भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक-Factors affecting language development

मनुष्य एक सर्वाधिक विकसित प्राणी माना जाता है। अन्य प्राणियों के समक्ष ऐसा कोई माध्यम नहीं है जिसके द्वारा वे अपने विचार एवं भाव दूसरे प्राणी तक स्पष्ट रूप से पहुँचा सके और उसे प्रकट कर सकें। मानव जाति की विशेषता इसकी भाषा और वाणी है। मनुष्य अपनी वाक् इन्द्रियों के द्वारा अपनी भाषा का प्रयोग करता है। मनुष्य की वाणी वाक् इन्द्रिय की क्रियाशीलता होती है, अपनी आन्तरिक प्रेरणा से वह अपने आपका प्रकाशन वाणी के माध्यम से करता है। भाषा इसी वाणी का उत्पाद है जिसमें मनुष्य की बौद्धिक कुशलता निहित होती है। भाषा विकास बौद्धिक विकास की सर्वाधिक उत्तम कसौटी मानी जाती है। बालक को सर्वप्रथम भाषा ज्ञान परिवार से होता है।

 

कार्ल सी गैरिसन के अनुसार “स्कूल जाने से पूर्व बालकों में भाषा ज्ञान का विकास उनके बौद्धिक विकास की सबसे अच्छी कसौटी है। भाषा का विकास भी विकास के अन्य पहलुओं के लाक्षणिक सिद्धान्तों के अनुसार होता है। यह विकास परिपक्वता तथा अधिगम दोनों के फलस्वरूप होता है और इसमें नई अनुक्रियाएँ सीखनी होती हैं और पहले की सीखी हुई अनक्रियाओं का परिष्कार भी करना होता है।

भाषा का अर्थ

भाषा का अर्थ होता है- कही हुई ध्वनि जिसका अर्थ निकलता हो। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार भाषा दूसरों तक विचारों को पहुँचाने की योग्यता है इसमें विचार-भाव के आदान-प्रदान के प्रत्येक साधन सम्मिलित किए जाते हैं। जिसमें विचारों और भावों के प्रतीक बना लिए जाते हैं जिससे कि आदान-प्रदान के व्यापक रूप में भिन्न रूपों जैसे लिखित, बोले गए, सांकेतिक, मौखिक, इंगित प्रहसन तथा कला के अर्थ बताए जाते हैं।

भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक

बुद्धि– भाषा की क्षमता एवं योग्यता का सम्बन्ध हमारी बुद्धि से अटूट होता है। भाषा की कुशलता भी उन बालकों में अधिक होती है, जो बुद्धि में अधिक होते हैं। बर्ट ने अपने ‘बैकवार्ड चाइल्ड’ में संकेत किया है जिन बालकों की बुद्धि क्षीण होती है वे भाषा की योग्यता भी कम रखते हैं और पिछड़े भी होते हैं। तीक्ष्ण बुद्धि बालक भाषा का प्रयोग उपयुक्त ढंग से करते हैं।

जैविकीय कारक– मस्तिष्क की बनावट भी भाषा विकास को प्रभावित करते हैं। भाषा बोलने तथा समझने के लिए स्नायु तन्त्र तथा वाक्-यन्त्र की आवश्यकता होती है। बहुत हद तक इनकी बनावट तथा कार्य शैली तथा स्नायु नियन्त्रण भाषा को प्रभावित करते हैं।

वातावरणीय कारक– भाषा सम्बन्धी विकास पर, व्यक्ति जिस स्थान और परिस्थिति में रहता है, आचरण करता है, विचारों का आदान-प्रदान करता है प्रभाव पड़ता है। उदाहरण स्वरूप निम्न श्रेणी के परिवार व समाज के लोगों में भाषा का विकास कम होता है क्योंकि उन्हें दूसरों के सम्पर्क में आने का अवसर कम मिलता है, इसी प्रकार परिवार में कम व्यक्तियों के होने पर भी भाषा संकुचित हो जाती है।

विद्यालय और शिक्षक– विद्यालय और शिक्षक भाषा विकास में महती भूमिका का निर्वाहन करते हैं। विद्यालय में विभिन्न विषयों एवं क्रियाओं का सीखना तथा सिखाना भाषा के माध्यम से होता है। इस प्रक्रिया में भाषा सम्बन्धी विकास अच्छे से होता है।

व्यवसाय एवं कार्य– ऐसे बहुत से व्यवसाय हैं जिनमें भाषा का प्रयोग अत्यधिक होता है, उदाहरण स्वरूप अध्यापन, वकालत, व्यापार कुछ ऐसे व्यवसाय हैं जिनमें भाषा के बिना कोई कार्य नहीं चल सकता। अतएव वातावरण के अन्तर्गत इनको भी सम्मिलित किया गया है।

अभिप्रेरण, अनुबन्धन तथा अनुकरण– मनोवैज्ञानिक के विचारानुसार भाषा सम्बन्धी विकास अभिप्रेरण, अनुबन्धन एवं अनुकरण पर निर्भर करता है। एक निरीक्षण से ज्ञात हुआ कि बोलने वाले शिशु को प्रलोभन देकर स्पष्ट भाषी बनाया गया। एक दूसरे निरीक्षण में शिशुओं को चित्र दिखाकर उनके नाम याद कराए गए। ये अभिप्रेरण के महत्व को प्रकट करते हैं। भाषण प्रतियोगिता में पुरस्कृत होने पर छात्र को अधिक प्रभावशाली भाषा का प्रयोग करने की अभिप्रेरणा मिलती है।

अनुबन्धन की प्रक्रिया में प्रलोभन पुरस्कार या अभिप्रेरण के साथ प्रयत्न इस प्रकार जोड़ा जाता है कि प्रक्रिया पूरी हो जाती है। अनुकरण वास्तव में एक सामान्य प्रकृति है जो सभी को अभिप्रेरित करती है। अनुकरण की प्रवृत्ति एक आन्तरिक अभिप्रेरक होती है। कक्षा में अध्यापक की सुस्पष्ट साहित्यिक तथा शुद्ध भाषा का अनुकरण सचेतन एवं अचेतन रूप में छात्र करते हैं तथा भाषा सम्बन्धी विकास करने में सफल होते हैं।

सारांश

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भाषा का विकास बालक की बुद्धि, परिवेश, विद्यालय, शिक्षक तथा अनुकरण एवं अभिप्रेरण से प्रभावित होता है। अतः किसी बालक में प्रभावी भाषा के विकास के लिए उपर्युक्त कारकों का उचित उपयोग आवश्यक है।