बंगाल के गवर्नर जनरल-Governor General of Bengal

ब्रिटिश सरकार ने कम्पनी पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु रेग्यूलेटिंग एक्ट-1773 पारित किया। जिसमें बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बनाने का प्रावधान किया गया।

वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल बनाया गया। 1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्स नियुक्ति बंगाल के गवर्नर के रूप में हुई थी। परन्तु 1773 ई. में रेग्यूलेटिंग एक्ट आने के बाद उसे बंगाल गवर्नर जनरल बना दिया गया।

बंगाल के गवर्नर जनरल और उनका कार्यकाल

  • वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings)-1773-85 ई.
  • सर जॉन मैक्फर्सन (Sir John Macpherson)-1785-86 ई.
  • लॉर्ड कार्नवालिस (lord cornwallis)-1786-93 ई.
  • सर जॉन शोर (Sir John Shore)-1793-98 ई.
  • लॉर्ड वेलेजली (lord wellesley)-1798-1805 ई.
  • सर जार्ज बार्लो (Sir George Barlow)-1805-07 ई.
  • लॉर्ड मिन्टो (lord Minto)-1807-13 ई.
  • लॉर्ड हेस्टिंग्स (lord Hastings)-1813-23 ई.
  • लार्ड एडम्स (lord Adams)-1823 ई.
  • लार्ड एमहर्स्ट (lord Amherst)-1823-28 ई.
  • लार्ड विलियम बैंटिंक (Lord William Bentinck)-1828-33 ई. [1833 से 1835 ई. तक विलियम बैंटिंक ने भारत के गवर्नर जनरल के पद पर कार्य किया।]

बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स

भारत में अंग्रेजी राज्य के विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हेस्टिंग्स अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भारत आया, परन्तु अपनी सूझ-बूझ और निष्ठा से उसने भारत में कंपनी – शासन का विस्तार किया।

 

वारेन हेस्टिंग्स के कार्य

हेस्टिंग्स ने क्लाइव के द्वैध-शासन को समाप्त करते हुए बंगाल और बिहार के नायब सूबेदार मुहम्मद रजा खाँ और सिताबराय को दीवानी के कार्य से मुक्त कर दिया।

मुर्शिदाबाद से राजकोष हटाकर कलकत्ता में स्थापित किया और दो रेवेन्यू बोर्डों के स्थान पर उसने कलकत्ता में केवल एक रेवेन्यू बोर्ड स्थापित किया।

हेस्टिंग्स दस्तक प्रथा (Free Pass) को समाप्त कर बंगाल व्यापार को सर्वसाधारण के लिए खोल दिया। गुमाश्तों को हटाकर बंगाल में स्वतंत्र व्यापार की प्रथा चलायी और ‘कण्ट्रोलर ऑफ इनवेस्टमेण्ट’ की नियुक्ति की।

व्यापारिक क्षेत्र में हेस्टिंग्स ने यूरोपीय एवं भारतीय व्यापारियों का भेद-भाव हटा दिया, ददनी प्रथा का अन्त कर दिया और कलकत्ता में एक सरकारी टकसाल की स्थापना की।

हेस्टिंग्स ने राजस्व सम्बन्धी कुव्यवस्था को दूर करने के सुझाव हेतु एक समिति नियुक्त को किया। भू-राजस्व वसूली एवं राजस्व सम्बन्धी सुधार हेतु ब्रिटिश लैण्ड रेवेन्यू कलेक्टर के पद का सृजन किया। पहले पाँच वर्षीय और बाद में एक वर्षीय मालगुजारी वसूलने की व्यवस्था की।

भारत में हेस्टिंग्स को न्यायिक सेवा का जनक माना जाता है। उसने प्रत्येक जिले में सर्वप्रथम एक दीवानी तथा एक फौजदारी न्यायालय की स्थापना की।

हेस्टिंग्स ने रेग्यूलेटिंग एक्ट-1773 के तहत् 1774ई. में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना करवायी। हेस्टिंग्स ने एक हिन्दू कोड को भी संकलित कराने की व्यवस्था की।

1774 ई. में रूहेल खण्ड का युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेजों की सहायता से अवध के नवाब ने रूहेल खण्ड पर अधिकार कर लिया।

हेस्टिंग्स और सर विलियम जोन्स द्वारा ‘एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल’ की 1784 ई. में स्थापना की गई।

हेस्टिंग्स के अवैध कार्य

नन्दकुमार को फाँसी- नन्दकुमार एक उच्च वंश का प्रतिभाशाली बंगाली ब्राह्मण था। 11 मार्च 1775 को उसने हेस्टिंग्स पर यह अभियोग लगाया कि उसने मीरजाफर की विधवा मुन्नी बेगम से साढ़े तीन लाख रूपया लेकर उसको नवाब की संरक्षिका बनाया है। इसी समय मोहन प्रसाद नामक कलकत्ता के एक व्यापारी ने नन्दकुमार पर जालसाजी का मुकदमा दायर किया। इस केस में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एलियाज इम्पे द्वारा जो कि वारेन हेस्टिंग्स का मित्र था, प्राणदण्ड दिया गया। 5 अगस्त 1775 को नन्दकुमार को फाँसी दे दी गई। बेवरिज ने मृत्युदण्ड को ‘न्याय की हत्या’ कहा था।

चेतसिंह का मामला- चेतसिंह बनारस के राजा थे। 1775 के फैजाबाद संधि के अनुसार वह कम्पनी के अधीन थे। वारेन हेस्टिंग्स ने धन की माँग करना प्रारम्भ कर दिया। धन न मिलने पर राजा पर आज्ञोल्लंघन तथा कुशासन का आरोप लगाया गया। अन्त में चेतसिंह हारकर ग्वालियर की तरफ भाग गये। स्मिथ ने उसके इस कार्य को ‘अन्यायपूर्ण और बुद्धिमत्ता से हीन’ बतलाया है।

अवध की बेगमों से दुर्व्यवहार- आसफुद्दौला अवध का नवाब था। उस पर कम्पनी का 1 करोड़ रूपये ऋण था। वह यह ऋण अवध की बेगमों से वसूल कर अदा करना चाहता था। 1781 ई. में उसने बेगमों से रूपया माँगा। वारेन हेस्टिंग्स ने आसफुद्दौला का साथ दिया और अवध की बेगमों के साथ क्रूरता का व्यवहार कर उनसे उनका धन ले लिया गया। वारेन हेस्टिंग्स का यह कार्य भी नैतिक दृष्टि से उचित नहीं था।

1785 में वारेन हेस्टिंग्स के इग्लैण्ड लौटने के बाद हाउस ऑफ लार्डस में उसके विरूद्ध एडमंड बर्क, चार्ल्स जेम्स फॉक्स, शेरिडन और गिलबर्ट द्वारा महाभियोग (Impeachment) की कार्यवाही शुरू की गई। एडवर्ड लॉ, फ्लूमर और हालास द्वारा उसकी रक्षा की गई। यह केस सात वर्षो तक चला और अन्त में हेस्टिंग्स को दोष मुक्त कर दिया गया।

बंगाल का तीसरा गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस

कार्नवालिस ने भारत आने से पहले यह शर्त रखी कि वह गवर्नर जनरल के साथ साथ प्रधान सेनापति भी रहेगा और परिषद के बहुमत की उपेक्षा भी कर सकेगा। ब्रिटिश सरकार ने उसकी यह बात स्वीकार कर ली और 1786 में एक एक्ट पास करके गवर्नर जनरल और सेनापति पद एक कर दिया। गवर्नर जनरल को ये अधिकार भी दिया कि वह परिषद के बहुमत की उपेक्षा कर सकता है। इस प्रकार कार्नवालिस असीम शक्तियां लेकर भारत आया।

कार्नवालिस के कार्य

जुलाहे तथा अन्य कारीगर केवल उतना माल ही कम्पनी को देने के लिए बाध्य होगें जितने की उनको पेशगी दी गई है।

कम्पनी के नौकरों को माल के ठेके देने की प्रथा समाप्त कर दिया।

निजामत अदालत को मुर्शिदाबाद से हटाकर कलकत्ता में स्थापित करवाया।

चार प्रान्तीय अदालतों की स्थापना करवायी, तीन बंगाल में तथा एक बिहार में।

जिलों में दीवानी अदालतों की स्थापना करवायी।

रेवेन्यू कोर्ट भंग करके जिले में रेवेन्यू अदालतें स्थापित करवायी।

सब कानूनों का संग्रह करके एक कोड का निर्माण करवाया जिसे ‘कार्नवालिस कोड’ कहा गया।

कार्नवालिस ने कर तथा न्याय प्रशासन को पृथक कर दिया।

पदों पर योग्यता के आधार पर व्यक्तियों की नियुक्ति करने के नियम बनाने। इसीलिए कार्नवालिस को भारत में सिविल सर्विसेज का जनक कहा जाता है।

जमींदारों के हाथ से पुलिस कार्य छीन लिया गया और जिले में 32 किमी. की दूरी पर एक थाना स्थापित किया। इसीलिए कार्नवालिस को भारत में पुलिस सेवा का जन्म दाता कहा जाता है।

इसने भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्त करना बंद कर दिया।

1793 में भूमि स्थायी रूप से जमींदारों को दे दी गई। इस व्यवस्था को ‘इस्तमरारी बन्दोबस्त‘ अथवा ‘स्थायी भूमिकर प्रबन्ध’ भी कहते हैं।

लार्ड कार्नवालिस ने दास व्यापार और दासों के निर्यात पर 1789 में प्रतिबंध लगा दिया।

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92) में टीपू को पराजित किया एवं ‘श्रीरंगपट्टनम’ की संधि की।

सर जान शोर

इसने अहस्तक्षेप नीति का पालन किया। केवल अवध के मामले में हस्तक्षेप किया।

बंगाल का 5वां गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली

1798 में मार्किवस ऑफ वेलेस्ली भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। भारत में उसके उद्देश्य थे कंपनी राज्य का विस्तार कर इसे स्थायित्व प्रदान करना तथा भारत से फ्रांसीसियों के प्रभाव को नष्ट करना। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसने एक नई नीति अपनाई जो सहायक संधि (Subsidiary Alliance) के नाम से विख्यात है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत क्रमशः निजाम (1798 एवं 1800 ई.), मैसूर (1799 ई.), तंजौर (1799 ई.), अवध (1801 ई.), पेशवा (1802 ई.), भोंसले (1803 ई.), सिंधियाँ (1804 ई.) से सन्धि हुई।

वेलेजली के प्रमुख कार्य

सहायक सन्धि की नीति को अपनाया। वेलेजली से पूर्व भारत में डूप्ले ने सहायक सन्धि का प्रयोग किया था।

1799 ई. में वेलेजली ने पुर्तगालियों की अनुमति एवं सहयोग से गोवा में अंग्रेजी सेना को नियुक्त किया।

चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799) में टीपू सुल्तान की मुत्यु के बाद मैसूर कई भागों में विभक्त कर दिया।

वेलेजली ने 1800 ई. में सिविल सेवकों के प्रशिक्षण के लिए फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना कोलकाता में की थी।

फ्रांसीसियों से सुरक्षा के दृष्टिकोंण से वेलेजली ने बंगाल के निकट डच अधिकृत क्षेत्रों पर 1801 ई 0 में अधिकार कर लिया था।

सर जार्ज बार्लो

सर जॉर्ज बार्लो ने देशी राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन पूर्ण रीति से किया। उसके शासनकाल में केवल एक उल्लेखनीय घटना वेलूर का विद्रोह थी।

बंगाल का आठवाँ गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्स

लार्ड हेस्टिंग्स ने अहस्तक्षेप की नीति का परित्याग कर दिया। उसकी विदेश नीति साम्राज्यवादी थी। वह कम्पनी की शक्ति और प्रतिष्ठा में वृद्धि करना चाहता था । उसने सफलता पूर्वक 28 युद्ध लड़े और 120 किले विजित किये। वह अत्यन्त परिश्रमी और महान शासन-प्रबन्धक भी था। उसके कार्यकाल की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं।

नेपाल का युद्ध या गोरखा युद्ध (1814-16 ई.) इसी के कार्यकाल में हुआ। इस युद्ध में विजयी होने के कारण लार्ड हेस्टिंग्स को मार्किसस ऑफ हेस्टिंग्स की उपाधि से विभूषित किया गया। गोरखों के नेता अमर सिंह को पराजित कर सुगौली संधि (1816) की गई। इस संधि के अनुसार गढ़वाल, शिमला, कुमायूँ, रानीखेत एवं नैनीताल अंग्रेजों के अधिकार में आ गए और सिक्किम को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया। यह संधि आज भी जीवित है ।

तृतीय मराठा युद्ध (1817-18 ई.) भी इसी के कार्यकाल में हुआ। इस युद्ध में मराठों की करारी मात हुई।

1818 में बंबई प्रेसीडेन्सी का गठन किया गया और इसी वर्ष ‘1818 के कानून’ द्वारा प्रेस को स्वतंत्रता प्रदान की गई।

इसने पिन्डारियों का दमन (1817-18 ई.) कर उनके उपद्रव से मुक्ति दिलायी।

इसके बाद लार्ड एडम्स अस्थाई गवर्नर जनरल बने इन्होंने प्रेस पर प्रतिबंध लगाया। बंगाल के अन्तिम गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिंक थे। 1833 के अधिनियम द्वारा बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। इस प्रकार विलियम बैंटिंक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने।

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