उत्तर कालीन मुगल सम्राट

औरंगजेब के बाद के सभी मुगल शासक उत्तर कालीन मुगल सम्राट माने जाते हैं। 3 मार्च 1707 को अहमदनगर में औरंगजेब की मृत्यु के साथ उसके पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध शुरू होता है।

औरंगजेब की मृत्यु का समाचार सुनकर सर्वप्रथम मुहम्मद आजम (जो गुजरात का सूबेदार था) अहमदनगर पहुँचता है और औरंगजेब के अन्तिम संस्कार के बाद अपने आप को 14 मार्च 1707 को बादशाह घोषित कर लेता है। मुहम्मद आजम को औरंगजेब के बजीर असद खां का समर्थन प्राप्त था।

 

औरंगजेब का ज्येष्ठ पुत्र मुअज्जम जिसे शाह आलम नाम से भी जाना जाता है, औरंगजेब की मृत्यु का समाचार सुनकर पेशावर से आगरा की ओर प्रस्थान किया।

मुअज्जम ने पुल-ए-शाहदौला पहुँच कर स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। 18 जून 1707 को मुअज्जम तथा मुहम्मद आजम के बीच सामूगढ़ के समीप जजाओं नामक स्थान पर युद्ध हुआ। जिसमें मुहम्मद आजम मारा गया।

इसके बाद मुअज्जम को औरंगजेब के एक ओर पुत्र कामबख्श से हैदराबाद के समीप 13 जनवरी 1707 को युद्ध करना पड़ा। इस युद्ध में कामबख्श मारा गया।

इस प्रकार मुअज्जम 63 वर्ष की अवस्था में “बहादुरशाह प्रथम” की उपाधि लेकर दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। बहादुरशाह को “शाहे बेखबर” भी कहा जाता है।

27 फरवरी 1712 को बहादुरशाह की मृत्यु के पश्चात उसके चार पुत्रों  जहाँदार शाह, अजीम-उस-शान, रफी-उस-शान और जहानशाह में उत्तराधिकार का नया युद्ध प्रारम्भ हो गया।

उत्तराधिकार के लिए उसके पुत्रों ने इतनी निर्लज्ज शीघ्रता की कि बहादुरशाह का शव एक मास तक दफन नहीं किया जा सका।

ईरानी दल के नेता जुल्फिकार खां की सहायता से जहाँदार शाह इस युद्ध में विजयी हुआ। अन्य तीनों प्रतिद्वन्द्वी मारे गए।

29 मार्च 1712 को जहाँदार शाह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। सिंहासन पर बैठने के दस महीने के अन्दर ही जहाँदार शाह को अजीम-उस-शान के पुत्र फर्रुखसीयर ने सैयद बन्धुओं की सहायता से चुनौती दी और 10 जनवरी 1713 उसेको हराकर मार डाला।

11 फरवरी 1713 को फर्रुखसीयर मुगल सिंहासन पर बैठा। कृतज्ञ सम्राट ने सैयद बन्धुओं में बड़े भाई अब्दुल्ला खां को बजीर तथा छोटे भाई अली हुसैन को मीर बख्स नियुक्त किया। परन्तु शीघ्र ही उसने सैयद बन्दुओं को हटाने के लिए उनके खिलाप षड्यंत्र रचा।

सैयद बन्धु सम्राट से अधिक चालक निकले और उन्होंने मराठा सैनिकों की सहायता से 28 फरवरी 1719 को फर्रुखसीयर की गला दबाकर हत्या कर दी।

फर्रुखसीयर की मृत्यु के पश्चात सैयद बन्दुओं ने शीघ्रातिशीघ्र एक के पश्चात एक सम्राट दिल्ली के सिंहासन पर बैठाये।

रफी-उद-दरजात 28 फरवरी से 4 जून 1719,

रफी-उद-दौला 6 जून से 17 सितम्बर 1719

मुहम्मद शाह सितम्बर 1719 से अप्रैल 1748 तक।

मुहम्मद शाह के शासनकाल में ही नादिरशाह ने 1739 में दिल्ली पर आक्रमण किया था। इस आक्रमण से मुगल साम्राज्य का खोखलापन सबके सामने आ गया।

मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद अहमद शाह (1748 से 1754) इसके बाद आलमगीर द्वितीय 1754 से 1759 सम्राट बने। ये इतने निर्बल थे कि मुगल साम्राज्य के पतन को रोक नहीं पाये।

आलमगीर द्वितीय के बाद उसका पुत्र शाह आलम द्वितीय और उसके उत्तराधिकारी केवल नाममात्र के ही सम्राट थे। वास्तव में ये अपने अमीरों, मराठों अथवा अंग्रेजों के हाथ की कठपुतलियां थे।

1803 ई. में अंग्रेजों ने दिल्ली जीत ली। किन्तु उन्होंने मुगल साम्राज्य का ढोंग 1858 तक बनाये रखा। 1858 में मुगल साम्राज्य का अंग्रेजों ने पूर्णतया पतन कर दिया जब अन्तिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर को रंगून निर्वासित कर दिया।