तारों का जीवन चक्र-life cycle of stars

किसी तारे का जीवन आकाशगंगा की तीसरी भुजा में हाइड्रोजन एवं हीलियम के बादलों के बनने से  शुरू होता हैं। इन मेघों को stellar nebula कहते हैं।

आदि तारा (PROTOSTAR)

जब आकाशगंगा मे हाइड्रोजन का बादल काफी बड़ा हो जाता हैं। तो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में गैस पिण्ड सिकुड़ने लगता हैं। तारे की इस अवस्था को प्रोटोस्टार या आदि तारा कहते है। इसका केन्द्र सघन होता है इसलिए इसे भ्रूण तारा (Embryo star) भी कहते हैं।

 

तारा (STAR)

प्रोटो स्टार के सिकुड़ने पर गैस के परमाणुओं की परस्पर टक्करों की संख्या बढ़ जाती हैं। जिससे आंतरिक ताप बढ़ जाता है। परिणाम स्वरूप हाइड्रोजन से हीलियम नाभिक बनने लगते हैं। इससे अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा विकरण के रूप में मुक्त होती हैं। जिसके कारण इसके अन्दर का ताप दाब बढ़ जाता हैं। यह अवस्था तारा (स्टार) कहलाती है।

इस प्रकार तारे के अंदर दो बल कार्य करते हैं। एक गुरुत्वाकर्षण बल जिसके कारण संपीडन उत्पन्न होता है। दूसरा बल संयलन अभिक्रिया द्वारा मुक्त ऊर्जा के कारण उत्पन्न आंतरिक दबाव के कारण होता हैं। जो संपीडन का विरोध करता है। ये दोनों बल अरबों वर्षों तक संतुलन मे बने रहते हैं। यदि द्वितीय बल उत्पन्न न हो तो तारा अपने विशाल गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उत्पत्ति के 30 मिनट के अन्दर सिकुड़ जाये गा। तारे के केन्द्र में हाइड्रोजन 70%, हीलियम 28%, कार्बन,नाइट्रोजन तथा निऑन 1.5%, लौह वर्ग के तत्व .5% होते हैं।

ब्रह्माण्ड का स्वरूप

लाल दानव तारा (RED GIANT)

जैसे जैसे तारे के केन्द्र मे नाभिकीय संलयन अभिक्रियाएं होती जाती हैं, उसका हाइड्रोजन हीलियम मे परिवर्तित होता जाता हैं। इस तरह तारे के केन्द्र मे हाइड्रोजन कम होती जाती हैं। और हीलियम की मात्रा बढ़ती जाती हैं। अतः कुछ समय पश्चात नाभिकीय संलयन की क्रिया रुक जाती है। जिससे क्रोड [तारे के केन्द्र को core या क्रोड कहते है।)] का दबाव कम हो जाता है। और तारा सिकुड़ने लगता है। अब तारा अपने बाह्म कवच में उपस्थित हाइड्रोजन का उपयोग करता है। किन्तु उसके ऊर्जा विकिरण की तीव्रता कम होती हैं। अतः तारा लाल रंग का दिखाई देता है। इस अवस्था में तारे को लाल दानव तारा कहते हैं।

तारों के जीवन चक्र में चंद्रशेखर सीमा

1.44 सौर्यिक द्रव्यमान की वह सीमा , जिसके अन्तर्गत तारें लाल दानव तारा(red giant) से श्वेत वामन(white dwarf) और अन्त मे कृष्ण वामन(Black dwarf) बनते हैं। तथा इस सौर्यिक द्रव्यमान से अधिक द्रव्यमान के तारे red giant से न्यूट्रॉन स्टार या ब्लैक होल बनते हैं।, 1.44 सौर्यिक द्रव्यमान की इस सीमा को चंद्रशेखर सीमा कहते है। हमारे सूर्य का सौर्यिक द्रव्यमान 1.44 के लगभग है। अतः हमारा सूर्य ब्लैक ड्वार्फ में बदलेगा। स्पष्ट है कि वो सभी तारें जिनका द्रव्यमान सूर्य के बराबर या सूर्य से कम हैं। ब्लैक ड्वार्फ बनेंगें तथा जिनका द्रव्यमान सूर्य से अधिक हैं। न्यूट्रॉन स्टार या ब्लैक होल बनाये गें।

श्वेत वामन तारा (WHITE DWARF)

जब लाल दानव या रेड जायंट का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के बराबर या कम होता हैं। तो उसका बाह्म कवच प्रसारित होकर लुप्त हो जाता है। बचा हुआ core संकुचित हो कर अत्यधिक घनत्व के गोले मे बदल जाता है। संकुचन के कारण इसका ताप इतना बढ़ जाता है। कि हीलियम परमाणुओं मे नाभिकीय संलयन होने लगता हैं। और हीलियम परमाणु संलयित होकर कार्बन जैसे तत्वों मे परवर्तित होने लगते हैं। जिससे ऊर्जा मुक्त होती है। किंतु कम मात्रा में। इस मुक्त ऊर्जा के कारण core एक श्वेत वामन की तरह दीप्त हो जाता है। श्वेत वामन तारे का व्यास सूर्य के व्यास का 1% होता है। White Dwarf  को जीवाश्म तारा(Fossil Star) भी कहते हैं। White dwarf की संरचना का पता सर्वप्रथम R H फाउबर ने लगाया था।

BLACK DWARF

जब white dwarf के core का हीलियम धीरे धीरे समाप्त हो जाता हैं। तो ऊर्जा एवं प्रकाश का उत्सर्जन नही करता और शीतल हो कर black dwarf बन जाता हैं।

सुपरनोवा तारा (SUPERNOVA)

ऐसे तारें जिनका द्रव्यमान सूर्य से अधिक या कई गुना अधिक है और जो रेड जायंट अवस्था मे पहुँच जाते हैं। उनका core अत्यधिक गुरुत्व के कारण सिकुड़ता जाता हैं। जिससे कोर का तापमान बहुत अधिक हो जाता है। अतः कोर की हीलियम कार्बन मे परिवर्तित हो जाती हैं। कार्बन भारी तत्वों जैसे लोहे मे परिवर्तित हो जाता हैं। जिसके फलस्वरूप केन्द्र मे नाभिकीय संलयन की क्रिया रुक जाती हैं। इस कारण तारे की मध्यवर्ती परत अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव मे केन्द्र मे ध्वस्त(Collapse) हो जाती है। इससे मुक्त हुई ऊर्जा तारे की ऊपरी परत को नष्ट कर देती है। इसे ही सुपरनोवा विस्फोट कहा जाता है। सुपरनोवा विस्फोट के बाद सुपरनोवा से shock waves तथा गैसों के मेघ निकलते हैं। इन गैसीय बादलों से तारों की नयी पीढ़ी का जन्म होता हैं।

न्यूट्रॉन तारा (NEUTRON STAR)

जब कोई विशाल तारा, जिसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तीन गुने से कम होता है। सुपरनोवा विस्फोट के पश्चात् न्यूट्रॉन तारा बनता है। वास्तव में यह विशाल तारे का केन्द्र होता है जो गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सिकुड़ कर अत्यधिक घनत्व और कुछ मील व्यास का हो जाता है। यह अपने अक्ष पर 1 सेकेण्ड मे 30 बार घूर्णन करता है। तथा तीव्र रेडियो तरंगें उत्सर्जित करता है। रेडियो तरंगों का संकेन्द्रण चुम्बकीय ध्रुवों पर सर्वाधिक होता हैं। इस तारे का पता सर्वप्रथम मिस जोकलिन बेल ने लगाया था। कुछ वैज्ञानिकों ने इसे पुल्सर की संज्ञा दी है।

भूकम्प के कारण

BLACK HOLE

जिन तारों का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तीन गुने से अधिक होता हैं,वे तारे विघटित होकर ब्लैक होल बन जाते हैं। दूसरे शब्दों मे विशाल तारें जो संकुचित होकर अदृश्य हो जाते हैं। ब्लैक होल कहलाते हैं। इनकी गुरुत्वीय शक्ति इतनी होती हैं। कि इनसे प्रकाश भी पलायन नहीं कर सकता है। ब्लैक होल की खोज एस. चंद्रशेखर ने की थी।

STELLA STAR

स्पिट्जर अन्तरिक्ष टेलीस्कोप की सहायता से पृथ्वी से 5400 प्रकाश वर्ष दूर, अन्तरिक्ष मे खगोलीय धूल कणों के घने काले बादलों के बीच उत्पत्ति की अवस्था मे विद्यमान लाखों तारों का पता लगाया गया हैं। ये तारों को स्टेला स्टार्स कहा जाता हैं। ये स्टेला स्टार्स ट्रिफिड नेबुला मे स्थित हैं। पृथ्वी से इन स्टेला स्टार्स की दूरी लगभग 6 अरब km हैं।

 

SOME IMPORTANT

1-सूर्य एक पीला तारा है।

2-जब तारे के केन्द्र मे हाइड्रोजन समाप्त हो जाती हैं।तो वह red giant बन जाता है।

3-आदि तारा का तापमान -173℃ होता है।

4-किसी तारे मे नाभिकीय संलयन की क्रिया के फलस्वरूप अन्तिम उत्पाद आयरन बनता है।

5-अत्यधिक चमकीले तारे का जीवनकाल कम होता है।

6-तारों के सापेक्ष सूर्य की गति पूर्व दिशा में होती हैं।

7-ब्रह्माण्ड मे लगभग 10 टु पावर 22 तारें पाये जाते हैं।

8-जब किसी तारे का प्रकाश सूर्य के पास से गुजरता है। तो दोनों तारों के प्रकाश के मार्ग मे विचलन हो जाता हैं।

9-खुली आँख से आकाश मे 20000 तारों को देखा जा सकता हैं।

10-पैरेलेक्स विधि~

इस विधि का उपयोग तारों की दूरी मापने के लिए किया जाता हैं। इस विधि मे पृथ्वी के परिक्रमा पथ पर, पृथ्वी की दो विपरीत स्थतियों पर तारे की स्थिति में होने वाला परिवर्तन माप लेते हैं। इससे पृथ्वी की दोनों स्थितियों तथा तारे की स्थिति के बीच बने हुए त्रिभुज का कोण ज्ञात किया जाता है। इन कोणों के आधार पर तारे की दूरी निकली जा सकती हैं।

11-ज्योतिर्मयता(Luminosity)

इस विधि द्वारा भी तारों की दूरी निकली जाती हैं। इससे ऐसे तारों की दूरी निकली जाती हैं। जिनकी दूरी पैरेलेक्स विधि से ज्ञात नहीं की जा सकती।

चट्टानों के प्रकार

12-PULSATING STAR(स्पंदन तारा)

वे तारें जो कभी फैल जाते हैं और कभी सिकुड़ जाते हैं और जिनमें ये क्रिया निरन्तर होती रहती हैं उन्हें स्पंदन तारा कहते हैं।

13-VEGA STAR

यह पहला ऐसा तारा है जिसका 1850 मे फोटोग्राफ तथा 1872 मे स्पेक्ट्रम लिया गया था।

14-एरोबी(Areobee) वायुमण्डल मे कॉस्मिक किरणों का अध्ययन करने वाला अनुसंधान रॉकेट है।

15-तारे मे सुपरनोवा विस्फोट गुरुत्वाकर्षण के कारण मध्यवर्ती परत के केन्द्र म ध्वस्त हो जाने के कारण होता है।

16-पारसेक दूरी मापने की सबसे बड़ी इकाई है। एक पारसेक बराबर 3.25 प्रकाशवर्ष होता हैं।

17-किसी तारे का रंग उसके तापमान पर निर्भर करता है।

18-ओपेन हाइमर बल्काफ सीमा-वह सीमा जिसमें तारे का 3.2Ms से अधिक होने पर तारे की सिकुड़न नही रुकती है और तारा ब्लैक होल बन जाता है।