पेशवा कालीन मराठा प्रशासन-Maratha administration during Peshwa period

पेशवा कालीन मराठा प्रशासन हिन्दू और मुस्लिम संस्थाओं का उत्तम सम्मिश्रण था। पेशवा काल में मराठा प्रशासन का मूल तत्व हिन्दत्व था जिनमें कई मुस्लिम विशेषताएं प्रवेश कर चुकीं थीं।

शिवाजी के शासनकाल के बाद पेशवाओं के शासनकाल में कई परिवर्तन किये गये। शिवाजी के अधीन मराठा प्रशासन में मुगल सम्राट के लिए कोई स्थान नहीं था किन्तु शाहू के काल में मुगल सम्राट की सर्वोच्चता स्वीकार कर ली गई।

 

1719 ई. की सन्धि के अनुसार शाहू ने मुगल सम्राट फरुखशियर को 10 हजार का मनसब तथा 10 लाख रुपये वार्षिक खिराज देना स्वीकार किया।

शाहू की मुगल सम्राट के प्रति निष्ठा इस बात से प्रमाणित होती है कि उसने पूने में उत्तर की ओर दिल्ली द्वार बनवाया। यद्यपि शाहू का कथन था कि यह द्वार मुगल बादशाह के अपमान तथा अवज्ञा का द्योतक है।

पेशवा कालीन मराठा प्रशासन में दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन था- छत्रपति या राजा की शक्तियों का पेशवा में निहित होना। संगोला की सन्धि (1750 ई.) से स्पष्ट होता है कि मराठा शासन का प्रमुख छत्रपति के स्थान पर पेशवा बन गया। बालाजी विश्वनाथ के पेशवा बनने के बाद पेशवा का पद वंशानुगत हो गया।

पेशवा का पद वंशानुगत होने के फलस्वरूप राजा या छत्रपति की शक्तियां और कम हो गयी। वह महलों का महापौर बनकर रह गया। राज्य की वास्तविक शक्ति पेशवा बन गया।

इस पर स्कॉटवारिंग ने कहा कि “पेशवा द्वारा शक्ति के अपहरण से न किसी को आश्चर्य हुआ न किसी ने इसकी ओर विशेष ध्यान दिया। वास्तव में यह संक्रमण, सरल, प्राकृतिक तथा क्रमिक था”।

पेशवा कालीन केन्द्रीय प्रशासन

पूना में पेशवा का सचिवालय, जिसे हजूर दफ्तर कहा जाता था, मराठा प्रशासन का केन्द्र था। यह एक विशाल संस्था थी जिसमें अनेक विभाग एवं कार्यालय थे। सबसे महत्वपूर्ण विभाग “एलबेरीज दफ्तर” था। यह दफ्तर पूना में स्थित था तथा सभी प्रकार के लेखों से सम्बन्ध रखता था। राज्य की वार्षिक आय-व्यय तथा बचत विवरण इसी कार्यालय में रहता था।

दूसरा प्रमुख विभाग “चातले दफ्तर” था। जो सीधे फड़नवीस के अधीन होता था। नाना फड़नवीस ने पूना सचिवालय (हजूर दफ्तर) की कार्य प्रणाली में कई सुधार किये थे।

पेशवाओं के शासन काल में मराठा सरदारों को जागीरें प्रदान की जाती थीं और वे अपनी जागीरों के स्वतन्त्र शासक होते थे। पेशवा सरदारों के आन्तरिक शासन में हस्तक्षेप नहीं करता था। मराठा सरदारों को जागीर एवज में सेना की व्यवस्था करनी पड़ती थी। जिसका उपयोग युद्ध के समय पेशवा करता था। यह व्यवस्था “सामंती व्यवस्था” के समान थी।

पेशवा कालीन प्रान्तीय एवं जिला प्रशासन

मराठा साम्राज्य कई प्रान्तों में विभक्त था। सामान्तया प्रान्त को “सूबा” कहा जाता था। सूबे में पेशवा के प्रतिनिधि के रूप में “मामलतदार” होता था। बड़े प्रान्तों जैसे-खानदेश, गुजरात तथा कर्नाटक सर सूबेदार के अधीन होते थे और सर सूबेदार के अधीन मामलतदार होता था। कर्नाटक प्रान्त को छोड़कर सभी प्रान्तों के मामलतदार अपना ब्यौरा सीधे पेशवा दफ्तर भेजते थे।

कर्नाटक का सर सूबेदार अपना मामलतदार स्वयं नियुक्त करता था। सूबे के मामलतदार के अधीन मण्डल, जिले, सरकार एवं सूबा के सभी कार्यभार होते थे।

“कामविसदार” जिले में पेशवा का प्रतिनिधि होता था। शिवाजी के काल में कामविसदार का पद हस्तान्तरणीय था किन्तु पेशवा काल में यह वंशानुगत हो गया। कामविसदार प्रशासनिक कार्यों जैसे-दीवानी, फौजदारी, न्याय, पुलिस स्थानीय हिबन्दी (नागरिक सेना), सामाजिक और धार्मिक विवादों को सुलझाने में मामलतदार की सहायता करता था।

ग्रामों में कर का निर्धारण मामलातदार स्थानीय पटेलों (ग्राम मुखिया) के परामर्श पर करता था। कर वसूलने का कार्य स्थानीय हिबन्दी द्वारा किया जाता था।

देशमुख तथा देशपाण्डेय अन्य जिलाधिकारी होते थे जो मामलतदार पर नियन्त्रण रखते थे। इनकी पुष्टि के बिना कोई लेखा स्वीकार नहीं किया जाता था। ये अधिकारी भ्रष्टाचार को रोकने का भी कार्य करते थे। “दरखदार” नामक वंशानुगत अधिकारी देशमुख तथा देशपाण्डेय के कार्यों पर नियन्त्रण रखता था।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक जिले में “कारकुन” नामक अधिकारी होता था जो विशेष घटनाओं की सूचना सीधे केन्द्र को देता था। जिले से छोटे प्रशासकीय भोगों को महल (परगना) या तरफ कहते थे। जिसका प्रमुख अधिकारी “हवलदार” कहलाता था। हवलदार की सहायता के लिए मजूमदार तथा फड़नवीस होते थे।

पेशवा काल में ग्राम प्रशासन

प्रशासन की सबसे छोटी इकाई के रूप में ग्राम थे। ग्राम का प्रमुख अधिकारी “पटेल या पाटिल” कहलाता था। जो न्यायिक, प्रशासनिक और कर सम्बन्धी कार्य करता था।

पटेल ग्राम तथा पेशवा के अधिकारियों के बीच एक कड़ी था। पटेल का पद वंशानुगत था। किन्तु इसका क्रय-विक्रय या आंशिक हस्तान्तरण किया जा सकता था।

ग्रामों से कर संचय का अधिकार पटेल को ही होता था। इस कार्य के लिए पटेल को सरकार से वेतन नहीं मिलता था। वह एकत्रित कर का एक छोटा सा भाग अपने लिए रख लेता था।

पटेल ग्राम समाज का नेता होता था तथा राजनैतिक गड़बड़ी के समय ये अपने ग्राम की नेक चलनी की जमानत भी देते थे।

ग्राम में पटेल के नीचे “कुलकर्णी” नामक अधिकारी होता था। जो ग्राम की भूमि का लेखा जोखा रखता था। इसके बाद “चौगुले” का पद था जो पटेल की सहायता करता था।

“पोतदार” सिक्कों के निर्धारित भार एवं धातु की शुद्धता की जांच करता था। इसके अतिरिक्त ग्रामों में 12 बलूटे (शिल्पी) तथा 12 अलूटे (ग्राम सेवक) भी नियुक्त किये जाते थे।

पेशवा कालीन नगर प्रशासन

पेशवाओं के अधीन मराठों का नगर प्रशासन मौर्यों के नगर प्रशासन से मिलता जुलता था। मराठा काल में “कोतवाल” नगर का मुख्य अधिकारी होता था। यह नगर का मुख्य दण्डाधिकारी एवं पुलिस का मुखिया होता था। कोतवाल मौर्य काल के नगर अधिकारी “नागरक” के समान होता था। इसका कर्त्तव्य महत्वपूर्ण झगड़ो को निबटाना, मूल्यों को नियमित करना, नगर में आने जाने वालों का ब्यौरा रखना एवं सरकार को मासिक ब्यौरा भेजना होता था।

पेशवा कालीन न्याय प्रशासन

मराठा कानून मूलतः स्मृति ग्रंथों, दायभाग और मनुस्मृति आदि ग्रंथों पर आधारित था। ग्राम में न्याय के लिए पटेल, जिले में मामलतदार, सूबे में सर सूबेदार तथा सबसे ऊपर सतारा का राजा होता था।

नगरों में न्याय के लिए न्यायाधीश होते थे जो शास्त्रों में पारंगत होते थे तथा केवल न्याय कार्य ही करते थे। न्याय समय की आवश्यकता अनुसार होता था। मुकदमों की कार्यविधि निश्चित नहीं होती थी और न ही कानून संहिताबद्ध था। प्रयत्न इस बात के लिए किया जाता था कि आपस में मित्रतापूर्ण समझौता हो जाये।

छत्रपति तथा पेशवा आधुनिक न्यायाधीशों के स्थान पर “कुलपिता” की भूमिका निभाते थे। दीवानी मुकदमों का फैसला पंचायतें करती थीं। उन्हें “पंच परमेश्वर” कहा जाता था। दोनों पक्षों को पंचायत की बात स्वीकार करनी पड़ती थी। पंचायत के फैसले के विरुद्ध अपील मामलतदार के पास की जा सकती थी। पंचायत के फैसलों में बेईमानी का पता लगने के बाद पेशवा ऐसे मुकदमों पर पुर्नविचार करता था।

फौजदारी के मामले भी दीवानी के अधिकारी ही सुनते थे। घोर अपराध करने वालों के अंग-भंग कर दिये जाते थे। देशद्रोह के मामले में यातनाएं दी जाती थीं। चोरी, डकैती एवं हत्या आदि पर जेल अथवा सम्पत्ति जब्त की सजा सुनाई जाती थी। “न्याय का उद्देश्य सुधार था न कि अपराधी को निराश करना”। नगरों में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के लिए पुलिस की व्यवस्था थी।

पेशवाओं के अधीन मराठा सैनिक व्यवस्था

मराठा सेना का गठन मुख्य रूप से “मुगल सैन्य व्यवस्था” से प्रभावित था। पेशवाओं के समय मराठा सेना में समस्त भारत से एवं सभी जातियों, धर्मों तथा वर्गों के सैनिक भर्ती किये जाते थे। पेशवाओं ने सेना रखने के लिए “सामन्तशाही पद्धति” को अपनाया इसके लिए उन्होंने बहुत सा साम्राज्य जागीरों में बांट दिया था। सेना कई अंगों में बंटी थी। जैसे-घुड़सवार, पदाति, तोपखाना तथा नौसेना। नियमित सेना को “पगा” कहा जाता था।

1-घुड़सवार-मराठा सेना का प्रमुख अंग घुड़सवार थे। सरदारों को निश्चित जागीर के बदले में घुड़सवारों की निश्चित संख्या रखनी पड़ती थी। घुड़सवार सेना को वर्ष में एक बार पेशवा के समक्ष निरीक्षण के लिए लाना पड़ता था। अश्वारोही सेना में चार प्रकार के घुड़सवार सम्मिलित रहते थे-खासगी पागा, सिलेदार, एकण्डा और पिण्डारी।

2-पदाति सेना-साम्राज्य का नर्वदा पार विस्तार होने पर पदाति सेना की अधिक आवश्यकता हुई। जिसके लिए राजपूत, रुहेले, सिन्धी एवं अरबों को भरती किया गया। विदेशियों को पदाति सेना में भर्ती होने के अधिक धन दिया जाता था।

3-तोपखाना-तोपखाना मराठा सेना की प्रमुख विशेषता थी। तोपखाने में सामान्यतः पुर्तगाली और ईसाई ही कार्य करते थे। पेशवाओं ने तोपें और गोले बनाने के लिए अपने कारखाने स्थापित किये थे। जुन्नार जिले के अम्बेगांव में एक गोले बनाने का कारखाना 1765 ई. में तथा दूसरा पूना में 1770 ई. में लगाया गया था। फिर भी मराठे काफी हद तक तोपों और गोलों की आवश्यकता के लिए अंग्रेजों तथा पुर्तगालियों पर ही निर्भर थे।

4-नौसेना-अंग्रियों (मराठा सरदार) के पास पश्चिमी तट पर एक शक्तिशाली नौसेना थी। लेकिन ये अंग्रिये पेशवा के अधीन नहीं थे। पेशवाओं ने भी अपनी नौसेना बनाई किन्तु वे इसका प्रयोग समुद्री डाकुओं को रोकने, आने जाने वाले जहाजों से “जकात” प्राप्त करने तथा मराठा बन्दरगाहों की रक्षा करने के लिए करते थे। सरटण्डल, टण्डल तथा नाविक नौसेना के प्रमुख अधिकारी होते थे।

मराठों की दुर्ग व्यवस्था में दुर्गों के संरक्षक बड़े-बड़े पदाधिकारी तथा सामन्तगण होते थे। दुर्गों के प्रधान अधिकारी “हवलदार”, “सवनिस” तथा “कारखानिस” आदि थे। दुर्गों की आय का मुख्य साधन आस पास के गाँवों की मालगुजारी थी।

अतः कहा जा सकता है कि पेशवाओं के अधीन मराठा प्रशासन पद्धति उत्तम नियमों पर आधारित थी।यह प्रशासन पद्धति मराठों ने अपने हिन्दू पूर्वजों और मुस्लिमों से प्राप्त की थी।

IMPORTANT QUESTIONS

Question. किस व्यवस्था ने “संगठित मराठा साम्राज्य” को असंगठित समूह में बदल दिया?

Answer. सरंजमी या सामन्ती व्यवस्था ने

Question. वित्तीय संकट के समय वसूल किया जाने वाला कर कौन सा था

Answer. कुर्जा पट्टी अथवा तस्ती पट्टी

Question. सरदेशमुखी तथा चौथ नामक कर किससे लिए जाते थे?

Answer. पेशवाओं के अधीन पड़ोसी राज्यों से

Question. पेशवा काल में अव्वल, साधारण तथा निम्न शब्द किसके लिए प्रयुक्त होते थे?

Answer. भूमि के लिए

Question. पतदाम नामक कर लिया जाता था-

Answer. विधवा पुनर्विवाह पर

Question. “मोड़ी लिपि” का प्रयोग किसके विलेखों में किया गया है?

Answer. मराठों के