्राप्त हुए हैं। जहाँ से हैन्ड एक्स, क्लीवर, खुरचनी, चापर चापिंग आदि सभी प्रकार के उपकरण प्राप्त हुए हैं। महाराष्ट्र में चिरकी, चंदौली व शिकारपुर से अनेक पुरापाषाण कालीन बस्तियों के प्रमाण मिले हैं।

2-मध्य पुरापाषाण काल (नेवासाई चरण)–9 लाख ईसा पूर्व से 40 हजार ईसा पूर्व तक

 मध्य पुरापाषाण काल में क्वार्टजाइट पत्थरों के स्थान पर जैस्पर, चर्ट, फ्लिंट आदि के पत्थर प्रयुक्त होने लगे। इस समय उद्योग मुख्यतः शल्क से बनी वस्तुओं का था। तथा मुख्य औजारों में फलक, बेधनी, छेदनी और खुरचनी प्रमुख थे। फलक औजारों की अधिकता के कारण इस काल को “फलक संस्कृति” की भी संज्ञा दी जाती है।

मध्य पुरापाषाण कालीन प्रमुख स्थल

महाराष्ट्र के नेवासा नामक स्थान से प्राप्त मध्य पूरापाषाण कालीन उपकरण अत्यन्त उच्च कोटि के हैं। राजस्थान में थार मरुस्थल की पूर्वी सीमा इन काल के लोगों के लिये आदर्श क्षेत्र थी। क्योंकि यहाँ मीठे जल के साथ साथ औजारों के लिए अच्छे पत्थर भी सुलभ थे। लूनी उद्योग दक्षिणी थार सीमा पर प्रचलित था।

 इसके अतिरिक्त भारत के अन्य क्षेत्रों में भी मध्य पुरापाषाणिक स्थल खोजे गये हैं। जैसे-बिहार में सिंहभूमि तथा पलामू, उत्तर प्रदेश में चकिया, सिंगरौली बेसिन, बेलन घाटी, मध्यप्रदेश में भीमवेटका गुफाएँ, सोन घाटी, नर्वदा नदी किनारे स्थित समनापुर, गुजरात में सौराष्ट्र क्षेत्र आदि।

नवपाषाण युग

3-उच्च पुरापाषाण काल (40 हजार ईसा पूर्व से 10 हजार ईसा पूर्व तक)

उच्च पुरापाषाण काल में आद्रता कम हो गयी थी एवं जलवायु अपेक्षाकृत गर्म हो गयी थी। इस काल की दो मुख्य विलक्षणतायें थी।

नये चकमक उद्योग की स्थापना

ज्ञानी मानव (आधुनिक मानव) होमो सैपियन्स का उदय

इस काल का मुख्य पाषाण उपकरण फलक (ब्लेड) था। जिसके दोनों किनारे समानान्तर होते थे और लम्बाई में चौड़ाई का दोगुना होता था। इस काल में अस्थि उपकरणों का भी उपयोग होने लगा था। तक्षणियों तथा खुरचनियों की संख्या में भी काफी वृद्धि हुई।

रोड़ी मलवे (ढोंका चिनाई) से बना लगभग 85 सेमी. व्यास वाला स्थूल रूप से गोलाकार चबूतरा जिसके बीच में प्राकृतिक पत्थर का एक तिकोना टुकड़ा रखा हुआ है। इस काल की उल्लेखनीय खोज थी।

उच्च पुरापाषाण कालीन स्थल

 उच्च पुरापाषाणिक उद्योगों का प्रादुर्भाव सम्भवतः पाकिस्तान और पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में हुआ। बेलन तथा सोन घाटियों में अनेक उच्च पुरापाषाणिक स्थलों का पता चला है। बेलन घाटी मर स्थित चौपानी मांडो में उच्च पुरापाषाण काल से लेकर नव पाषाण काल तक के क्रम का पता चला है। यहाँ से पशुओं की हड्डियों के जीवाश्म भी मिले हैं। कर्नाटक के वेटमचेर्ल्ला से हड्डियों से निर्मित बहुत से औजार मिले हैं जो इसी काल के हैं।

पुरा पाषाणकाल की जीवन शैली

पुरापाषाण कालीन मानव को कृषि का ज्ञान नहीं था। इसलिए वह वनों से प्राप्त फलफूल, पशुओं के शिकार व नदी झीलों की मछलियों पर निर्भर था। अतः इस काल का मानव आखेटक व खाद्य संग्राहक था।

भारत का प्रागैतिहासिक काल

पुरापाषाण कालीन बस्तियों में जानवरों के अवशेष बड़ी मात्रा में मिले हैं। इस काल में पशुपालन की शुरुआत नहीं हुई थी। तथा मानव अग्नि से अनभिज्ञ था। अतः वह कच्चे मांस का भक्षण करता था। तथा पर्वत कन्दराओं एवं नदियों की कगार आदि में रहता था।

पत्थर से औजारों के निर्माण कला की खोज इस काल की क्रन्तिकारी घटना थी। औजार निर्माण की दो प्रणालियों का प्रचलन था। उत्तर भारत में फ्लैक प्रणाली तथा दक्षिण भारत में कोर प्रणाली।

उस समय के लोगों में धार्मिक भावना का अभाव था। पुरापाषाण कालीन मानव के रहन सहन तथा सामाजिक जीवन के बारे में आदिमानव द्वारा बनाये गए चित्रों से पता चलता है।

सर्वाधिक प्राचीन चित्रकारी पूर्व पुरापाषाण कालीन भीमवेटिका में देखने को मिलती है। जिसमे 243 प्रागैतिहासिक शैलाश्रय हैं। प्रारम्भिक चित्रों में हरे एवं गहरे लाल रंगों का उपयोग हुआ है। इनमें भैंसे, हाथी, बाघ, गैंडे और सूअर के चित्र प्रमुख हैं। इन चित्रों से यह पता चलता है कि पूरा पाषाण काल के लोग छोटे छोटे समूह में रहते थे तथा जीवन निर्वाह के लिए जंगली पेड़-पौधों तथा शिकार पर निर्भर थे।

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