अंग्रेज-सिक्ख युद्ध-Anglo-Sikh War

27 जून 1839 ई. में पक्षाघात के कारण महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। उसके बाद उनका पुत्र खड़ग सिंह गद्दी पर बैठा। वह एक अयोग्य शासक था। अतः उसे शीघ्र ही गद्दी उतार दिया गया।

रणजीत सिंह के बाद का समय 1839 ई. से 1845 ई. तक पंजाब के लिए घोर अराजकता का समय था। इन 6 वर्षों में 4 शासक खड़ग सिंह, नौनिहाल सिंह, शेर सिंह व दलीप सिंह क्रमशः शासक बने। सेना का हस्तक्षेप प्रशासन में बढ़ने लगा।

 

इधर अंग्रेज पंजाब की उपजाऊ भूमि पर अधिकार करना चाहते थे। इस अराजकता के चलते उन्हें पंजाब की आन्तरिक परिस्थितियों में हस्तक्षेप करने का कारण मिला। जिससे आंग्ल-सिक्ख युद्ध की नींव पड़ी।

प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध

1844 ई. में लार्ड एलनबरो की जगह “लार्ड हार्डिंग” गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। उसने तुरन्त सिक्खों का सामना करने के लिए सेना को सुदृढ़ करना प्रारम्भ कर दिया। इसका कारण पंजाब में राजनैतिक अस्थिरता को लेकर रक्षणात्मक तैयारियां बताया।

जब सिक्खों ने यह देखा तो उन्होंने 11 दिसम्बर 1845 ई. में हरिके और कसूर के बीच सतलुज नदी को पार किया और सर ह्वूगफ के अधीन अंग्रेज सेना से टक्कर ली।

13 दिसम्बर 1845 ई. में लार्ड हार्डिंग ने युद्ध की घोषणा कर दी। सिक्ख सेना के प्रधान सेनापति लालसिंह ने विश्वासघात किया। जिसके कारण सिक्खों की पराजय हुई।

इस युद्ध के अन्तर्गत पाँच लड़ाइयां लड़ी गयी। जिसमें चार लड़ाइयां मुदकी, फीरोजशाह, बद्दोवाल व आलीवाल की लड़ाइयां अनिर्णायक रहीं।

पांचवी अर्थात सबराओं की लड़ाई (10 फरवरी 1846 ई.) निर्णायक सिद्ध हुई। लालसिंह और तेजासिंह के विश्वासघात के कारण सिक्ख सेना पूर्णतया पराजित हो गई। सिक्खों को भारी क्षति हुई। अंग्रेज सेना ने लाहौर पर अधिकार कर लिया

लाहौर की सन्धि कब हुई?

लाहौर पर अधिकार करने के बाद “9 मार्च 1846 ई. में अंग्रेजों तथा सिक्खों के बीच “लाहौर की सन्धि” हुई। एक तरह से अंग्रेजों ने सिक्खों को इस सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इस सन्धि की शर्तें निम्नलिखित थीं।

1-सतलुज नदी के दक्षिण के ओर के सभी प्रदेशों पर अंग्रेजों का अधिकार होगा।

2-सतलुज तथा व्यास नदियों के बीच स्थित सभी दुर्गों पर कम्पनी का अधिकार होगा।

3-सिक्खों को डेढ़ करोड़ रुपया युद्ध दण्ड के रूप में देना होगा। दरबार के पास इतना पैसा था नहीं। अतएव अंग्रेजों ने व्यास से सिन्ध नदियों के बीच का पर्वतीय क्षेत्र एक करोड़ रुपये में गुलाबसिंह को बेंच दिया। शेष 50 लाख रुपया सिक्ख राजकोष से प्राप्त किया।

4-सिक्ख सेना में कमी कर दी गयी। अब वह केवल 20 हजार पैदल व 12 हजार घुड़सवार रख सकते थे।

5-दलीप सिंह को महाराजा स्वीकार कर लिया गया। लालसिंह को उसका वजीर तथा राजमाता जिन्दा की संरक्षिका मान लिया गया।

6-अंग्रेजी सेना को निर्विरोध पंजाब में आने जाने का अधिकार मिल गया।

7-दलीप सिंह की रक्षा हेतु एक वर्ष के लिए लाहौर में अंग्रेज सेना के रहने का प्रबन्ध किया गया। इस सेना का खर्च खालसा दरबार पर डाल दिया गया।

8-सर हेनरी लारेंस को लाहौर में कम्पनी का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया।

भैरोवाल की सन्धि कब हुई?

लाहौर की सन्धि से हार्डिंग ने पंजाब के आर्थिक साधनों को नष्ट कर दिया और यह सन्धि भी अस्थायी सिद्ध हुई। इस सन्धि के अनुसार अंग्रेज सेना को एक वर्ष के बाद वापस जाना था किन्तु हार्डिंग ने स्पष्ट कहा कि महाराज दलीप सिंह के वयस्क होने तक सेना का वहां रुकना अनिवार्य है।

अतः 22 दिसम्बर 1846 ई. भैरोवाल की सन्धि हुई। जिसके अनुसार दलीप सिंह के संरक्षण हेतु अंग्रेजी सेना का प्रवास पंजाब में मान लिया गया। महरानी जिन्दा को डेढ़ लाख रुपया वार्षिक पेन्शन देकर शेखपुरा (बनारस) भेज दिया गया।

प्रशासन चलाने के लिए आठ सिक्ख सरदारों की एक समिति गठित की गई। जिसका अध्यक्ष हेनरी लारेंस को बनाया गया।

द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध

1848 ई. में लार्ड डलहौजी गवर्नर जनरल बनकर आया। डलहौजी साम्राज्यवादी था तथा नये प्रदेश प्राप्त करने का कोई अवसर खोना नहीं चाहता था। इसने महारानी जिन्दा की वार्षिक पेन्शन को हटाकर 48 हजार रुपये वार्षिक कर दिया।

इधर पंजाब में पंजाब प्रशासन समिति के अध्यक्ष हेनरी लांरेन्स ने बड़ी संख्या में सिक्ख सेना को भंग करना प्रारम्भ कर दिया।

उक्त कारणों के अलावा द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध का प्रमुख एवं तात्कालिक कारण मुल्तान का विद्रोह था।

लाहौर दरबार की ओर से मुल्तान के गवर्नर मूलराज ने लाहौर में उपस्थित अंग्रेज रेजीडेंट नीतियों से तंग आकर त्यागपत्र दे दिया। तब ब्रिटिश रेजीडेंट ने काहन सिंह को लाहौर दरबार की ओर से मुल्तान का नया गवर्नर नियुक्त किया और उसकी सहायता के लिए दो अंग्रेज अधिकारियों को उसके साथ भेजा। इन अंग्रेज अधिकारियों ने वहाँ उद्दण्डता की।

अतः मुल्तान के लोगों ने विद्रोह कर दिया। शीघ्र ही यह विद्रोह पूरे पंजाब में फैल गया। इसी विद्रोह ने द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध का रूप धारण कर लिया।

अक्टूबर 1848 ई. में डलहौजी से सिक्ख शक्ति को पूर्णतया दबाने का निश्चय किया। उसने लार्ड गॉफ के नेतृत्व में सिक्खों के विरुद्ध एक सेना भेजी। इस सेना ने रावी नदी के तट पर 22 नवम्बर 1848 ई. सिक्खों से टक्कर ली। इस युद्ध में हार जीत का निर्णय नहीं हुआ।

इसके बाद 13 जनवरी 1849 ई. में झेलम नदी के तट पर “चिलियाँवाला का युद्ध” हुआ। यह युद्ध भी अनिर्णायक रहा। किन्तु इसमें अंग्रेजों को बहुत क्षति पहुंची।

चिलियाँवाला के युद्ध के बाद अंग्रेज सेना का नेतृत्व लार्ड गॉफ के स्थान पर “चार्ल्स नेपियर” को दिया गया।

उसने 21 फरवरी 1849 ई. में  चिनाब नदी के तट पर “तोपों से युद्ध” किया। इस युद्ध में सिक्ख सेना पूर्ण रूप से परास्त हुई।

समस्त पंजाब अंग्रेजों के आधीन हो गया। 29 मार्च 1849 ई. में डलहौजी ने सम्पूर्ण पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर लिया। दलीप सिंह को शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया।

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