खिलजी वंश की स्थापना-Establishment of Khilji dynasty

खिलजी वंश की स्थापना जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने की थी। 1290 ई. में गुलाम वंश के अन्तिम शासक शम्सुद्दीन क्यूमर्स की हत्या कर वह दिल्ली का सुल्तान बना। इस राजवंश ने 1290 ई. से 1320 ई. तक कुल 30 वर्ष शासन किया।

 

खिजली कौन थे?

खिलजी कौन थे? इस प्रश्न पर विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों ने खिलजियों को अफगान माना। किन्तु अधिकांश विद्वानों जैसे-फखरुद्दीन, रावर्टी, बार्थोल्ड आदि ने खिलजियों को तुर्क माना। इनके पूर्वज तुर्की से आकर अफगानिस्तान के हेलमन्द नदी के तटीय क्षेत्रों के उन भागों में रहने लगे, जिसे खल्ज क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। सम्भवतः इसीलिए इस जाति का नाम  “खिलजी” (खल्ज क्षेत्र के निवासी) पड़ गया। बहुत समय तक अफगानिस्तान में रहने के कारण उन्होंने अफगानी परम्पराओं को अपना लिया। इसी कारण उन्हें अफगान समझा जाने लगा था। किन्तु वे मूलरूप से तुर्क थे। अफगानिस्तान से वे भारत आये और यहीं बस गये।

खिलजी क्रान्ति

दिल्ली सल्तनत में खिलजी वंश की स्थापना को इतिहास में “खिलजी क्रान्ति” के नाम से भी जाना जाता है। खिलजी वंश की स्थापना को विद्वानों ने निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर खिलजी क्रांति कहा।

खिलजियों के शासन में आने से यह अवधारणा खत्म हो गयी कि शासन केवल विशिष्ट वर्ग का व्यक्ति ही कर सकता है।

खिलजियों ने भारतीयों को भी उच्च पदों पर नियुक्त करने की परम्परा प्रारम्भ की। उन्होंने पदों पर नियुक्ति का आधार कुलीनता के स्थान पर योग्यता को बनाया।

बलबन द्वारा स्थापित राजव्यवस्था के विपरीत खिलजियों ने शाही रक्त के स्थान पर सर्व साधारण को महत्व दिया।

इस वंश के शासकों ने विशेषकर अलाउद्दीन खिलजी ने राजनीति को धर्म से पृथक करने का प्रयास किया।

इस वंश के शासनकाल में भारत में मुस्लिम साम्राज्य का सुदूर दक्षिण तक विस्तार हुआ।

उपर्युक्त सभी कारणों के आधार पर कहा जा सकता है कि खिलजियों द्वारा सत्ता पर अधिकार केवल एक वंश के स्थान पर दूसरे वंश की स्थापना के रूप में नहीं देखा जा सकता बल्कि यह एक व्यवस्था की समाप्ति तथा एक भिन्न व्यवस्था के आरम्भ का सूचक थी। इसीलिए इतिहासकारों ने खिलजी वंश की स्थापना को ‘खिलजी क्रान्ति’ कहा।

खिलजी वंश के शासक

1-जलालुद्दीन फिरोज खिलजी (1290 से1296 ई.)

यह खिलजी साम्राज्य का संस्थापक था।

बलबन का इतिहास

2-अलाउद्दीन खिलजी (1296 से 1316 ई.)

अलाउद्दीन खिलजी 22 अक्टूबर 1296 ई. में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। अलाउद्दीन दिल्ली का प्रथम सुल्तान था जिसने धर्म को राजनीति से पृथक रखा। उसके शासनकाल में इस्लाम के सिद्धान्तों को प्रमुखता न देकर राज्यहित को सर्वोपरि रखा गया। उलेमा वर्ग को भी उसके शासनकार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं था।

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अलाउद्दीन का राजत्व सिद्धान्त मुख्य रूप से तीन बातों पर आधारित था

1-शासक की निरंकुशता

2-धर्म और राजनीति का पृथक्करण

3-साम्राज्यवाद

अलाउद्दीन खिलजी ने एक नये धर्म की स्थापना तथा विश्व विजय करने की योजना बनाई। परन्तु काजी अलाउल मुल्क के सुझाव पर दोनों योजनाओं को त्याग दिया।

उसने स्वयं को सिकंदर-ए-सानी की उपाधि से विभूषित किया था और उसे अपने सिक्कों पर अंकित करवाया।

अलाउद्दीन खिलजी मद्य-पान निषेध करने वाला दिल्ली का प्रथम सुल्तान था।

उसने सेना को नगद वेतन देने एवं स्थायी सेना रखने की नींव रखी।

अलाउद्दीन ने देवगिरि के शासक रामचन्द्र देव के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार किया तथा उसे “राय रायन” की उपाधि प्रदान की।

अलाउद्दीन खिलजी पहला सुल्तान था जिसने भूमि की पैमाइश करा कर लगान वसूलना प्रारम्भ किया।

सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के प्रति “रक्त और तलवार” की नीति अपनाई।

वह दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था जिसने विन्ध्याचल पर्वत पार तक साम्राज्य विस्तार किया था।

वह दिल्ली का प्रथम शासक था जिसने दक्षिण को जीता। उसकी दक्षिण विजय का श्रेय मलिक काफूर को जाता है।

उसके दक्षिण अभियान केवल धन प्राप्ति के लिए थे।

दीवान-ए-रियासत विभाग की स्थापना अलाउद्दीन ने ही की थी।

सर्वाधिक खालसा भूमि इसी के शासनकाल में विकसित हुई।

अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय देवगिरि का शासक रामचन्द्र देव था।

इसके शासनकाल में चार प्रमुख विद्रोह हुए।

1-नव मुस्लिम विद्रोह

2-अकत खां का विद्रोह

3-मंगू खां का विद्रोह

4-हाजी मौला का विद्रोह

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राज्य में होने वाले विद्रोहों के मुख्य रूप से चार कारण थे

1-राज्य में होने वाली गतिविधियों से सुल्तान का अनभिज्ञ रहना।

2-राजधानी में त्यौहारों, उत्सवों एवं भोज के अवसरों पर मद्यपान की सभाओं में षड्यंत्रों का रचा जाना।

3-सामन्त वर्ग में आपस में शक्तिशाली परिवारों के बीच वैवाहिक संबंध आदि होने से उनकी शक्ति में वृद्धि होना।

4-जनता के बीच में धनी वर्ग का प्रभाव बढ़ना।

विद्रोह के कारणों को जानने के बाद अलाउद्दीन ने चार अध्यादेश जारी किये।

1-प्रथम अध्यादेश के अन्तर्गत सुल्तान ने दान, उपहार व पेंशन के रूप में अमीरों को दी गयी भूमि छीन ली और उस पर अधिकाधिक कर लगा दिया। जिससे धनी वर्ग के पास धनाभाव हो गया।

2-द्वितीय अध्यादेश में सुल्तान ने गुप्तचर विभाग को संगठित किया तथा बरीद एवं मुनहिस अधिकारियों की नियुक्ति की।

3-तीसरे अध्यादेश में उसने मद्य-पान तथा जुआ खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया।

4-चौथे अध्यादेश में अमीरों के मेल-जोल, उनके सार्वजनिक समारोहों एवं वैवाहिक सम्बन्धों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

अलाउद्दीन खिलजी साम्राज्यवादी होने के साथ शिक्षा और कला में भी अभिरुचि रखता था। उसके दरबार में अमीर हसन व अमीर खुसरो जैसे विद्वानों को संरक्षण प्राप्त था। उसने 46 साहित्यकारों को संरक्षण दिया था। अमीर हसन को भारत का सादी भी कहा जाता है। निर्माण कार्य के क्षेत्र में भी अलाउद्दीन का महत्वपूर्ण योगदान है। उसने अलाई-दरवाजा, जमैयत खाना मस्जिद, हजार सितून, आदि इमारतों का निर्माण करवाया।

4 जनवरी 1316 ई. में इस्तिष्का रोग से पीड़ित होने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी।

3-शिहाबुद्दीन उमर

अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद मलिक काफूर ने अलाउद्दीन के अल्पवयस्क पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को गद्दी पर बैठाया तथा स्वयं उसका संरक्षक बना। शिहाबुद्दीन उमर के सुल्तान बनने के लगभग 35 दिन बाद अलाउद्दीन के तीसरे पुत्र मुबारक खिलजी ने मलिक काफूर की हत्या करवा दी। मलिक काफूर की हत्या के बाद वह स्वयं सुल्तान का संरक्षक बन गया। कुछ दिन बाद उसने सुल्तान शिहाबुद्दीन उमर को अंधा कराके कैद करवा लिया और स्वयं सत्ता पर अधिकार कर लिया।

अलाउद्दीन के आर्थिक सुधार

4-कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी (1316 से 1320 ई.)

मुबारक खिलजी 19 अप्रैल 1316 ई. में कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। वह सल्तनत काल का प्रथम शासक था, जिसने खलीफा की सत्ता मानने से इंकार कर दिया। उसने अपने शासनकाल में गुजरात के विद्रोह का दमन किया तथा देवगिरि को पुनर्विजित किया। उसे नग्न स्त्री पुरुषों की संगत पसन्द थी।

बरनी के अनुसार “वह कभी-कभी नग्न होकर राजदरबारियों के बीच दौड़ा करता था।” 15 अप्रैल 1320 ई. में मुबारक खिलजी की हत्या उसके वजीर खुसरो खां ने दी और स्वयं दिल्ली की गद्दी को पर बैठ गया।

नासिरुद्दीन खुसरव शाह (15 अप्रैल से 7 सितम्बर 1320 ई.)

मुबारक खिलजी की हत्या कर खुसरो खां “नासिरुद्दीन खुसरव शाह” के नाम से 15 अप्रैल 1320 ई. में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। उसने अपने नाम के खुतवे पढ़वाए तथा “पैगम्बर का सेनापति” की उपाधि धारण की। वह एक हिन्दू धर्म से परिवर्तित मुसलमान था। उसका शासनकाल भारतीय मुसलमानों द्वारा राजनैतिक सत्ता प्राप्त करने का द्वितीय प्रयास था। प्रथम प्रयास नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में इमामुद्दीन रैहान ने किया था।

दीपालपुर का राज्यपाल व सीमा रक्षक गाजी मलिक तुगलक ने नासिरुद्दीन खुसरव शाह की सत्ता स्वीकार नहीं की। वह एक सेना लेकर दिल्ली की ओर चल दिया। 5 सितम्बर 1320 ई. में दिल्ली के निकट इन्द्रप्रस्थ नामक स्थान पर नासिरुद्दीन खुसरव शाह तथा गाजी मलिक के बीच युद्ध हुआ। जिसमें खुसरव शाह पराजित हुआ।

7 सितम्बर को ‘गाजी मलिक तुगलक’ अलाउद्दीन के हजार स्तम्भों वाले महल में प्रवेश किया और 8 सितम्बर 1320 ई. में दिल्ली के तख्त पर बैठा। इस तरह दिल्ली सल्तनत में एक नये वंश “तुगलक वंश” की स्थापना हुई।

Memorable points

खिलजी वंश की स्थापना को खिलजी क्रान्ति के नाम से भी जाना जाता है।

खिलजियों ने “किलोखरी” को अपनी राजधानी बनाया।

इस वंश के सुल्तानों ने विशेषकर अलाउद्दीन ने “धर्म पर राज्य का नियंत्रण” स्थापित किया था।

कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था, जिसने खलीफा की सत्ता को नहीं माना। उसने स्वयं को “खलीफा” घोषित किया।

कुतुबुद्दीन मुबारक ने “अल-इमाम-उल-इमाम, खिलाफत-उल्लाह, अलवासिक विल्लाह” की उपाधियां ग्रहण की थी।

कुतुबुद्दीन मुबारक “खिलजी वंश” का अन्तिम शासक था।

कुतुबुद्दीन मुबारक का वजीर नासिरुद्दीन खुसरव शाह, जो बाद में सुल्तान बना। ने “पैगम्बर का सेनापति” की उपाधि धारण की थी।

सल्तनत कालीन स्थापत्य कला के क्षेत्र में इस राजवंश के शासन काल में अलाई दरवाजा, सीरी महल जैसी विशेष इमारतों का निर्माण हुआ।