विकास का तात्पर्य, सिद्धान्त और प्रभावित करने वाले कारक-Meaning, Principles and Influencing Factors of Development

विकास का तात्पर्य व्यक्ति में नई-नई विशेषताओं एवं क्षमताओं का विकसित होना है जो प्रारम्भिक जीवन से आरम्भ होकर परिपक्वतावस्था तक चलती है।

 

हरलॉक के शब्दों में “विकास अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है। इसके बजाय इसमें प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन योग्यताएँ प्रकट होती हैं।” हरलॉक की इस परिभाषा से तीन बातें स्पष्ट होती हैं-

1-विकास परिवर्तन की ओर संकेत करता है।

2- विकास में एक निश्चित क्रम होता है।

3-विकास की एक निश्चित दिशा एवं लक्ष्य होता है।

हरलॉक के कथनानुसार विकास की प्रक्रिया जीवनपर्यन्त एक क्रम से चलती रहती है तथा प्रत्येक अवस्था का प्रभाव विकास की दूसरी अवस्था पर पड़ता है।

विकास क्रम में होने वाले परिवर्तन

आकार परिवर्तन

जन्म के बाद जैसे-जैसे बालक की आयु बढ़ती जाती है, उसके शरीर में परिवर्तन होता जाता है। शरीर के ये परिवर्तन- बाह्य एवं आन्तरिक दोनों अवयवों में होते हैं। शरीर की लम्बाई , चौड़ाई एवं भार में वृद्धि होती है। आन्तरिक अँग जैसे हृदय, मस्तिष्क, उदर, फेफड़ा आदि का आकार भी बढ़ता है। शारीरिक परिवर्तनों के साथ-साथ मानसिक परिवर्तन होते हैं।

अंगों-प्रत्यंगों के अनुपात में परिवर्तन

बालक एवं वयस्क के अंगों-प्रत्यँगों में अन्तर होता है। बाल्यावस्था में हाथ-पैर की अपेक्षा सिर बड़ा होता है, किन्तु किशोरावस्था में आने पर यह अनुपात वयस्कों के समान होता है। इसी प्रकार का अन्तर मानसिक विकास में भी देखने को मिलता है।

कुछ चिह्नों का लोप

विकास के साथ ही थाइमस ग्रन्थि, दूध के दाँत आदि का लोप हो जाता है। इसके साथ ही वह बाल क्रियाओं एवं क्रीड़ाओं को भी त्याग देता है।

नवीन चिह्नों का उदय

आयु में वृद्धि के साथ-साथ बालक में अनेक नवीन शारीरिक एवं मानसिक चिह्न प्रकट होते रहते हैं- उदाहरण के लिए , स्थायी दाँतों का उगना। इसके साथ ही लैंगिक चेतना का भी विकास होता है। किशोरावस्था में मुँह एवं गुप्ताँगों पर बाल उगने प्रारम्भ हो जाते हैं।

विकास के सिद्धान्त

विकास की दिशा का सिद्धान्त

इसके अनुसार शिशु के शरीर का विकास सिर से पैर की दिशा में होता है। मनोवैज्ञानिकों ने इस विकास को ‘मस्तकाधोमुखी’ या ‘शिरः पुच्छीय दिशा’ कहा है।

निरन्तर विकास का सिद्धान्त

स्किनर के अनुसार विकास प्रक्रियाओं की निरन्तरता का सिद्धान्त केवल इस तथ्य पर बल देता है कि व्यक्ति में कोई आकस्मिक परिवर्तन नहीं होता है। विकास एक समान गति से नहीं होता है। विकास की गति कभी तेज कभी धीमी रहती है।

विकास की गति में व्यक्तिगत भिन्नता का सिद्धान्त

वैज्ञानिक अध्ययनों से यह निश्चित हो गया है कि विभिन्न व्यक्तियों के विकास की गति भिन्न-भिन्न होती है। एक ही आयु में दो बालकों में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास में वैयक्तिक विभिन्नताएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।

विकास क्रम का सिद्धान्त

विकास एक निश्चित एवं व्यवस्थित क्रम में होता है। उदाहरणार्थ बालक का भाषा एवं गामक सम्बन्धी विकास एक क्रम में होता है।

परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त

बालक के शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक पक्ष के विकास में परस्पर सम्बन्ध होता है। शारीरिक विकास बौद्धिक विकास को प्रभावित करता है। गैरीसन तथा अन्य के अनुसार “शरीर सम्बन्धी दृष्टिकोण व्यक्ति के विभिन्न अंगों के विकास में सामंजस्य और परस्पर सम्बन्ध पर बल देता है।”

विकास को प्रभावित करने वाले कारक

मानव विकास तथा व्यवहार का अध्ययन करने के लिए विशेष रूप से दो प्रमुख कारकों पर ध्यान दिया जाता है। प्रथम, जन्मजात या प्रकृतिदत्त प्रभाव तथा दूसरा, जन्म के उपरान्त प्रभावित करने वाले बाह्य कारक। व्यक्तित्व में भिन्नता प्रकृतिजन्य कारकों तथा पर्यावरण का पोषण सम्बन्धी कारणों से होती है।

जन्म से सम्बन्धित बातों को वंशानुक्रम एवं समाज से सम्बन्धित बातों को वातावरण कहते हैं। इसे प्रकृति तथा पोषण भी कहा जाता है। वुडवर्थ का कथन है कि एक पौधे का वंशक्रम उसके बीज में निहित है और उसके पोषण का दायित्व उसके वातावरण पर है। इस प्रकार विकास को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं-

वंशानुक्रम

वैज्ञानिक रूप में वंशानुक्रम एक जैवकीय प्रक्रिया है। जीव विज्ञान के नियमों के अनुसार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को कुछ गुण हस्तान्तरित किए जाते हैं। पूर्वजों के इन हस्तान्तरित किए गए शारीरिक और मानसिक लक्षणों के मिश्रित रूप को ही वंशानुक्रम, वंश परम्परा, पैतृकता, आनुवांशिकता आदि कहा जाता है ।

अतः स्पष्ट है कि वंशानुक्रम माता-पिता एवं अन्य पूर्वजों से सन्तान को प्राप्त होने वाला गुण है जिसमें शारीरिक, मानसिक एवं व्यवहारिक गुण सम्मिलित होते हैं।बालक के व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू पर वंशानुक्रम का प्रभाव पड़ता है। जैसे-

★मूल शक्तियों पर प्रभाव- बालक की मूल शक्तियों का प्रधान कारण उसका वंशानुक्रम है।

★शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव- कॉल पियरसन के अनुसार, माता-पिता की लम्बाई कम या अधिक होने पर उनके बच्चों के लम्बाई भी कम या अधिक होती है।

वातावरण

बालक के शारीरिक विकास में उसको मिलने वाले वातावरण का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। वायु, धूप तथा स्वच्छता वातावरण के तीन मुख्य तत्व हैं। यह तत्व शारीरिक विकास को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रूप में प्रभावित करता है।

भोजन

पौष्टिक तथा सन्तुलित भोजन बालक के शारीरिक विकास की स्वाभाविक ढंग से होने में विशेष रूप से सहायता करता है। पौष्टिक तथा सन्तुलित भोजन मिलने पर बालक का शारीरिक स्वास्थ्य उत्तम होता है।

पारिवारिक स्थिति

परिवार की सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक स्थिति का भी बालक के शारीरिक विकास पर प्रभाव पड़ता है। परिवार के रहन-सहन, सामाजिक परम्पराओं तथा खान-पान के अनुरूप ही बालक का विकास होता है।

दिनचर्या

बालक की दिनचर्या का उसके विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता है। नियमित दिनचर्या अच्छे स्वास्थ्य की आधारशिला होती है। खाने-नहाने, खेलने, सोने आदि दैनिक कार्यों को नियमित समय पर करने से बालक का स्वस्थ विकास होता है।

विश्राम तथा निद्रा

शरीर के स्वस्थ विकास के लिए विश्राम तथा निद्रा आवश्यक है। थकान शारीरिक विकास में बाधा उत्पन्न करती है। विश्राम तथा निद्रा थकान को दूर करके बालक के शरीर को विकसित होने के अनुकूल अवसर प्रदान करते हैं। बाल्यावस्था में लगभग दस घण्टे व किशोरावस्था में लगभग आठ घण्टे की निद्रा पर्याप्त होती है।

खेल तथा व्यायाम

शारीरिक विकास पर खेल तथा व्यायाम का बहुत प्रभाव होता है, इसलिए बालकों के खेल तथा व्यायाम पर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। छोटा शिशु अपने हाथों व पैरों को चला कर व्यायाम कर लेता है। परन्तु बालकों तथा किशोरों के लिए खुली हवा में खेलने तथा व्यायाम करने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

अन्य कारक

रोगों के कारण शरीर में उत्पन्न विकृतियाँ।

दुर्घटना के कारण शारीरिक अंगों की हानि अथवा कार्यक्षमता में कमी।

भौगोलिक परिस्थितियाँ।

गर्भावस्था में की गई असावधानियाँ।