पृथ्वी का इतिहास-history of earth

पृथ्वी के इतिहास की व्याख्या का सर्वप्रथम प्रयास कास्ते-द-बफन ने किया था। नवीनतम शोधों में किये गये उल्का पिंडों एवं चन्द्रमा की चट्टानों के विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 46 अरब वर्ष पूर्व  हुई। उत्पत्ति के समय पृथ्वी एक ज्वलित गैसीय पिण्ड के रूप में थी।

यद्यपि पृथ्वी के सबसे प्राचीन पत्थरों के नमूनों में उपस्थित रेडियोधर्मी तत्वों के परीक्षण से पृथ्वी की आयु 39 अरब वर्ष निकली है। लेकिन उल्का पिंडों एवं चन्द्रमा के चट्टानों के विश्लेषण से प्राप्त आयु को अधिक प्रमाणिक माना गया है।

अध्ययन की सुविधा के लिए पृथ्वी के इतिहास को कई कालखण्डों में विभक्त किया गया है।

  • महाकल्प (Era)

यह सबसे बड़ा कालखण्ड होता है।

  • युग (Epoch)

महाकल्पों को पुनः युगों में विभाजित किया गया है। जिन्हें क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ युग कहा जाता है।

  • शक या कल्प (Period)

प्रत्येक युग को छोटे छोटे शक में विभक्त किया गया है।

पृथ्वी की उत्पत्ति एक ज्वलित गैसीय पिण्ड के रूप में हुई। इसके बाद लगभग 6 अरब वर्ष तक इस गैसीय पिण्ड के ऊपर भूपटल का निर्माण हुआ।

पृथ्वी के इतिहास का वर्गीकरण

भूपटल निर्माण के काल को अजीवी महाकल्प (Azoic Era) कहते हैं। भूपटल के निर्माण के बाद के समय को जीवी महाकल्प (Zoic Era) कहा जाता है। जीवी महाकल्प को निम्नलिखत भागों में विभाजित किया गया है।

1-पूर्व कैम्ब्रियन महाकल्प (pre-cambrian Era)

आर्कियोजोइक महाकल्प तथा प्रोटीरोजोइक महाकल्प के सम्मिलित रूप को प्री-कैम्ब्रियन महाकल्प कहते हैं। जो 4 अरब वर्ष से लेकर 59 करोड़ वर्ष तक रहा। अतः इसकी अवधि लगभग 341 अरब वर्ष थी।

पृथ्वी के इतिहास में इसे सबसे लम्बी अवधि वाला प्रभाग (इओन-Eons) कहा जाता है। सम्पूर्ण प्री-कैम्ब्रियन महाकल्प में सामान्तया आग्नेय चट्टानें ही थी।

सुपीरियर झील के समीपवर्ती भागों तथा भारत में धारवाड़, छोटा नागपुर, दिल्ली क्रम की चट्टानों एवं अरावली पर्वत का निर्माण इसी महाकल्प में हुआ। इस पर्वत निर्माणकारी प्रक्रिया को “चर्नियन हलचल” कहा गया।

a-आर्कियोजोइक महाकल्प (Archaeozoic Era)

इस इरा की चट्टानों में जीवाश्मों का पूर्णतः अभाव मिलता है। इन चट्टानों में ग्रेनाइट तथा नीस की प्रधानता है। जिनमें लोहा तथा सोना आदि पाया जाता है। कनाडियन व फेनोस्केंडिया शील्ड इसी महाकल्प में निर्मित हुए एवं पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति भी इसी महाकल्प में लगभग 38 अरब वर्ष पूर्व आदिसागर में हुई।

b-प्रोटीरोजोइक महाकल्प (Proterozoic Era)

इस महाकल्प में समुद्र में रीढ़ विहीन जीवों का प्रादुर्भाव हुआ। सम्भवता इस महाकल्प के अन्त तक रीढ़ युक्त जीवों का विकास होने लगा था। किन्तु स्थल भाग जीव रहित था।

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2-पुराजीवी महाकल्प (Palaeozoic Era)

इसे प्राथमिक युग भी कहा जाता है। यह 59 करोड़ वर्ष पूर्व से प्रारम्भ होकर 242 करोड़ वर्ष पूर्व तक विद्यमान रहा। अतः इस महाकल्प की कुल अवधि 342 करोड़ वर्ष थी। पेलियोजोइक महाकल्प को निम्नलिखित शकों में विभक्त किया गया है।

a-कैम्ब्रियन शक (Cambrian Period)

यह शक 59 करोड़ वर्ष पूर्व से प्रारम्भ होकर 505 करोड़ वर्ष पूर्व तक विद्यमान रहा। इस काल में प्रथम बार स्थल भागों पर समुद्रों का अतिक्रमण हुआ।

प्राचीनतम अवसादी शैलों का निर्माण इसी शक में हुआ। पेरीपेट्स (एनीलिडा एवं आर्थोपोड़ा संघ का संयोजक जन्तु) का जीवाश्म इसी शक की  चट्टानों में पाया गया।

भारत में विंध्याचल पर्वत माला का विकास कैम्ब्रियन काल में ही हुआ था। इसी समय समुद्रों में घास की उत्पत्ति हुई थी।

b-ऑर्डोविसियन शक (Ordovician Period)

यह शक 50.5 करोड़ वर्ष पूर्व से प्रारम्भ होकर 43.8 करोड़ वर्ष पूर्व तक चला। इस काल में समुद्र के विस्तार ने उत्तरी अमेरिका का आधा भाग डुबो दिया। जबकि पूर्वी अमेरिका टैकोनियन पर्वत निर्माणकारी गतिविधियों से प्रभावित हुआ। इस काल में वनस्पतियों का विस्तार हुआ तथा रेंगने वाले जीव एवं निम्न कोटि की मछलियों का विकास हुआ। किन्तु स्थल भाग अभी भी जीव विहीन था।

c-सिल्यूरियन शक (Silurian Period)

इस काल में सभी महाद्वीप पर्वत निर्माणकारी प्रक्रिया “कैलिडोनियन हलचल” से प्रभावित रहे। जिसके परिणाम स्वरूप अप्लेशियन, स्कॉटलैण्ड, स्कैंडिनेविया के पर्वतों का निर्माण हुआ। अतः यह ‘कैलिडोनियन हलचलों का काल’ भी है।

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई?

इस काल में रीढ़ वाले जीवों का व्यापक विस्तार हुआ। अतः इसे ‘रीढ़ वाले जीवों का काल’ भी कहते हैं। स्थल भाग पर पौधों का उद्भव इसी काल में हुआ। ये पौधे पत्ती विहीन थे।

d-डिवोनियन शक (Devonian Period)

इस काल की जलवायु मछलियों के लिए सर्वाधिक अनुकूल थी। अतः इसे “मत्स्य युग” की संज्ञा प्रदान की जाती है। शार्क मछली का आविर्भाव इसी शक में हुआ तथा उभयचर जीवों एवं फर्न वनस्पतियों की उत्पत्ति भी इसी काल में हुई।

प्रथम उभयचर ‘स्ट्रीगोसिफैलिया’ का विकास इसी समय हुआ। इसके अलावा जमीन पर जंगलों का विस्तार हुआ एवं ज्वालामुखी क्रियाएँ भी सक्रिय हुईं।

e-कार्बोनीफेरस शक (Carboniferous Period)

इस काल में ‘कैलिडोनियन हलचलों’ का स्थान ‘आर्मोरियन हलचलों’ ने ले लिया। इस शक में उभयचरों का काफी विकास व विस्तार हुआ। इसलिए इसे “उभयचरों का युग” कहते हैं।

रेंगने वाले जीवों (सरीसृप) की स्थलीय भाग पर उत्पत्ति हुई। इस काल में 100 फीट ऊँचे पेड़ों की उत्पत्ति हुई। अतः यह ‘बड़े वृक्षों (ग्लोसोप्टिरस वनस्पतियों) काल’ कहलाता है। इस समय बने भ्रंशों में वृक्षों के दब जाने के कारण “गोंडवाना क्रम की चट्टानों” का निर्माण हुआ, जिनमें कोयले के व्यापक निक्षेप मिलते हैं।

f-पर्मियन शक (पर्मियन पीरियड)

इस काल में पर्वतीय “वैरीसन हलचल” अथवा “हार्सीनियन हलचल” हुई। इसके फलस्वरूप भ्रंशों के निर्माण के कारण ब्लैक फॉरेस्ट व वास्जेस जैसे भ्रंशोत्थ पर्वतों का निर्माण हुआ। स्पेनिश मेसेटा, अल्ताई, तिएनशान एवं अप्लेशियन जैसे पर्वत के कुछ भागों का निर्माण इसी समय में हुआ।

भ्रंशन के कारण उत्पन्न आन्तरिक झीलों के वाष्पीकरण से पृथ्वी पर पोटाश भण्डारों का निर्माण हुआ।

3-मध्यजीवी महाकल्प (Mesozoic Era)

इस महाकल्प का आरम्भ 24.8 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था और इसकी समाप्ति 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व हुई थी। इसे द्वितीयक युग भी कहा जाता है। इस महाकल्प को तीन शकों में विभाजित किया गया है।

a-ट्रियाशिक शक (Triassic Period)

इस काल में स्थल पर रेंगने वाले बड़े-बड़े जीवों का विकास हुआ। इसलिए इसे ‘रेंगने वाले जीवों का काल’ या “सरीसृपों का युग” कहा जाता है। इस काल के अन्तिम चरण में उड़ने वाले सरीसृपों से टीरीसॉरों तथा रेंगने वाले सरीसृपों से अण्डे देने वाले स्तनियों प्रोटीथीरिया की उत्पत्ति हुई। इस समय तीव्र गति से तैरने वाले लॉबस्टर (केकड़ा समूह) का उद्भव भी हुआ।

सूर्य की संरचना

गोंडवानालैंड भूखण्ड का विभाजन इसी काल में आरम्भ हुआ। इस विभाजन से आस्ट्रेलिया, दक्षिणी भारत, अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका के स्थल खण्ड निर्मित हुए। स्तनधारी रेप्टाइल्स की उत्पत्ति भी इसी शक में हुई।

b-जुरैसिक शक (Jurassic Period)

इस काल में स्थल पर डायनोसोरों जैसे रेप्टाइल्स का प्रभुत्त रहा। निम्न स्तनियों से मार्सुपियल स्तनियों की उत्पत्ति हुई। “आर्कियोप्टेरिक्स” की उत्पत्ति इसी काल में हुई थी। पुष्पयुक्त पौधों अर्थात आवृतबीजी की उत्पत्ति भी इसी काल में हुई थी।

c-क्रिटेशियस शक (Cretaceous Period)

इस काल में पर्वत निर्माण क्रिया अत्यधिक सक्रिय रही तथा रॉकी, एण्डीज, यूरोप महाद्वीप की कई पर्वत श्रेणियों एवं पनामा कटक की उत्पत्ति हुई।

भारत के दक्षिणी पठारी भाग पर ज्वालामुखी क्रिया द्वारा लावा के जमाव से “दक्कन ट्रैप” व काली मिट्टी का निर्माण हुआ।

उत्तरी-पश्चिमी अलास्का, कनाडा, मैक्सिको, ब्रिटेन के डोबर क्षेत्र व आस्ट्रेलिया में खरिया मिट्टी का जमाव इस काल की सबसे प्रमुख विशेषता है।

मैग्नेलिया व पोपनार जैसे शीतोष्ण पतझड़ वन इसी शक में विकसित हुए। बड़े-बड़े कछुओं का उद्भव भी इसी काल में हुआ।

4-नवजीवी महाकल्प (Cenozoic Era)

इस महाकल्प का प्रारम्भ लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था तथा लगभग 20 लाख वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। इसे तृतीयक युग भी कहा जाता है।

इस महाकल्प में अल्पाइन पर्वतीकरण प्रक्रिया के फलस्वरूप विश्व के सभी नवीन मोड़दार पर्वतों आल्प्स, हिमालय, रॉकी एवं एंडीज आदि की उत्पत्ति हुई। इसे “स्तनियों, कीटों एवं आवृतबीजी पादपों का युग” भी कहा जाता है। इस महाकल्प को निम्नलखित शकों में बांटा गया है।

a-पैल्योसीन शक (Paleocene Period)

इस युग में लैरामाइड हलचल के फलस्वरूप उत्तरी अमेरिका में रॉकी पर्वतमाला का निर्माण हुआ। एवं स्थल पर पुष्पी पादपों एवं पुरातन स्तनियों का विस्तार हो रहा था।

b-इयोसीन शक (Eocene Period)

इस शक में भूतल की विभिन्न दरारों से ज्वालामुखी का उद्गार हुआ। स्थल पर रेंगने वाले जीव प्रायः लुप्त हो गए। प्राचीन बन्दर व गिब्बन म्यामांर में उत्पन्न हुए। हाथी, घोड़ा, गैंडा एवं सूअर के पूर्वजों का उद्भव इस शक में हो गया था।

c-ओलीगोसीन शक (Oligocene Period)

इस शक में “अल्पाइन पर्वतीकरण” प्रारम्भ हुआ। इसी युग में कुत्ता, बिल्ली एवं भालू के पूर्वजों का जन्म हुआ। इस काल में पुच्छहीन बन्दर का उद्भव हुआ जिसे मानव का पूर्वज कहा जाता है। वृहद हिमालय की उत्पत्ति भी इसी काल में हुई।

d-मायोसीन शक (Miocene Period)

इस काल में अल्पाइन पर्वत निर्माणकारी गतिविधियों द्वारा सम्पूर्ण यूरोप एवं एशिया में वलनों का विस्तार हुआ, वलनों के विस्तार की दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर थी।

प्लेट टेक्टोनिक थ्योरी

पोटवार क्षेत्र के अवसादों के वलन से लघु या मध्य हिमालय का निर्माण हुआ। इस युग में शार्क मछली का सर्वाधिक विकास हुआ एवं स्थल पर प्रोकानसल, जल पक्षी एवं पेंग्विन उत्पन्न हुए।

e-प्लायोसीन शक (Pliocene Period)

इस शक में वर्तमान महासागरों एवं महाद्वीपों का स्वरुप विकसित होना प्रारम्भ हो गया था। इसी काल में समुद्रों के निरन्तर अवसादीकरण से यूरोप, मेसोपोटामिया, उत्तरी भारत, सिन्ध एवं उत्तरी अमेरिका में विस्तृत मैदानों का विकास हुआ।

ब्लैक सागर, उत्तरी सागर, कैस्पियन सागर तथा अरब सागर की उत्पत्ति एवं हिमालय पर्वत माला और दक्षिण के प्रायद्वीपीय भाग के बीच स्थित जलपूर्ण द्रोणी टेथिस भू-सन्नति में अवसादों के जमाव से उत्तरी विशाल मैदान का निर्माण इसी काल में हुआ। बहुत बड़े आकार वाली शार्क मछली का विनाश हो गया। मानव की उत्पत्ति इसी शक में हुई थी।

5-नूतन महाकल्प (Neozoic Era)

इसे चतुर्थ युग भी कहा जाता है। इस महाकल्प को दो शकों में विभक्त किया गया है।

a-प्लीस्टोसीन काल (Pleistocene Period)

इस शक की सबसे बड़ी विशेषता थी, भू-पटल पर हिम चादर का बनना। जिसके कारण यूरोप ने चार हिमयुग को देखा। जो इस प्रकार हैं-गुंज, मिन्डेल, रिस एवं वुर्म। विभिन्न हिमकालों के बीच में अन्तर्हिम काल (आवान्तर हिमयुग) देखे गए। मिन्डेल तथा रिस के बीच का अन्तर्हिम काल सर्वाधिक लम्बी अवधि का था।

इसी प्रकार उत्तरी अमेरिका में भी इसी समय नेब्रास्कन, कन्सान, एलिनोइन व विंस्कासिन हिम काल देखे गए। प्रति दो हिमयुगों के बीच एक हिम रहित युग था जिसे आवान्तर हिमयुग या अन्तर्हिम काल कहा गया है। अतः नेब्रास्कन एवं कन्सान के बीच अफ्टोनियन, कन्सान एवं एलिनोइन के बीच यारमाउथ, एलिनोइन एवं विस्कांसिन के बीच संगमन अन्तर्हिम काल था।

अमेरिका में वृहद झीलों तथा नार्वे के फियार्ड तट का निर्माण इसी शक में हुआ। इस शक के अंत में हिम चादर पिघलते चले गए एवं स्कैन्डिनेवियन क्षेत्र की ऊँचाई में निरन्तर वृद्धि हुई।

भारत की भूगर्भिक संरचना

पृथ्वी पर उड़ने वाले पक्षियों का आविर्भाव प्लीस्टोसीन शक में ही माना जाता है। मानव अफ्रीका से निकलकर यूरोप तथा एशिया महाद्वीपों तक पहुँच गया एवं शिकार हेतु पत्थरों से औजार भी बनाने लगा।

b-होलोसीन शक (Holocene Period)

इस शक को “मानव का युग” कहा जाता है। जलवायु में परिवर्तन एवं शुष्कता के कारण उत्तरी अफ्रीका एवं मध्य पूर्व एशिया के मरुस्थलों का उद्भव हुआ। मनुष्य ने पशुपालन एवं कृषि कार्य करना आरम्भ किया।