बारदोली सत्याग्रह और उसका कारण-Bardoli Satyagraha and its reason

बारदोली सत्याग्रह गुजरात के सूरत जिले में किसानों द्वारा 4 फरवरी 1928 ई. में ‘लगान न देने’ के लिए किया गया। इसका नेतृत्व “सरदार वल्लभ भाई पटेल” द्वारा किया गया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरमपंथी नेताओं ने इस अहिंसक आन्दोलन का समर्थन ‘सर्वेन्ट ऑफ इण्डिया सोसायटी’ के माध्यम से किया।

इस आंदोलन में महिलाओं ने भी बड़े उत्साह से भाग लिया। जिसमें कस्तूरबा गांधी, मीठू बेन, भक्तिबा, मनीबेन पटेल, शरदाबेन शाह और शारदा मेहता का नाम प्रमुख है।

 

कापिलराज नामक जनजाति के लोगों ने भी इस आन्दोलन में सहयोग दिया। क्योंकि किसानों की जमीन यही लोग जोता करते थे। लगान वृद्धि का प्रभाव इन पर भी पड़ रहा था।

 सरकार ने इस सत्याग्रह को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाये किन्तु जनमत से बाध्य होकर उसे किसानों के आगे झुकना पड़ा। अन्ततः सरकार ने एक न्यायिक अधिकारी ‘ब्लूमफील्ड’ तथा एक राजस्व अधिकारी ‘मैक्सवेल’ से सम्पूर्ण मामले की जाँच करायी।

 जाँच में 22% (जो प्रारम्भ में 30% थी)  लगान वृद्धि को अनुचित बताया गया। अतः सरकार को लगान वृद्धि को घटाकर 6.03% करना पड़ा। यह आन्दोलन पूरी तरह अहिंसक और सफल रहा।

चम्पारण सत्याग्रह के कारण

 बारदोली सत्याग्रह के सफल होने के बाद बारदोली की महिलाओं की तरफ से गांधी जी ने वल्लभ भाई पटेल को “सरदार” की उपाधि प्रदान की।

बारदोली सत्याग्रह का कारण

 बारदोली आन्दोलन का मुख्य कारण सरकार द्वारा की गयी लगान में 22% की वृद्धि था। जिसका विरोध किसानों ने किया और किसान समिति के सदस्य और स्थानीय नेता वल्लभ भाई पटेल को बारदोली आने का आमंत्रण दिया।

4 फरवरी 1928 को वल्लभ भाई पटेल ने इस किसान आन्दोलन का नेतृत्व संभाला और इसे ‘बारदोली सत्याग्रह’ नाम दिया।

 ‘हाली पद्धति’ के शिकार लोगों ने भी इस आन्दोलन में सहयोग किया। क्योंकि बारदोली के किसानों की जमीन यही लोग बटाई पर जोता करते थे। अतः लगान वृद्धि का उनकी आमदनी पर भी प्रभाव पड़ रहा था।

 ‘हाली पद्धति’ एक प्रकार की “बन्धुआ मजदूरी” थी। जिसे कापिलराज नामक जनजाति के लोग करने के लिए विवश थे। इन्हें ‘दुबला आदिवासी’ भी कहा जाता था।

बारदोली आन्दोलन की पृष्ठभूमि

 बारदोली क्षेत्र के 137 गांवों के लगभग 87 हजार किसान 1908 ई. में मेहता बन्धुओं (कुँवरजी मेहता तथा कल्याणजी मेहता) के नेतृत्व में संगठित होने लगे थे। इस संगठन ने पाटीदार युवक मंडल तथा पटेल बन्धु नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया।

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 जब वर्ष 1926 ई. में सरकार ने लगान की दर 30% बढ़ा दी। तो किसानों ने इसका जबरदस्त विरोध किया और लगान में कमी करने हेतु 1927 ई. में भीम भाई नाइक तथा शिवदासानी के नेतृत्व एक प्रतिनिधि मण्डल बम्बई के राजस्व विभाग के प्रमुख से मिलने भेजा।

 इस मण्डल के प्रयासों से सरकार ने जुलाई 1927 ई. में लगान वृद्धि को 30% से घटाकर 22% कर दिया। किन्तु किसान इससे सन्तुष्ट नहीं हुए और विरोध जारी रखने का फैसला लिया।

 उन्होंने वल्लभ भाई पटेल, जो खेड़ा सत्याग्रह, नागपुर फ्लैग मार्च सत्याग्रह और बलखाड़ सत्याग्रह के कारण लोगों के बीच लोकप्रिय हो चले थे, इस आन्दोलन का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया।

 4 फरवरी 1928 ई. में पटेल ने इस आन्दोलन का नेतृत्व संभाला और ‘बारदोली सत्याग्रह’ नाम दिया।

कापिलराज और हाली पद्धति

 कापिलराज एक जनजाति थी। जो अपने जीवन पोषण के लिए बारदोली में कुनबी पाटीदारों (किसानों) के यहां खेती करने के लिए विवश थी। यह एक प्रकार की ‘बन्धुआ मजदूरी’ थी। जिसे “हाली पद्धति” कहा जाता था। उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी। इनकी आबादी बारदोली तालुका में 60% थी।

 स्थानीय नेता कल्याणजी मेहता, कुँवरजी मेहता, दयालजी देशाई, केशवजी आदि द्वारा इनमें चेतना जगाने का प्रयास किया गया।

सन्यासी विद्रोह

 कुंवरजी मेहता तथा केशवजी ने शिक्षित कापिलराज के लोगों की सहायता से “कापिलराज साहित्य” का सृजन किया और हाली पद्धति के खिलाफ आवाज उठायी।

 1922 के बाद यहाँ इस जनजाति के उत्थान के लिए प्रत्येक वर्ष कापिलराज सम्मेलन का आयोजन प्रारम्भ किया।

 1927 के कापिलराज सम्मेलन की अध्यक्षता गाँधी जी ने की थी। इसी सम्मेलन में गांधी जी ने कापिलराज का नाम बदलकर रानीपराज (बनवासी) रखा।

 प्रसिद्ध नेता नरहरि पारीख तथा जगतराम दवे ने हाली पद्धति के अमानवीय चहरों को सामने रखा तथा इसे समाप्त करने के लिए बारदोली सत्याग्रह में आवाज उठायी।