वसा के स्रोत एवं प्रभाव-Sources and Effects of Fats

वसा शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाला आहार का मुख्य अवयव है। जिसे मनुष्य अपनी ऊर्जा पूर्ति हेतु भिन्न-भिन्न आहारों के साथ ग्रहण करता है। विभिन्न आहारों में वसा की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है।

वसा के प्रमुख स्रोत

आहार का भार                   वसा की मात्रा

(100 gm)                         (gm में)

घी                                    100

मक्खन                              81

वनस्पति तेल                      100

वनस्पति घी                        100

बादाम                               58.9

काजू                                 46.9

नारियल (ताजा)                  41.6

नारियल (सूखा)                   65

तिल के बीज                       43.3

मूंगफली                             40.1

पिस्ता                                53.5

अखरोट                              64.5

सोयाबीन                            20

खोया (भैंस के दूध का)          31.2

खोया (गाय के दूध का)          15.2

अण्डा (मुर्गी का)                   13.3

मछली                                 3.2

भैंस का दूध                             8.8

गाय का दूध                             3.6

आहार में वसा की कमी से शरीर पर प्रभाव

प्रौढ़ तथा बालकों में वसा की कमी से त्वचा टोड के समान हो जाती है। इस रोग को Phrynodema कहते हैं। इसके उपचार हेतु आहार में कॉड लिवर ऑयल का सेवन अधिक मात्रा करना चाहिए।

आवश्यक वसीय अम्लों की कमी से बालकों एवं युवकों की वृद्धि रुक जाती है। शरीर की कोशिकाओं में जिस प्रकार प्रोटीन उपस्थिति आवश्यक होती है उसी प्रकार वसा की उपस्थिति भी आवश्यक होती है।

 

वसा की कमी से बच्चों की त्वचा सूखकर खुरदरी हो जाती है, उसमें दरारें पड़ जाती हैं। त्वचा को साधारण स्थिति में लाने के लिए लिनोनीक नामक आवश्यक वसीय अम्ल को आहार में अधिक मात्रा में लेना चाहिए।

आहार में वसा की अधिकता से शरीर पर प्रभाव

आहार में अधिक मात्रा में वसा ग्रहण करने से शरीर पर कई दुष्प्रभाव पड़ते हैं। अधिक मात्रा में लिया गया वसा शरीर की त्वचा, हृदय व अन्य स्थानों पर पर्तों के रूप में जमा हो जाता है। जिससे शरीर कई बीमारियों से ग्रसित हो जाता है।

मधुमेह– अधिक वसा के सेवन से मधुमेह रोग हो सकता है। वे व्यक्ति जो अपने आहार में तले हुए तथा अधिक वसा युक्त भोजन ग्रहण करते हैं, मधुमेह के शिकार होने की सम्भावना अधिक होती है।

हृदय सम्बन्धी विकार– शरीर में वसा की मात्रा अधिक होने पर कई प्रकार के विकार उत्पन्न हो सकते हैं।

वृक्क पर प्रभाव– वृक्क का कार्य शरीर से अनावश्यक विषैले पदार्थों को बाहर निकालना है। शरीर में वसा की मात्रा अधिक होने के कारण वृक्क अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाते, जिससे शरीर से दूषित पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते और वह अपना विषैला प्रभाव शरीर के अंगों पर डालते हैं।

वसा के दुष्प्रभाव से बचने के उपाय

आहार में वसा की मात्रा कम करनी चाहिए। आहार में वसा उतनी ही मात्रा में लेनी चाहिए जितनी कि आवश्यक हो।

वनस्पति घी अथवा शुद्ध घी के स्थान पर उचित मात्रा में तेल का सेवन करना चाहिए। घी में संतृप्त वसीय अम्ल अधिक होते हैं, जो शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को बढ़ा देते हैं।

भोजन में मांस, मछली, अण्डे तथा दूध का सेवन करते समय यदि सम्भव हो तो उसमें उपस्थित वसा को हटा देना चाहिए।

व्यक्ति को अपने आहार में फल एवं फलों के रस का अधिक सेवन करना चाहिए। क्योंकि इनसे प्राप्त होने वाला अम्ल वसा को नष्ट करता है।

पूरे दिन में केवल तीन बार आहार लेना चाहिए, बीच-बीच में ग्रहण किये गये भोज्य-पदार्थ भी शरीर में वसा की मात्रा बढ़ाते हैं।

प्रोटीन्स के कार्य

भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा को भी कम रखना चाहिए। कार्बोहाइड्रेट की अधिकता से ग्लूकोज त्वचा के नीचे एडिपोज टिशू के रूप में जमा हो जाता है।

आहार में प्रोटीन युक्त भोज्य-पदार्थ का अधिक सेवन करना चाहिए।

व्यक्ति को प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए ताकि शरीर से वसा की मात्रा कम होती रहे।