प्रागैतिहासिक काल

मानव विकास के उस कालखण्ड को प्रागैतिहासिक काल कहते हैं जिसका कोई लिखित विवरण उपलब्ध नहीं है। इस काल के विषय में जो भी जानकारी मिलती हैं वह पाषाण के उपकरणों, मिट्टी के वर्तनों, खिलौनों आदि से मिलती है।

आद्य-ऐतिहासिक काल

मानव विकास का वह काल खण्ड, जिसमें लेखन कला के प्रचलन के बाद भी उपलब्ध लेख पढ़े नहीं जा सके हैं। आद्य-ऐतिहासिक काल कहलाता है।

ऐतिहासिक काल

मानव विकास के उस काल को ऐतिहासिक काल कहा जाता है जिसका विवरण लिखित रूप से उपलब्ध है।

इस धरती पर मनुष्य की कहानी आज से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व से प्रारम्भ होती है। परन्तु ज्ञानी मानव (होमो सेपियंस) का प्रवेश आज से लगभग 35 से 40 हजार वर्ष पहले हुआ।

भारत में प्रागैतिहासिक काल

भारत में प्रागैतिहासिक काल के अध्ययन की शुरूआत का श्रेय डॉ. प्राइमरोज को जाता है। इन्होंने 1842 में कर्नाटक के लिंगसुगुर नामक स्थान से प्रागैतिहासिक औजारों की खोज की थी। ये औजार पत्थर के बने हुए थे।

19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कर्नल मीडोजट्रेलर ने हैदराबाद में महापाषाण कालीन कब्रों की खोज की।

भारत के समग्र प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक अनुक्रम को मार्टिमर व्हीलर ने व्यवस्थित किया। 1950 में स्टुअर्ट पिग्गट की प्रसिद्ध कृति “प्री-हिस्टारिक इंडिया” ने भारतीय प्रागैतिहासिक अध्ययन को एक नयी दिशा प्रदान की। प्रागैतिहासिक भारत को निम्नलिखित तीन भागों में बांटा जाता है।

पुरा पाषाण काल

मध्य पाषाण काल

नव पाषाण काल

प्रागैतिहासिक काल की आदि जातियाँ

 प्रारम्भिक काल में भारत में कितने प्रकार की जातियाँ निवास करती थी तथा उनमें किस स्तर के सम्बन्ध थे, यह प्रश्न अत्यन्त विवादित है। फिर भी नवीन मान्यताओं में डॉ. बी. एस. गुहा का मत सर्वाधिक मान्य है। इनके अनुसार भारत वर्ष प्रारम्भिक जातियों को छः श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

1-नीग्रेटो

अंडमान द्वीप समूह में ही इस जाति के कुछ अवशेष मिलते हैं। अफ्रीका से चलकर अरब, ईरान और बलूचिस्तान के रास्ते भारत पहुँची यह जाति भारत की प्राचीनतम जातियों में से एक थी। इस जाति के जीवन का मुख्य आधार शिकार था। ये मछलियों को समुद्र से पकड़ कर खाते थे। नीग्रेटो जाति का पूर्ण उन्मूलन प्रोटो आस्ट्रेलायड जाति द्वारा किया गया।

2-प्रोटो-आस्ट्रेलायड

यह जाति सम्भवतः फिलिस्तीन से भारत आयी थी। भारत में निवास करने वाली कोल तथा मुंडा जातियों में प्रोटो आस्ट्रेलायड जाति के कुछ लक्षण दिखाई देते हैं।

जब आर्य भारत आये तब यह जाति पंजाब तथा उत्तरी व दक्षिणी भारत में निवास कर रही थी। इस जाति के लोग कृषि कार्य से परिचित थे, पशु पालन करते थे तथा वस्त्र निर्माण की तकनीक जानते थे।

3-मंगोलायड

नाटे कद, चौड़े सिर, चपटी नाक वाली यह जाति सिक्किम, असम, भूटान एवं भारत तथा म्यामांर के सीमा पर आज भी बसती है।

4-भूमध्य सागरीय द्रविड़

इस जाति के लोगों का कद छोटा, नाक छोटी, सर बड़ा एवं रंग काला होता था। इस जाति के लोग मूलरूप से कहाँ के निवासी थे। यह प्रश्न अब भी विवादित है। रिजले के अनुसार द्रविड़ भारत के मूलनिवासी थे। काल्डवेल के अनुसार द्रविड़ बलूचिस्तान के मूल निवासी थे।

कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार द्रविड़ भूमध्य सागरीय प्रदेश के निवासी थे। सिन्धु सभ्यता के निर्माता सम्भवतः द्रविड़ ही थे। ऋग्वेद में द्रविड़ो के लिये “दस्यु” और “दास्य” शब्द का प्रयोग किया गया है।

5-पश्चिमी ब्रैचीसेफल- यह जाति काठियावाड़, कुर्ग आदि में निवास करती थी।

6-नार्डिक- यह जाति पश्चिमी भारत में पायी जाती है।

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