संचार किसे कहते हैं? संचार का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, सिद्धांत

sanchar - communication

संचार एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में मनुष्य आपस में बातचीत करते हैं और अपने अनुभवों का आपस में आदान-प्रदान करते हैं। इसके बिना में मनुष्य की प्रगति संभव नहीं है। संचार संबंध जोड़ने की एक महत्वपूर्ण तकनीक है जिसके द्वारा अपने एवं अन्य व्यक्तियों के ज्ञान एवं अनुभव को साझा (Share) किया जा सकता है।

मनुष्य अनेक संकेतों तथा ध्वनियों को सुनता और समझता है, अपने हाव-भाव को व्यक्त करता है, इन्हीं संदेशों और विचारों के आदान-प्रदान को संचार कहते हैं।

संचार का अर्थ

संचार का शाब्दिक अर्थ है फैलाव-विस्तार, किसी बात को आगेबढ़ाना, चलाना, फैलाना। और जनसंचार का आशय है – जन-जन मे भावों की, विचारों की अभिव्यक्तिकरना और भावों और विचारों को समझना।इस तरह कम्यूनिकेशन -संचार का अर्थ है –

  1. विचारों, भावनाओं, सूचनाओं का आदान-प्रदान करना
  2. आपसी समझ बढ़ाना और
  3. जानना अथवा बोध करना।

इस रूप में संचार के अन्तर्गत सोचना, बोलना, सुनना, देखना, पढ़ना, लिखना, परस्पर व्यवहार,विचार विमर्श, सम्भाषण, वाद-विवाद सब आ जाता है। आपसी बातचीत, टेलिफोनिक सम्प्रेषण, पत्राचार,यह सब भी संचार के अन्तर्गत आ जाता है। यह संचार मनुष्य तो करता ही है, संसार के समस्त अन्यप्राणी किसी न किसी रूप में संचार करते हैं।

संचार शब्द, अंग्रेजी भाषा के शब्द का हिन्दी रूपान्तरण है । जिसका विकास Commune शब्द से हुआ है । जिसका अर्थ है अदान-प्रदान करना अर्थात बाँटना ।

संचार की परिभाषा

संचार शब्द की सामान्य परिभाषा नित्य प्रयुक्त होने वाले अर्थ में देखी जा सकतीहै यानि कोई विचार अथवा सूचना देना, प्राप्त करना अथवा सूचनाओं एवं विचारोंका आदान-प्रदान करना।

न्यू वेबस्टर शब्दकोश में संचार प्रणाली की परिभाषा है,विचार, राय, सूचना, भाषा आदि कोई कार्य लिखित या मौखिक रूप से देना-लेनाया भेजना होता है।

आक्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार, संचार प्रक्रिया का अर्थ, अपनी बात कहना,विचारों का आदान-प्रदान करना होता है, जो बोलकर या व्यक्त करके किए जासकते हैं।

  • डेनिस मेकक्वेल के शब्दों में संचार प्रक्रिया एक ऐसी क्रिया है,जो सांझापन बढ़ाती है। वह कहता है कि संचार का अर्थ है एक व्यक्ति से दूसरेको उपयोगी संदेश पहुँचाना।
  • चाल्र्स मोरिस इसे दो तरह परिभाषित करते हैं। व्यापक अर्थ देना संचार प्रक्रिया काअर्थ है सांझापन को विकसित करना और सीमित अर्थ में संकेतों का अर्थपूर्णआदान-प्रदान।
  • जॉर्ज लुंडबर्ग के अनुसार संचार प्रक्रिया का अर्थ है विचारों कोसंकेतों और चिहनों की सहायता से उपयोगी रूप प्रदान करना।
  • चेरी के अनुसार संचार उत्प्रेरक का अदान प्रदान है ।
  • शेनन ने संचार को परिभाषित करते हुए कहा है कि एक मस्तिक का दूसरे मस्तिकपर प्रभाव है ।
  • मिलेन ने संचार को प्रशासनिक दृष्टिकोण से परिभाषित किया है । आपके अनुसार,संचार प्रशासनिक संगठन की जीवन-रेखा है ।

डा. श्यामारचरण के शब्दों में :-संचार सामाजीकरण का प्रमुख माध्यम है ।संचार द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है। सामाजीकरण की प्रत्येक स्थिति और उसका हर रूप संचार पर आश्रित है । मनुष्यजैविकीय प्राणी से सामाजिक प्राणी तब बनता है, जब वह संचार द्वारा सांस्कृतिकअभिवृत्तियों, मूल्यों और व्यवहार-प्रकारों को आत्मसात कर लेता है।

  • बीबर के अनुसार, वे सभी तरीके जिनके द्वारा एक मानव दूसरे को प्रभावित करसकता है, संचार के अन्तर्गत आते है ।
  • न्यूमैन एवं समर के दृष्टिकोण में, संचार दा या दो से अधिक व्यक्तियों के तथ्यों,विचारों तथा भावनाओं का पारस्परिक अदान-प्रदान है ।
  • विल्वर के अनुसार संचार एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा स्रोत से श्रोता तकसन्देश पहुँचता है ।
  • जे0 पाल लोगन्स – संचार दो या दो से अधिक व्यक्तियों के तथ्यों, विचारों तथा भावनाओं का पारस्परिक आदान-प्रदान है।

संचार के प्रकार

संचार के कुछ प्रमुख प्रकारों का उल्लेख किया गया है जो संचार की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण आधारप्रदान करते हैं-

  1. औपचारिक एवं अनौपचारिक संचार
  2. अन्तर्वैयक्तिक एवं जन-संचार
  3. मौखिक संचार
  4. लिखित संचार
  5. अमौखिक संचार
  6. अन्तर्वैयक्तिक संचार
  7. जन-संचार

1. औपचारिक संचार

औपचारिक संचार किसी संस्था में विचारपूर्वक स्थापित की जाती है। किस व्यक्तिको किसको और किस अन्तराल में सूचना देनी चाहिए, यह किसी संस्था में विभिन्न स्तरोंपर कार्यरत् व्यक्तियों के मध्य सम्बन्धों को स्पष्ट करने में सहायक होता है। औपचारिकसन्देशवाहन के निर्माण व प्रेषण में अनेक औपचारिक सम्वाद अधिकांशत: लिखित होते हैं।

औपचारिक संचार के लाभ –

  1. औपचारिक संचार अधिकृत संचार कर्ता के द्वारा सही सूचना प्रदान की जाती है।
  2. यह संचार लिखित रूप में होता है।
  3. इस संचार के द्वारा संचार की प्रति पुष्टि होती है।
  4. यह संचार व्यवस्थित एवं उचित तरीके से किया जाता है।
  5. यह संचार करते समय संचार के स्तरों के क्रमों का विशेष ध्यान रखा जाता है।
  6. इस संचार के माध्यम से संचारक की स्थिति का पता सरलता से लगाया जासकता है।
  7. इस संचार के द्वारा व्यावसायिक मामलों को आसानी से नियंत्रित एवं व्यवस्थितकिया जा सकता है।
  8. इस संचार के द्वारा दूर स्थापित लोगों से सम्बन्ध आसानी से स्थापित किये जासकते हैं।

औपचारिक संचार के दोष –

  1. इस संचार की गति धीमी होती है।
  2. समान्यतया इस संचार में उच्च अधिकृत लोगों का अधिभार ज्यादा होता है।
  3. इस संचार में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से संचार की आलोचना नहीं की जा सकतीहै।
  4. इस संचार में नियमों का शक्ति से पालन किया जाता है जिसंके कारण संचार मेंलोचशीलता के अभाव के कारण बाधा उत्पन्न होने की संभावना हमेशा विद्यमानरहती है।

2. अनौपचारिक संचार

अनौपचारिक सन्देश वाहनों में किसी प्रकार की औपचारिकता नहीं बरती जाती। ऐसेसन्देशवाहन मुख्यत: पक्षकारों के बीच अनौपचारिक सम्बन्धों पर निर्भर करते हैं।अनौपचारिक सन्देशवाहन के कुछ उदाहरण है – नेत्रों से किये जाने वाले इशारे, सिरहिलाना, मुस्कराना, क्रोधित होना आदि।

ऐसे संचार का दोष यह होता है कि सावधानी केअभाव में कभी-कभी अफवाहों को फैलाने में सहायक हो जाते हैं।

अनौपचारिक संचार के लाभ –

  1. इस संचार के द्वारा सौहार्द सम्बन्धी एवं संभावनाओं का आदान प्रदान होता है।
  2. इस संचार के द्वारा संचार की गति अत्यधिक तेज होती है।
  3. इस संचार में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से विचारों का आदान-प्रदान किया जाता है।
  4. इस संचार के माध्यम से सम्बन्धों में व्याप्त तनाव में कमी आती है तथा लोगों केमध्य सांवेगिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं।

अनौपचारिक संचार के दोष –

  1.  इस संचार के द्वारा अविश्वसनीय तथा अपर्याप्त सूचना प्राप्त होती है।
  2. इस संचार में सूचना प्रदान करने का उत्तरदायित्व निश्चित नहीं होता है तथासूचना किस स्तर से तथा कहाँ से प्राप्त हुई है, का पता लगाना आसान नहीं होताहै।
  3. इस प्रकार का संचार ज्यादातर किसी भी संगठन में समस्या को उत्पन्न कर सकताहै।
  4. इस संचार में सूचना किस स्तर से तथा कहाँ से प्राप्त हो रही है का स्रोत निश्चितनहीं होता है जिसके कारण सूचना के उद्देश्यों की प्राप्ति तथा उसका अर्थ निरूपणकरने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

3. लिखित संचार

लिखित संचार एक प्रकार औपचारिक संचार है जिसमें सूचनाओं का आदान-प्रदानलिखित रूप में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को प्रेषित किया जाता है इस संचार के द्वारासंचारक को लिखित रूप में प्रेषित किये गये संदेश का अभिलेख रखने में आसानी होतीहै।

लिखित संचार के द्वारा यह स्पष्ट होता है कि आवश्यक सूचना प्रत्येक व्यक्ति कोसमान रूप से प्रदान की गई है। एक लिखित संचार सही, सक्षिप्त, पूर्ण तथा स्पष्ट होताहै।

लिखित संचार के साधन-बुलेटिन, हंडै बुक्स व डायरियां, समाचार पत्र, मैगजीन, सुझाव-योजनायें, व्यावहारिक पत्रिकायें, संगठन-पुस्तिकायें संगठन-अनुसूचियाँ, नीति- पुस्तिकायेंकार्यविधि पुस्तिकायें, प्रतिवेदन, अध्यादेश आदि।

लिखित संचार के लाभ –

  1. लिखित सम्प्रेषण की दशा में दोनों पक्षों की उपस्थिति आवश्यक नहीं है
  2. विस्तृत एवं जटिल सूचनाओं के सम्प्रेषण के लिए यह अधिक उपयुक्त है।
  3. यह साधन मितव्ययी भी है क्योंकि डाक द्वारा समाचार योजना, दूरभाष पर बातकरने की उपेक्षा सस्ता होता है।
  4. लिखित संवाद प्रमाण का काम करता है तथा भावी संदभोर्ं के लिए इसका उपयोगकिया जाता है।

लिखित संचार के दोष –

  1. लिखित संचार की दशा में प्रत्येक सूचना को चाहे वह छोटी हो अथवा बड़ी,लिखित रूप में ही प्रस्तुत करना पड़ता है जिनमें स्वभावत: बहुत अधिक समय वधन का अपव्यय होता है।
  2. प्रत्येक छोटी-बड़ी बात हो हमेशा लिखित रूप में ही प्रस्तुत करना सम्भव नहींहोता।
  3. लिखित संचार में गोपनीयता नहीं रखी जा सकती।
  4. लिखित संचार का एक दोष यह भी है कि इससे लालफीताशाही का बढ़ावा मिलताहै।
  5. अशिक्षित व्यक्तियों के लिए लिखित स्म्प्रेषण कोई अर्थ नहीं रखता।मौखिक अथवा लिखित संचार के अपेक्षाकृत श्रेष्ठ कौन है, इसका निर्णय करना एक कठिनसमस्या है। वास्तव में इसका उत्तर प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

4. मौखिक संचार

मौखिक संचार से तात्पर्य संचारक द्वारा किसी सूचना अथवा संवाद का मुख सेउच्चारण कर संवाद प्राप्तकर्ता को प्रेरित करने से है। दूसरे शब्दों में, जो सूचनायें यासंदेश लिखित न हो वरन् जुबानी कहें या निर्गमित किये गये हो उन्हें मौखिक संचार कहतेहैं।

इस विधि के अन्तर्गत संदेश देने वाला तथा संदेश पाने वाले दोनों एक-दूसरे केसामने होते है इस पद्धति में व्यक्तिगत पहुँच सम्भव होती है।

लारेन्स एप्पले के अनुसार, ‘‘मौखिक शब्दों द्वारा पारस्परिक संचार सन्देशवाहन की सर्वश्रेष्ठकला है।

मौखिक संचार के साधन – आमने सामने दिये गये आदेश, रेडियो द्वारा संचार, दूरदर्शन,दूरभाष, सम्मेलन या साभाएँ, संयुक्त विचार-विमर्श, साक्षात्कार, उद्घोषणाएँ आदि।

मौखिक संचार के लाभ –

  1. इस पद्धति से समय व धन दोनों की बचत होती है।
  2. इसे आसानी से समझा जा सकता है।
  3. संकटकालीन अवधि में कार्य में गति लाने के लिए मौखिक पद्धति एक मात्र विधिहोती है।
  4. मौखिक संचार लिखित संचार की तुलना में अधिक लचीला होता है।
  5. मौखिक संचार पारस्परिक सद्भाव व सद्विश्वास में वृद्धि करता है।

मौखिक संचार के दोष –

  1. मौखिक वार्ता को बातचीत के उपरान्त पुन: प्रस्तुत करने का प्रश्न ही नहीं उठता।
  2. मौखिक वार्ता भावी संदर्भ के लिए अनुपयुक्त है।
  3. मौखिक सन्देशवाहन में सूचनाकर्ता को सोचने का अधिक मौका नहीं मिलता।
  4.  खर्चीला
  5. तैयारी की आवश्यकता।
  6. अपूर्ण।

5. अमौखिक संचार

यह संचार का प्रकार है जो न मौखिक होता है और न ही लिखित। इस संचार मेंएक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अमौखिक रूप से सूचना को प्रदान करता है, उदाहरण केरूप में-शारीरिक हाव-भाव के द्वारा। इस संचार में शारीरिक भाव-भंगिमा के माध्यम सेसंचार को प्रेषित किया जाता है। जिसे प्राप्तकर्ता अमौखिक रूप से सरलता से समझ जाताहै, जैसे-चेहरे का भाव, आंखों तथा हाथ का इधर-उधर घूमना आदि के द्वारा भावनाओं,संवेगों, मनोवृत्तियों इत्यादि को असानी से समझ सकता है।

अमौखिक संचार के लाभ –

  1. इस संचार के द्वारा भावनाओं, संवेगों, मनोवृत्ति इत्यादि को कम समय में प्रेषितकिया जा सकता है।
  2. इस संचार को एक प्रकार से मौखिक संचार का प्रारूप माना जा सकता है जिसमेंमौखिक संचार के लाभों एवं दोषों को शामिल किया जा सकता है।
  3. इस संचार के द्वारा लोगों को प्रेरित, प्रभावित तथा एकाग्रचित किया जा सकता है।

6. अन्तर्वैयक्तिक संचार

अन्र्तवैयक्तिक संचार का एक प्रकार हैं जिसमेंं संचारकर्ता तथा प्राप्तकर्ता एक-दूसरेके आमने-सामने होते हैं। अन्र्तवैयक्तिक संचार लिखित अथवा मौखिक दोनों रूप में होसकते हैं, अन्र्तवैयक्तिक संचार के अन्तर्गत लिखित रूप में यथा पत्र, डायरी इत्यादि कोशामिल किया जा सकता है जबकि मौखिक संचार में टेलिफोन, आमने-सामने की बातचीतइत्यादि को शामिल कर सकते हैं।

अन्तर्वैयक्तिक संचार के लाभ –

  1. इस संचार के द्वारा संचारक तथा प्राप्तकर्ता के मध्य सामने-सामने के सम्बन्धहोते हैं। जिसके कारण मौखिक संदेश की गोपनीयता बनी रहती हैं।
  2. इस संचार में संचारक तथा प्राप्तकर्ता ही होते हैं जिसके कारण सूचना अन्य लोगोंके पास नहीं जा पाती है।

7. जन-संचार

जन-संचार संचार का एक माध्यम हैं जिसके द्वारा कोई भी संदेश अनेक माध्यमों केद्वारा जन-समुदाय तक पहुंचाया जाता है। वर्तमान समय में शायद ही ऐसा कोई व्यक्तिहोगा जो जन-संचार माध्यम से न जुड़ा हो। सच पूछा जाय तो आज के मनुष्य काविकास जन-संचार के माध्यमों द्वारा ही हो रहा है।

जन-समुदाय की आवश्यकताओं कोपूरा करने में जन-संचार माध्यमों की बड़ी भूमिका होती है। जो कि सभी वर्ग, सभी कार्यक्षेत्र से जुड़े लोगों तथा सभी उम्र के लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने में सहायता प्रदानकरते हैं वर्तमान समय में जन-संचार के अनेक माध्यम हैं, जैसे-समाचार पत्र/पत्रिकायें,रेडियों, टेलीविजन, इंटरनेट इत्यादि।

संचार के सिद्धांत

संचार की प्रक्रिया विभिन्न अध्ययनों के पश्चात स्पष्ट होता है कि संचार को आधारप्रदान करने के लिए सिद्धांत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

1. उद्देश्यों के स्पष्ट होने का सिद्धांत-संचार की सफलता के लिए यह आवश्यक है किसंचार के उद्देश्य विशिष्ट एवं स्पष्ट हों जिससे की प्राप्तकर्ता संचार के विषय कोसार्थक रूप से समझ सके।

2. श्रोताओं के स्पष्ट ज्ञान का सिद्धांत-संचार की सफलता के लिए आवश्यक है किसंचारक को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि श्रोतागण कैसे हैं जिससे प्रेषित कियेजाने वाले विषय को श्रोता के ज्ञान एवं उनकी इच्छा के अनुसार सारगर्भित रूप मेंप्रेषित किया जा सके। इसके अतिरिक्त इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए किसंचार को श्रोतागण आसानी से समझ सके।

3. विश्वसनीयता बनाये रखने का सिद्धांत-संचारक के लिए यह आवश्यक हो जाता है किवह समुदाय में अपनी स्थिति प्रास्थिति को बनाये रखे क्योंकि संचारक के द्वारा प्रेषितकिये जाने वाला संचार संचारक के सामथ्र्य पर निर्भर करता है यदि समुदाय के लोगोंको इस बात का विश्वास होता है कि संचारक समुदाय के हित के लिए संदेश कोप्रेषित करेगा।

4. स्पष्टता का सिद्धांत-संचार में प्रयोग की जाने वाली भाषा एवं प्रेषित किये जाने वालाविषय सरल एवं समरूप होना चाहिए जिससे कि संचार को लोग आसानी से समझसके। संचार करते समय यदि क्लिष्ट भाषा का प्रयोग किया जाता है तो संचार कीप्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

5. शब्दों को सोच-विचार कर प्रेषित एवं संगठित करने का सिद्धांत-संचारक के लिएआवश्यक होता है कि संचार में प्रयोग किये जाने वाले शब्दों का चयन उचित प्रकार सेकिया जाये तथा विचारों में तारतम्यता निहित हो। यदि संचार करते समय शब्दों काचयन कुछ सोच-समझकर नहीं किया जाता है और शब्दों के मध्य तारतम्यता तथाएकरूपता नहीं होता है तो प्राप्तकर्ता संचार के उद्देश्यों को समझ नहीं पाता है।

6. सूचना की पर्याप्तता का सिद्धांत-संचारक के लिए यह आवश्यक होता है कि संचारकरते समय सूचना पर्याप्त रूप में प्रेषित की जाये इसके लिए यह भी आवश्यक होता हैकि सूचना किस स्तर पर प्रेषित की जा रही है। सूचना की अपर्याप्तता के कारणप्राप्तकर्ता संचार के उद्देश्यों का अर्थ निरूपण विपरित लगा सकता है जिसके कारणसंचार के असफल होने की संभावना उत्पन्न हो जाती है।

7. सूचना के प्रसार का सिद्धांत-संचार की सफलता के लिए आवश्यक होता है किसूचना का प्रसार सही समय पर, सही परिपेक्ष््र य में, सही व्यक्ति को उचित कारण केसंदर्भ में पे्रषित की जाये तथा सूचना प्रसारित करते समय इस तथ्य का भी ध्यान रखाजाय कि सूचना प्राप्तकर्ता कौन है यदि संचारक सूचना प्रेषित करते समय, परिप्रेक्ष्य,उचित व्यक्ति तथा स्पष्ट उद्देश्य का ध्यान नहीं रखता है तो संचार असफल हो जाताहै।

8. सघनता एवं सम्बद्धता का सिद्धांत-सफल संचार के लिए आवश्यक है कि सूचना मेंसघनता एवं सम्बद्धता का तत्व विद्यमान हो, सूचना को प्रदान किये जाने का क्रम 666क्रियान्वित किया जा सके।

9. एकाग्रता का सिद्धांत-संचार की सफलता के लिए आवश्यक है कि संचारक एवंप्राप्तकर्ता दोनों एकाग्रचित्त होकर कार्य करे। संचारक के लिए आवश्यक है कि संचारप्रेषित करते समय अपनी एकाग्रता को भंग न होने दे तथा प्राप्तकर्ता के लिए भी यहआवश्यक होता है कि वह एकाग्रचित होकर के प्रेषित संचार का अर्थ निरूपण करे।

10. समयबद्धता का सिद्धांत-संचार तभी सफल हो सकता है जब वह उचित तथानिश्चित समय पर किया जाये। संचार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संचारकरते समय संचार के उद्देश्यों की प्राप्ति सही समय पर हो पायेगी अथवा नहीं।

11. पुर्ननिर्देशन का सिद्धांत-संचार की प्रक्रिया तभी सफल हो सकती है जब प्राप्तकर्ताप्रेषित संदेश का सही एवं उचित अर्थ निरूपण करके संचारक को प्रतिपुष्टि प्रदान करेंक्योंकि प्रतिपुष्टि के द्वारा संचारक को इस बात का ज्ञान होता है कि जिस उद्देश्य कीप्राप्ति हेतु संदेश को प्रेषित किया गया है वह सफल हुआ है अथवा नहींं।

संचार में चरण

1. प्रथम चरण:- प्रेषक संदेश को कूटसंकेत करता है एवं भेजने के लिये उपयुक्त माध्यम काचयन करता है । प्रेषत किये जाने सन्देश का प्रेषक मौखिक, अमौखिक अथवा लिखित रूप में उचित माध्यम से भेजना है ।

2. द्वितीय चरण-प्रेषक दूसरे चरण में सन्देश को भेजता है तथा यह प्रयास करता है किसन्देश प्रेषित करते समय किसी भी प्रकार का व्यवधान न उत्पन्न हो तथाप्राप्तकर्ता बिना किसी व्यवधान के संदेश को समझ सकें ।

3. तृतीय चरण- प्राप्तकर्ता प्राप्त सन्देष का अर्थ निरूपण करता है तथा आवश्यकता केअनुसार उसकी प्रतिपुष्टि करने का प्रयास करता है ।

4. चर्तुथ चरण- प्रति पुष्टि चरण में प्राप्त कर्ता प्राप्त सन्देश का अर्थ निरूपण करने के पश्चातप्रेषक के पास प्रति पुष्टि करता है ।

संचार के साधन

वर्तमान समय में संचार के अनेक साधन का उपयोग किया जा रहा है जो कि है –

  1. पत्र :-वाहय संचार के अधिकतर पत्रों के माध्यमों से सूचना अथवा सन्देश काआदान-प्रदान किया जाता है । यथा-आदेश, व्यापार से सम्बन्धित अभिलेखइत्यादि।
  2. फैक्स :- फैक्स भी संचार की विधि है जिसके द्वारा त्वरित संन्देश प्राप्तकर्ता तकपहुँचता है ।
  3. ई-मेल :- सूचनाओं को हस्तांतरित करके के लिये ई-मेल के द्वारा त्वरित एवंसुविधाजनक रूप में सन्देश को प्रेषित किया जाता है ।
  4. सूचना :- सूचना भी संचार की एक प्रविधि है । उदाहरण के लिये किसी संगठन मेंकर्मचारियों को उनसे सम्बन्धित रोजगार, सुरक्षा, स्वास्थ्य, नियम, कानून तथाकल्याणकारी सुविधायें सूचनाओं द्वारा प्रदान की जाती है ।
  5. सारांश :- सारांश प्रविधिका प्रयोग संचार के लिये अधिकतर मीटिंग में किया गयाजाता है।
  6. प्रतिवेदन :- प्रतिवेदन भी संचार की एक प्रविधि है यथा वित्तीय प्रतिवेदन, समितियोंकी सिफारिशें, प्रौधोगिकी प्रतिवेदन इत्यादि ।
  7. दूरभाष :- मौखिक संचार के लिये दूरभाष का प्रयोग किया जाता है । दूरभाषप्रविधि का प्रयोग वहाँ पर अधिक किया जाता है जहाँ पर आमने-सामने सम्पर्कस्थापित नहीं हो पाता है ।
  8. साक्षात्कार :- साक्षात्कार प्रविधि का प्रयोग कर्मचारियों के चयन उनकी प्रोन्नतितथा व्यक्तिगत विचार विमर्श के लिये किया जाता है ।
  9. रेडियो :- एक निश्चित आवृत्ति पर रेडियो के द्वारा संचार को प्रेषित किया जाता है।
  10. टी0वी0 :- टी0वी0 का भी प्रयोग संचार के लिये किया जाता है । जिसे एक उचितनेटवर्क के द्वारा देखा व सुना जाता है ।
  11. वीडियों कान्फ्रेन्सिंग :- वर्तमान समय में वीडियो कान्फ्रेन्सिंग एक महत्वपूर्ण विधि है। जिसमें फोन के तार के द्वारा वीडियों के साथ आवाज को सुना जा सकता है ।इसके अतिरिक्त योजना, चित्र, नक्शा, चार्ट, ग्राफ आदि ऐसे ढंग है जिससे संचारको प्रेषित किया जाता है ।

संचार प्रक्रिया एवं तत्व

संचार एक व्यक्ति से दूसरे तक अर्थपूर्ण संदेश प्रेषित करने वाली प्रक्रिया है। संचार एक द्विमार्गीय प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक लोगों के बीच विचारों,अनुभवों, तथ्यों तथा प्रभावों का प्रेषण होता है । संचार प्रक्रिया में प्रथम व्यक्ति संदेश स्रोत(Source) या प्रेषक (Sender) होता है । दूसरा व्यक्ति संदेश को ग्रहण करने वालाअर्थात प्राप्तकर्ता या ग्रहणकर्ता होता है ।

इन दो व्यक्तियों के मध्य संवाद या संदेश होताहै जिसे प्रेषित एवं ग्रहण किया जाता है प्रेषित किये शब्दों से तात्पर्य ‘अर्थ’ से होता हैतथा ग्रहणकर्ता शब्दों के पीछे छिपे ‘अर्थ’ को समझने के पश्चात प्रतिक्रियों व्यक्त करताहै।

संचार की प्रक्रिया तीन तत्वों क्रमश: प्रेषक (Sender) सन्देश (Message)तथा प्राप्तकर्ता (Reciver) के माध्यम से सम्पन्न होती है। किन्तु इसके अतिरिक्त सन्देशप्रेषक को किसी माध्यम की भी आवश्यकता होती है जिसकी सहायता से वह अपने विचारोंको प्राप्तिकर्ता तक पहुंचाता है।

संचार की प्रक्रिया

अत: कहा जा सकता है कि संचार प्रक्रिया में अर्थों का स्थानान्तरण होता है ।जिसे अन्त: मानव संचार व्यवस्था भी कह सकते है।एक आदर्श संचार-प्रक्रिया के प्रारूप को समझा जा सकता है :-

1. स्रोत/प्रेषक – संचार प्रक्रिया की शुरूआत एक विशेष स्रोत से होता है जहांसे सूचनार्थ कुछ बाते कही जाती है। स्रोत से सूचना की उत्पत्ति होती हैऔर स्रोत एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह भी हो सकता है। इसी कोसंप्रेषक कहा जाता है ।

2. सन्देश – प्रक्रिया का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व सूचना सन्देश है। सन्देश सेतात्पर्य उस उद्दीपन से होता है जिसे स्रोत या संप्रेषक दूसरे व्यक्ति अर्थातसूचना प्राप्तकर्ता को देता है। प्राय: सन्देश लिखित या मौखिक शब्दों केमाध्यम से अन्तरित होता है । परन्तु अन्य सन्देश कुछ अशाब्दिक संकेतजैसे हाव-भाव, शारीरिक मुद्रा, शारीरिक भाषा आदि के माध्यम से भी दियाजाता है ।

3. कूट संकेतन – कूट संकेतन संचार प्रक्रिया की तीसरा महत्वपूर्ण तथ्य हैजसमें दी गयी सूचनाओं को समझने योग्य संकेत में बदला जाता है । कूटसंकेतन की प्रक्रिया सरल भी हो सकती है तथा जटिल भी । घर में नौकरको चाय बनाने की आज्ञा देना एक सरल कूट संकेतन का उदाहरण हैलेकिन मूली खाकर उसके स्वाद के विषय में बतलाना एक कठिन कूटसंकेतन का उदाहरण है क्योंकि इस परिस्थिति में संभव है कि व्यक्ति (स्रोत)अपने भाव को उपयुक्त शब्दों में बदलने में असमर्थ पाता है।

4. माध्यम – माध्यम संचार प्रक्रिया का चौथा तत्व है । माध्यम से तात्पर्य उनसाधनों से होता है जिसके द्वारा सूचनाये स्रोत से निकलकर प्राप्तकर्ता तकपहुँचती है । आमने सामने का विनियम संचार प्रक्रिया का सबसे प्राथमिकमाध्यम है । परन्तु इसके अलावा संचार के अन्य माध्यम जिन्हें जन माध्यमभी कहा जाता है, भी है । इनमें दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, समाचारपत्र,मैगजीन आदि प्रमुख है ।

5. प्राप्तकर्ता – प्राप्तकर्ता से तात्पर्य उस व्यक्ति से होता है । जो सन्देश कोप्राप्त करता है । दूसरे शब्दों में स्रोत से निकलने वाले सूचना को जोव्यक्ति ग्रहण करता है, उसे प्राप्तकर्ता कहा जाता है । प्राप्तकर्ता की यहजिम्मेदारी होती है कि वह सन्देश का सही -सही अर्थ ज्ञात करके उसकेअनुरूप कार्य करे ।

6. अर्थपरिवर्तन – अर्थपरिवर्तन संचार प्रक्रिया का छठा महत्वपूर्ण पहलू है ।अर्थपरिर्वन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सूचना में व्याप्त संकेतों के अर्थकी व्याख्या प्राप्तकर्ता द्वारा की जाती है । अधिकतर परिस्थिति में संकेतोंका साधारण ढंग से व्याख्या करके प्राप्तकर्ता अर्थपरिवर्तन कर लेता है परन्तुकुछ परिस्थिति में जहां संकेत का सीधे-सीधे अर्थ लगाना कठिन है । अर्थपरिवर्तन एक जठिल एवं कठिन कार्य होता है ।

7. प्रतिपुष्टि – संचार का सातवाँ तत्व है । प्रतिपुष्टि एक तरह की सूचना होतीहै जो प्राप्तिकर्ता की ओर से स्रोत या संप्रेषक को प्राप्त स्रोत है। जब स्रोतको प्राप्तकर्ता से प्रतिपुष्टि परिणाम ज्ञान की प्राप्ति होती है । तो वह अपनेद्वारा संचरित सूचना के महत्व या प्रभावशीलता को समझ पाता है ।प्रतिपुष्टि के ही आधार पर स्रोत यह भी निर्णय कर पाता है कि क्या उसकेद्वारा दी गयी सूचना में किसी प्रकार का परिमार्जन की जरूरत है यहाँ ध्यानदेने वाली बात यह है कि केवल द्विमार्गी संचार में प्रतिपुष्टि तत्व पाया जाताहै ।

8. आवाज – संचार प्रक्रिया में आवाज भी एकतत्व है यहॉं आवाज से तात्पर्यउन बाधाओं से होता है जिसके कारण स्रोत द्वारा दी गयी सूचना कोप्राप्तकर्ता ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पाता है या प्राप्तकर्ता द्वारा प्रदत्तपुनर्निवेशत सूचना के स्रोत ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पाता है । अक्सरदेखा गया है कि स्रोत द्वारा दी गई सूचना को व्यक्ति या प्राप्तकर्ताअनावश्यक शोरगुल या अन्य कारणों से ठीक ढ़ग से ग्रहण नहीं कर पाता है। इससे संचार की प्रभावशाली कम हो जाती है ।

उपरोक्त सभी तत्व एक निश्चित क्रम में क्रियाशील होते है और उस क्रम को संचारका एक मौलिक प्रारूप कहा जात है ।

संचार के कार्य

संचार की प्रक्रिया में व्यक्ति अपने श्रोता के कई प्रकार के कार्य करता है। अवसर एवं परिस्थिति के आधार पर संचार के कार्य हैं

  1. यह सूचना या जानकारी का प्रचार-प्रसार करता है तथा सूचनाओं की जानकारी देता है।
  2. संचार में जुड़े लोगों को प्रेरित करता है तथा उन्हें प्रभावित करता है।
  3. संचार समुदायों, लोगों व समाज के विभिन्न वर्गों के मध्य संबंध स्थापित करने में सहायक होता है।
  4. संचार समाज से जुड़े अनेक तथ्यों परेशानियों, मसलों पर, विचार-विमर्श करने में अग्रिम सहायक होता है।
  5. मनुष्यों के मन-बहलाव व खेल-विनोद का प्रमुख साधन है।

संचार नेटवर्क

लिमिट्ट तथा शॉ द्वारा किये अध्ययन के आधार पर पाँच तरह के संचार नेटवर्क कोपहचान की गयी है । संचार नेट वर्क इस प्रकार है ।

1. चक्र नेटवर्क –इस तरह के नेटवर्क में समूह में एक व्यक्ति ऐसाहोता है जिसकी स्थिति अधिक केन्द्रित होती है । उसे लोग समूह के नेता के रूप में प्रत्यक्षण करते है ।

2. श्रृंखला नेटवर्क – श्रृंखला नेटवर्क में समूह का प्रत्येक सदस्यअपने निकटमत सदस्य के साथ ही कुछ संचार कर सकता हे । इस तरह केनेटवर्क में सूचना ऊपरी तथा निचली किसी भी दिशा में प्रवाहित हो सकती है।

3. वृत्त नेटवर्क – इस तरह के नेटवर्क में समूह का कोई सदस्यकेन्द्रित स्थिति में नहीं होता तथा संचार सभी दशाओं में प्रवाहित होता है।

4. वाई नेटवर्क – वाई नेटवर्क एक केन्द्रित नेटवर्क होता है जिसमेंव्यक्ति ऐसा होता है जो अन्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होता है।

5. कमकन नेटवर्क – कमकन नेटवर्क एक तरह का खुला संचारहोता है जसमें समूह का प्रत्येक सदस्य दूसरे सदस्य से सीधे संचार स्थापित करसकता है ।

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