जैविक या जैव विकास के पक्ष में प्रमाण-Evidence in favor of organic development

जीवों की आधुनिक सृष्टि करोड़ों वर्षों के अनवरत परिवर्तनों का फल है। पृथ्वी पर सर्वप्रथम अत्यन्त सरल रचना वाले जन्तुओं का निर्माण हुआ। धीरे-धीरे उनमें परिवर्तन होते गये तथा जीवों की रचना में जटिलता आती गई।

आज भी जो जीव उपस्थित हैं वे भी धीरे-धीरे परिवर्तन के फलस्वरूप नवीन रूप धारण कर लेंगे। इस विकास की क्रिया को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं – ‘जटिल जीवों का विकास सरल रचना वाले जीवों से हुआ।’ जीवों में होने वाले ये परिवर्तन जैविक विकास के अन्तर्गत आते हैं।

जैविक विकास के प्रमाण

प्रारम्भ में जैविक विकास का सिद्धान्त कल्पना मात्र ही था क्योंकि यह इतनी धीमी क्रिया है कि प्रकृति में इसको होते देखना असम्भव है। साथ ही प्राचीन काल में हमारा अध्ययन क्षेत्र इतना संकुचित था कि उसके द्वारा भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किये जा सकते थे। आधुनिक युग में जन्तु-विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के अध्ययन से जैविक विकास के पक्ष में कुछ प्रमाण प्रस्तुत किये जा सकते हैं जो निम्न प्रकार हैं-

तुलनात्मक आकारिकी से जैविक विकास के प्रमाण

वैसे तो पेड़-पौधों व जीव-जन्तुओं, दोनों में ही विविधता पायी जाती है किन्तु कुछ लक्षणों में सभी जीव एक-दूसरे के समान होते हैं। उदाहरणार्थ सभी पेड़-पौधे एवं जीव-जन्तु मूल रूप से कोशिकाओं के रूप में व्यवस्थित जीवद्रव्य के बने होते हैं। यदि विभिन्न प्रकार के जीव अलग-अलग बने होते तो उनमें इस मौलिक समानता का प्रश्न ही नहीं उठता। अधिक विस्तृत रूप से अध्ययन करने पर जीवों में दो प्रकार की संरचनाएँ मिलती हैं-

1-कुछ संरचनाएँ व अंग मूल रचना एवं उद्भव की दृष्टि से तो समान होते हैं किन्तु कार्य के अनुरूप उसकी बाह्य रचना में अन्तर होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग तथा इनकी समानता को समजातता कहते हैं। उदाहरणार्थ, कशेरुकियों के अग्रपादों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि सील के फ्लिपर, चमगादड़ के पंख, मोल के अग्रपाद, घोड़े की अगली टाँग तथा मनुष्य के हाथ की मूल रचना एक-सी होती है और ये समान अस्थियों के बने होते हैं किन्तु फिर भी ये अलग-अलग कार्यों के अनुकूल होते हैं और आकृति में एक-दूसरे से पूर्णतया भिन्न होते हैं।

सील के फ्लिपर जल में तैरने, चमगादड़ के पंख उड़ने, छुछून्दर के अग्रपाद मिट्टी खोदने के लिये, घोड़े की टाँगे दोड़ने के लिये तथा मनुष्य का हाथ किसी वस्तु को पकड़ने के अनुकूल होता है। इन अंगों की समजातता से प्रमाणित होता है कि इन जन्तुओं का विकास एक ही प्रकार के पूर्वजों से हुआ है। इसी प्रकार की समजातता कशेरुकियों के अन्य अंगों में तथा पेड़-पौधों में मिलती है। समजातता अपसारी जैव विकास का उदाहरण है।

2-जिन अंगों के कार्यों में समानता होती है किन्तु उनकी मूल रचना एवं उद्भव में अन्तर होता है उन्हें समवृत्ति अंग तथा समरूपता को समवृत्तिता कहते हैं। जैसे- तितली, टेरोडैक्टाइल, पक्षी तथा चमगादड़ में पंख उड़ने का कार्य करते हैं और एक समान दृष्टिगत होते हैं, किन्तु इनकी रचना में बहुत अन्तर होता है।

तितली में पंख काइटिन के एक महीन पल्ले के रूप में होते हैं और आधार से लगी पेशियों की सहायता से गति करते हैं। उड़ने वाले कशेरुकियों में पंख अगली टांगों के रूपांतरण से विकसित हुए हैं। टेरोडैक्टाइल मे पंख धड़ व पिछली टांगों के बीच फैली हुई त्वचा से बनते हैं। पक्षियों में अगली टाँगों और उन पर लगे पिच्छों से पंख बने होते हैं जबकि चमगादड़ के पंख अग्रपादों की चार लम्बी अंगुलियों तथा धड़ के बीच फैली हुई त्वचा से बनते हैं। अतः इन जंतुओं के पंखों का विकास अलग-अलग प्रकार से तथा अलग-अलग पूर्वजों से हुआ है।

अवशेषी अंगों से जैविक विकास के प्रमाण

जीवों में अनेक ऐसी रचनाएँ भी पायी जाती हैं जो शरीर के लिये अनावश्यक हैं। ये अंग अवशेषी अंग कहलाते हैं। इनकी उपस्थिति से प्रमाणित होता है कि ये अंग किसी-न-किसी समय इन जन्तुओं के पूर्वजों में क्रियाशील रहे होंगे और उनके लिये उपयोगी होंगे किन्तु परिवर्तनों के फलस्वरूप अब जीवों के लिये उनका कोई महत्व नहीं। मनुष्य में ही 100 से अधिक अवशेषी अंग पाये जाते हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-

कृमिरूप परिशेषिका (Vermiform appendix)- शाकाहारी स्तनधारियों में सेलूलोस के पाचन के लिये अंधनाल होती है। किन्तु मनुष्य में यह कृमिरूप परिशेषिका के रूप में एक अवशेषी अंग द्वारा प्रदर्शित होती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य के पूर्वज शाकाहारी प्राणी थे। सर्वभक्षी स्वभाव के कारण मनुष्य के भोजन में सेलूलोस की मात्रा कम होने से अंधनाल का कोई महत्व नहीं रहा।

निमेषक पटल (Nictitating membrane)- मनुष्य में इसका कोई महत्व नहीं रहा। यह नेत्र के भीतरी किनारे पर लाल रंग की एक अर्ध-चन्द्राकार झिल्ली के रूप में होता है जिसे प्लिका सेमीलुनेरिस कहते हैं।

पूँछ– मनुष्य में पूँछ नहीं होती है, पर फिर भी कुछ पुच्छ-कशेरुकायें त्वचा के नीचे अत्यधिक हृसित दुम-सदृश रचना का प्रमाण देती हैं। वास्तव में हम सभी की भ्रूणावस्था में एक छोटी-सी पूँछ होती है। कभी-कभी नवजात शिशु में छोटी-पूँछ दिखाई भी देती है।

कर्णपल्लव की पेशियाँ– अधिकाँश स्तनधारी जन्तुओं में कर्ण-पल्लव को हिलाने-डुलाने के लिये कर्ण पेशियाँ होती हैं, किन्तु मनुष्य अपने कान हिलाने में असमर्थ है। फिर भी मनुष्य के कानों में ये पेशियाँ अवशेषी संरचना के रूप में पायी जाती हैं। स्पष्ट है कि मनुष्य के पूर्वजों में ये पेशियाँ मौजूद थीं और इनका कोई-न-कोई महत्व भी अवश्य ही रहा होगा।

उपर्युक्त रचनाओं के अतिरिक्त अनुत्रिक व अक्ल दाढ़ भी मनुष्य के अवशेषी अंगों के उदाहरण हैं।

अवशेषी अंग अन्य प्राणियों में भी मिलते हैं। अजगर के उदर भाग में पश्चपादों के अवशेषांग दो छोटी अस्थियों के रूप में त्वचा के नीचे अब भी मिलते हैं। इनमें से एक फीमर तथा दूसरी इलियम का ह्रासित रूप है। घोड़े की टाँग में स्प्लिट अस्थियाँ, कीवी के पंख तथा व्हेल के पश्चपाद व श्रोणि मेखला भी अवशेषी अंगों के उदाहरण हैं।

पौधों में भी कई प्रकार के अवशेषी अंग मिलते हैं, जैसे कुछ कैक्टस पौधों में क्यूटिन की पर्त के नीचे निष्क्रिय स्टोमेटा, खुबानी में पर्णवृंत पर पत्रक, आदि।

संयोजक कड़ियों से जैविक विकास के प्रमाण

प्रकृति में कुछ जीव ऐसे मिलते हैं जिनमें कुछ लक्षण एक वर्ग के तथा कुछ लक्षण दूसरे वर्ग के होते हैं। इस प्रकार के जीवों या उनके वर्ग को अन्तराक्रमणी जीव या संक्रामी जीव या संयोजी कड़ी कहते हैं। इनके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से हैं-

वाइरस– ये निर्जीव एवं सजीव की संयोजी कड़ी हैं। क्योंकि इनमें कुछ लक्षण निर्जीवों के तथा कुछ लक्षण सजीवों के होते हैं।

यूग्लीना– यह एक प्रोटोजोअन है जिसमें क्लोरोफिल होता है। यह हरे पौधों के समान पोषण करता है। जन्तुओं की भाँति इसका शरीर क्यूटिकल से ढका रहता है तथा यह जन्तुओं की भाँति जनन करता है। इसी कारण इसे जन्तुओं एवं पौधों के बीच संयोजी कड़ी कहते हैं।

प्रोटेरोस्पन्जिया- इसे प्रोटोजोआ एवं पोरिफेरा के बीच संयोजी कड़ी कहते हैं।

पेरिपेटस– इसमें फाइलम ऐनेलिडा एवं आर्थ्रोपोडा, दोनों के लक्षण मिलते हैं। इसे अब एक अलग फाइलम Onychophora में रखा गया है। कृमि के समान बेलनाकार व कूटविखंडित शरीर की उपस्थिति ऐनेलिडन लक्षण हैं जबकि नखरयुक्त पाद, एन्टिनी व ट्रेकिया की उपस्थिति इसके आर्थ्रोपोडन लक्षण हैं। पेरिपेटस के इन लक्षणों के आधार पर ही यह कहा जाता है कि आर्थ्रोपोड्स का विकास ऐनेलिड्स से हुआ है।

निओपिलाइना– यह एक आदिम मौलस्क है। इसमें ऐनेलिड लक्षण होने के कारण सिद्ध होता है कि मौलस्क प्राणियों का विकास ऐनेलिड प्राणियों से हुआ है।

लंगफिश– इनके तीन वंशों वंशों Protopterus, Lepidosiren तथा Neoceratodus में पैडल के समान पखने तथा वायवीय श्वसन के लिए फेफड़े होते हैं। अतः ये एम्फिबिअन्स के निकट हैं जिससे सिद्ध होता है कि एम्फिबिअन्स का विकास मछलियों से हुआ है।

 

आर्कियोप्टेरिक्स– इसे रेप्टाइल्स व पक्षियों के बीच की संयोजी कड़ी माना जाता है। इसमें रेप्टाइल्स की भाँति जबड़ों में दांत थे, अग्रपादों में नखर थे तथा एक लम्बी-सी पूँछ थी। इसमें पक्षियों की भाँति शरीर पर पिच्छों का बाह्यकंकाल तथा पंख थे। इससे स्पष्ट है कि स्तनधारियों व पक्षियों का विकास अलग-अलग दिशाओं में रेप्टाइल्स या उन्हीं के तुल्य पूर्वजों से हुआ है।

प्रोटोथीरिया– Echidna व Omithorhynchus रेप्टाइल्स व स्तनधारियों के बीच संयोजी कड़ी हैं। रेप्टाइल्स की भाँति इनमें क्लोएका होता है, ये खोलयुक्त अण्डे देते हैं तथा इनका भ्रूणीय परिवर्धन रेप्टाइल्स के समान होता है। स्तनधारियों के समान इनके शरीर पर बाल होते हैं और ये अपने शिशुओं को दूध पिलाते हैं।

जीवाश्म थीकोडॉन्ट भी रेप्टाइल्स व स्तनधारियों के बीच संयोजी कड़ी प्रदर्शित करते हैं।

जीवाश्म टैरिडोस्पर्म जो कार्बन युग में पाये जाते थे, फर्न एवं जिम्नोस्पर्म के बीच संयोजी कड़ी हैं।

इस प्रकार संयोजी कड़ियों से प्रमाणित होता है कि सजीवों में कृमिक रूपान्तरण होता है।

पूर्वजता या प्रत्यावर्तन से जैविक विकास के प्रमाण

कुछ जीवों या जीव समूहों में कुछ ऐसे लक्षण अचानक विकसित हो जाते हैं जो बहुत समय पहले उनके पूर्वजों में पाये जाते थे। इसको पूर्वजता या प्रत्यावर्तन कहते हैं।

प्रत्यावर्तन के उदाहरण

कुछ मानव शिशुओं में गर्दन पर कान के पीछे एक छिद्र होता है। इसे सरवाइकल फिस्टुला कहते हैं। यह मनुष्य के आदि पूर्वजों में पाये जाने वाली क्लोम दरारों का अवशेष है।

कुछ नवजात मानव शिशुओं में चूचुकों की संख्या दो से अधिक होती है। ये वक्ष व उदर दोनों प्रदेशों में पाये जाते हैं। मनुष्य के आदि पूर्वजों व आदि स्तनधारियों में वृक्ष व उदर दोनों भागों में कई जोड़ी चूचुक होते थे। अतः कुछ शिशुओं में चूचुकों की अधिक संख्या पूर्वजता का उदाहरण है।

कैनाइन दांत शिकारी स्तनधारियों में विकसित होते हैं। मनुष्य के आदि पूर्वज भी मांसाहारी थे और उनमें कैनाइन पूर्ण विकसित थे। आधुनिक मानव सर्वभक्षी हैं और पका हुआ खाना खाते हैं। इनमें कैनाइन विकसित नहीं हैं। कभी – कभी मानव शिशु में बड़े और नुकीले कैनाइन का बनना मांसाहारी पूर्वजों का प्रतीक है।

कुछ मनुष्यों के शरीर पर कपियों के समान लम्बे व घने बाल मानव और कपि में निकट सम्बन्ध को प्रदर्शित करते हैं।

कुछ मानव शिशुओं में छोटी-सी पूंछ का पाया जाना भी मूर्वजता का उदाहरण है।

जीवों के भौगोलिक वितरण से जैविक विकास के प्रमाण

जीवों का महाद्वीपीय वितरण उत्तरी गोलार्द्ध के महाद्वीपों, उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया में लगभग समान प्राणिजात पाया जाता है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध के महाद्वीपों (दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका तथा ऑस्ट्रेलिया) के प्राणिजात में बहुत अधिक अन्तर मिलते हैं। इस विविधता का कारण यह माना जाता है कि स्तनधारियों का विकास उत्तरी गोलार्ध में प्रारम्भ हुआ जहाँ से ये दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका तथा ऑस्ट्रेलिया में प्रवास कर गये। किन्तु इन महाद्वीपों में कोई पारस्परिक सम्पर्क स्थापित नहीं हो सका और पर्यावरण के अनुरूप इनका प्राणिजात अलग-अलग दिशा में विकसित होता गया।

उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया के बीच केवल उथला-सा बेरिंग जलडमरूमध्य है जिसने प्राचीनकाल में स्थल सेतु का कार्य किया। अतः दोनों महाद्वीपों के प्राणिजात में विनिमय होता रहता था। यही कारण है इनके प्राणिजात में बहुत समानतायें मिलती हैं।

असतत वितरण– जीवों के वितरण से भी विकास के प्रमाण मिलते हैं। ये देखा गया है कि भौगोलिक दृष्टि से अलग देशों में कभी-कभी एक ही प्रकार के जीव-जन्तु व पौधे पाये जाते हैं, तो कभी-कभी समान जलवायु वाले विभिन्न द्वीपों व महाद्वीपों की वनस्पति एवं प्राणी समूह में बड़ा अन्तर होता है। डार्विन के विकासवाद को जीवों के वितरण पर ही आधारित माना जा सकता है।

फुफ्फुस मछलियों के तीन जेनेरा हैं और तीनों अलग-अलग महाद्वीपों में पाये जाते हैं- प्रोटोप्टेरस अफ्रीका में, निओसिरेटोडस ऑस्ट्रेलिया में तथा लेपिडोसाइरन दक्षिणी अमेरिका में।

शेर व हाथी केवल भारत और अफ्रीका में मिलते हैं, अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया में नहीं तथा जेबरा, जिराफ और दरियाई घोड़ा अफ्रीका में ही पाये जाते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के मूल स्तनधारी केवल प्रोटोथीरिया एवं मेटाथीरिया उपवर्ग के प्राणी हैं। यूथीरिया स्तनधारी तो वहाँ पर मनुष्यों द्वारा पहुँचायें गये हैं।

भौमिक कथा से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में ऑस्ट्रेलिया व अफ्रीका स्थल सेतुओं द्वारा एशिया से जुड़े हुए थे तथा अफ्रीका दक्षिणी अमेरिका से। फुफ्फुस मछलियाँ इन सभी भागों में मिलती थीं किन्तु भौगोलिक परिवर्तनों के कारण ये कुछ खास जगहों पर सीमित रह गईं और शेष जगहों पर विलुप्त हो गईं। यही कारण है कि ये मछलियाँ अलग-अलग महाद्वीपों में पायी जाती हैं।

मार्सुपिएलिया (मेटाथीरियन) स्तनधारियों के केवल ऑस्ट्रेलिया में पाये जाने का भी कुछ ऐसा ही कारण है। इन स्तनधारियों के विकास के पश्चात् सम्भवतः ऑस्ट्रेलिया समस्त पृथ्वी से अलग हो गया। अलग होने के पश्चात् एशिया भूभाग में यूथीरिया स्तनधारियों के विकास के कारण मासुपिएलिया प्राणियों का विनाश हो गया किन्तु ये ऑस्ट्रेलिया में नहीं पहुँच पाये। फलस्वरूप वहाँ पर मासुपिएलिया सुरक्षित रहकर विकसित होते रहे और उनकी नई-नई जातियाँ भी विकसित हुईं।

भ्रूण विज्ञान से जैविक विकास के प्रमाण

परिवर्धन में समानता– सभी बहुकोशीय जन्तुओं के भ्रूणीय परिवर्धन में समानता होती है। ये अपना जीवन एककोशिक युग्मनज से शुरू करते हैं। इससे क्रमशः गोरूला, ब्लास्टूला व गैस्टूला अवस्थाओं का विकास होता है। अलग – अलग समूहों के जन्तुओं में गैस्टूला के बाद की अवस्थाओं में भिन्नता बढ़ती जाती है। जाइगोट एककोशिक प्रोटोजोअन जैसे पूर्वज तथा ब्लास्टूला एवम् गैस्टूला बहुकोशिक निडेरिया जैसे पूर्वज को प्रदर्शित करता है।

भ्रूणों में समानता– मछली, मेंढक तथा मनुष्य के भ्रूण को वर्धन की विभिन्न अवस्थाओं में देखने पर प्रारम्भिक अवस्था में इन सभी के भ्रूण एक जैसे दिखाई देते हैं। इन सभी के भ्रूणों में क्लोम, क्लोम दरारें और नोटोकॉर्ड आदि पाये जाते हैं। मेंढक के भ्रूण में क्लोम व क्लोम दरारों का पाया जाना तो माना जा सकता है क्योंकि उसका टैडपोल लारवा मछली के समान जलीय होता है। कछुए, पक्षी व मनुष्य कभी भी जलीय नहीं रहे। इनके भ्रूणों में अवशेषी क्लोम व क्लोम दरारों का पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि सभी कशेरुकी जन्तुओं का विकास मछली के समान पूर्वजों से हुआ है। भ्रूणीय अध्ययन से यह भी पता चलता है कि भ्रूणों में पहले संघीय और बाद में वर्गीय लक्षणों का विकास होता है।

पुनरावृत्ति सिद्धांत तथा बायोजेनेटिक नियम– मनुष्य के भ्रूण में व्हेल मछलियों के समान क्लोम दरारें व द्विवेश्मी हृदय होता है। इसके बाद क्लोम दरारें बंद हो जाती हैं तथा सरीसृपों के भ्रूण के भांति त्रिवेश्मी हृदय तथा पेशीय पूंछ बनते हैं। अंत में स्तनियों के समान लक्षण विकसित होते हैं। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव अपने भ्रूणीय परिवर्धन में उन सभी अवस्थाओं से गुजरता है जिन अवस्थओं से कभी उसके पूर्वज विकसित होकर बने होंगे। इसी आधार पर वॉन बेयर ने 1827 में बायोजेनेटिक नियम प्रतिपादित किया। इनके अनुसार:

(a)भ्रूण में पहले सामान्य लक्षण और बाद में विशिष्ट लक्षण बनते हैं।

(b)सामान्य लक्षणों में भी पहले अधिक सामान्य और उसके बाद कम सामान्य लक्षणों का विकास होता है। इसी प्रकार पहले कम विशिष्ठ और सबसे बाद में जाति-विशिष्ट लक्षण विकसित होते हैं।

(c)किसी एक जाति के भ्रूणों में दूसरी जाति के भ्रूणों से अलग होने की प्रवृत्ति पायी जाती है।

(d)भ्रूणीय अवस्थाएं आदि पूर्वजों के वयस्क के समान न होकर उनकी भ्रूणीय या युवा-प्रावस्थाओं के समान होती हैं।

अतः बेयर के बायोजेनेटिक नियम के अनुसार जन्तु अपनी भ्रूणावस्था में पूर्वजों की भ्रूणावस्था को दोहराते हैं। सन् 1866 में अरनेस्ट हेकल ने पुनरावृत्ति सिंद्धात प्रस्तुत किया। इसके अनुसार ‘प्रत्येक जीव का व्यक्तिवृत उसके जातिवृत की पुनरावृत्ति करता है।

युग्मनज से वयस्क जन्तु बनने तक के परिवर्धन को व्यक्तिवृत तथा किसी जन्तु जाति के विकासीय इतिहास को जातिवृत कहते हैं। हेकल के पुनरावृत्ति सिद्धांत के अनुसार जन्तु व्यक्तिवृत में पूर्वजों के वयस्क लक्षणों को दोहराते हैं जबकि बेयर के अनुसार जन्तु व्यक्तिवृत में पूर्वजों के भ्रूणीय लक्षणों को दोहराते हैं।

प्रतिगामी कायातंरण– एसिडियन प्राणियों के लारवा में कार्डेट लक्षण पाये जाते हैं। इसके कायान्तरण से स्थानबद्ध अपविकसित प्रौढ़ बनता है। कायान्तरण के समय लारवा के नोटोकॉर्ड, नर्वकॉर्ड तथा मायोटोम्स विलुप्त हो जाते हैं। इस प्रकार के कायातंरण को प्रतिगामी कायांतरण कहते हैं। लारवा में पाए जाने वाले कॉर्डेट लक्षणों के आधार पर एसिडियन्स को कॉर्डेटा समुदाय में रखा गया है।

चिरभ्रूणता– कुछ जन्तुओं के लारवा में कायान्तरण नहीं होता है और लारवा में ही जनन अंग बन जाते हैं। लारवा का वयस्क की भांति लैंगिक जनन करने को चिरभ्रूणता कहते हैं। यूरोडेला वर्ग का सेलामेंडर-एम्बाइस्टोमा लारवा चिरभ्रूणता प्रदर्शित करता है । इसको एक्सोलोटल लारवा कहते हैं।

भ्रूणीय या आदिम लक्षणों की चिरस्थिरता से जैव विकास का प्रमाण मिलता है कि विशेष अनुकूली परिस्थितियों में प्राकृतिक वरण द्वारा आदिम लक्षणों को प्रोत्साहन मिलता है। डी बियर के अनुसार कुछ प्राणी समूहों का विकास चिरभ्रूणता के कारण हुआ है।

जीवाश्म विज्ञान से जैविक विकास के प्रमाण

जीवाश्म विज्ञान में लाखों करोड़ों वर्ष पूर्व के जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के अवशेषों का अध्ययन किया जाता है। इनके अवशेष या चिन्ह चट्टानों में अंकित रहते हैं और जीवाश्म या फॉसिल्स कहलाते हैं। जीवाश्म में पूर्ण जीव या उसके शरीर के कुछ भागों के चिन्ह संरक्षित हो जाते हैं।

जीवाश्म विज्ञान की स्थापना क्यूवियर ने सन् 1800 में की थी। जीवाश्मों के अध्ययन से जीवों के विकास क्रम या जातिवृत का पता चलता है। इसी कारण जीवाश्मों को भूवैज्ञानिक रिकार्ड कहा जाता है।

जीवाश्मों के अध्ययन का महत्व– जीवाश्मों के अध्ययन से जन्तुओं व पेड़ पौधों में विकास के क्रम का पता चलता है। इससे निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले गये हैं-

आदिकाल के जीव आधुनिक जीवों के सरल व अविकसित संघों के जीवों से मिलते-जुलते हैं।

आदिकाल के जीव अपेक्षाकृत सरल संरचना वाले थे। समय के साथ-साथ जीवाश्मों की रचना में जटिलता दृष्टिगत होती है अर्थात् प्रारम्भिक फॉसिल्स सरल संरचना वाले थे तथा आधुनिक अवशेष आधुनिक जीवों के लगभग समान हैं।

सबसे पहले अमीबा के समान सरलतम रचना वाले एककोशिक जीवों का विकास हुआ। इनसे अकशेरुकी प्राणियों का विकास हुआ। धीरे-धीरे कशेरुकी प्राणी आये। इनमें भी सबसे पहले मछलियाँ, फिर एम्फीबियन्स और उनसे रेप्टाइल्स का विकास हुआ। पक्षी एवं स्तनधारियों का विकास सबसे बाद में हुआ तथा इनके आदि पूर्वज रेप्टाइल्स समूह के प्राणी थे।

कुछ जीवाश्म विभिन्न समूहों के जीवों, जैसे मछलियों व एम्फीबियन्स, एम्फीबियन्स व रेप्टाइल्स तथा रेप्टाइल्स व पक्षी एवं रेप्टाइल्स व सतनधारियों के बीच की संक्रमण अवस्था को प्रदर्शित करते हैं।

जन्तुओं में स्तनधारी तथा पौधों में एंजियोस्पर्म आधुनिकतम जीव हैं।

जीवाश्मों की सहायता से विभिन्न प्राणियों की वंशावली का अध्ययन करने से यह स्थापित हो गया है कि आज-कल के जटिल संरचना वाले जीवों का विकास आदिकाल के सरल रचना वाले जीवों से हुआ है।

वर्गीकरण विज्ञान से जैविक विकास के प्रमाण

समान रचना एवं आकार वाले सभी जीवों को एक साथ एक जाति में रखा जाता है। एक जाति के सभी जीव आपस में समान होते है किन्तु दूसरी जाति के जीवों से भिन्न होते हैं। जबकि कुछ जातियों में ऐसी समानतायें होती हैं जिनके आधार पर ये जातियाँ एक वंश बनाती हैं। इसी प्रकार कई समान गुण वाले वंश एक कुल बनाते हैं- वंश, गण में, गण, वर्ग में तथा वर्ग संघ में संगठित किये गये हैं। संघों को समस्त संरचना की जटिलता के आधार पर विन्यसित करते हैं।

वर्गीकरण की इस विधि से समस्त जन्तुओं तथा पेड़-पौधों का वंश-वृक्ष तैयार किया जा सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि सभी जीव एक ही प्रकार के मूल-पूर्वजों से बने हैं तथा विभिन्न परिस्थितियों के अनुरूप विभिन्न प्रकार के जीवों का विकास हुआ है। किन्तु फिर भी उनमें कुछ मूल गुण पाये जाते हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि सभी जीवों के मूल पूर्वज एक ही थे। परिस्थितियों के प्रभाव से इनसे अधिक विकसित या परिवर्तित जीवों का क्रमिक विकास हुआ।

वंश वृक्ष को देखने से ज्ञात होता है कि मनुष्य व अन्य सभी स्तनधारी, पक्षी, सर्प व छिपकली, मेंढक तथा मछलियों आदि को एक ही उपसंघ वर्टिब्रेटा में रखा गया है यद्यपि देखने में ये एक-दूसरे से पूर्णतया भिन्न हैं। इसका कारण है कि इनमें कुछ ऐसी समानताएँ- जैसे नोटोकॉर्ड, क्लोम-दरारें, खोखला तन्त्रिका तन्त्र इत्यादि पायी जाती हैं जिनके आधार पर यह माना जा सकता है कि विभिन्न समूहों में एक-दूसरे से सम्बन्ध अवश्य रहा होगा।

वर्गीकरण में जन्तुओं के समूहों को इस प्रकार विन्यासित किया गया है कि उनमें आकारिक जटिलता बढ़ती जाती है। वंश वृक्ष से यह भी ज्ञात होता है कि ऐम्फीबिया वर्ग के जन्तु मत्स्य वर्ग से, रेप्टिलिया वर्ग के जन्तु ऐम्फीबिया से तथा एवीज एवं स्तनधारी जन्तु रेप्टाइल्स से अधिक जटिल हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऐम्फीबिया वर्ग के जन्तु मत्स्य वर्ग से, रेप्टीलिया का ऐम्फीबिया वर्ग से तथा पक्षियों व स्तनधारियों का विकास रेप्टीलिया से हुआ है।

शरीर-क्रिया विज्ञान या फिजिओलॉजी से जैविक विकास के प्रमाण

विभिन्न जीवों के जैव-रसायनिक अध्ययन से जैव विकास के समर्थन में ठोस प्रमाण मिलते हैं। फ्लोर्किन (1949) तथा वाल्ड (1952) ने इस सम्बन्ध में निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत किये हैं-

जीवद्रव्य का रासायनिक संगठन– यद्यपि माइक्रोब्स, पादप और जन्तुओं में कोई समानता दिखाई नहीं देती किन्तु सभी के जीवद्रव्य का रासायनिक संयोजन लगभग समान है।

रुधिर संरचना– सभी कशेरुकी जन्तुओं में रुधिर की रचना समान होती है। रिचर्ट तथा ब्राउन द्वारा हीमोग्लोबिन की संरचना के अध्ययन से पता चलता है कि मनुष्य का हीमोग्लोबिन चिम्पैन्जी के हीमोग्लोबिन से बहुत अधिक मिलता है किन्तु बंदर के हीमोग्लोबिन से कम। इसका अर्थ है मनुष्य और चिम्पैंजी के पूर्वज एक ही थे।

तुलनात्मक सीरम विज्ञान– विभिन्न जन्तुओं के प्लाज्मा-प्रोटीन्स में समानता का अध्ययन एण्टीजन-एण्टीबॉडीज तकनीकी द्वारा किया जाता है। इसके अध्ययन के लिये खरगोश या गिनी पिग के शरीर में मनुष्य के सीरम के इन्जेक्शन लगाये जाते हैं। मनुष्य के प्रोटीन प्रतिजन का कार्य करते हैं और शशक के रुधिर में प्रतिविष या एन्टीबॉडीज बनाते हैं।

शशक के शरीर से रुधिर निकाल कर उसका थक्का बनने दिया जाता है । थक्का बनने के बाद पानी के समान सीरम शेष रह जाता है। इस सीरम में एन्टीबॉडीज होती हैं। इस सीरम का अति तनु सांद्रता वाला सेम्पल भी मनुष्य के रुधिर में अवक्षेप बनाता है। किन्तु अन्य कशेरुकियों जैसे कपि , बंदर , गाय आदि के रुधिर के साथ यह इतनी बहुलता से तथा साफ अवक्षेप नहीं बनाता जिसके लिये अधिक सांद्रता वाले सीरम की आवश्यकता होती है।

प्राणियों में परस्पर सम्बन्ध का अवक्षेप की मात्रा से सीधा सम्बन्ध होता है। निकट सम्बन्धी प्राणियों का सीरम अधिक अवक्षेप बनाता है जबकि विभिन्न वर्गों के कशेरुकियों के सीरम से कम अवक्षेप बनाता है। इससे सिद्ध होता है कि मानव, कपियों के निकटतम सम्बन्धी हैं।

ऊर्जा का स्थानान्तरण– माइक्रोब्स, पादप व जन्तुओं में जैव क्रियाओं की पूर्ति हेतू आवश्यक ऊर्जा ग्लूकोस से प्राप्त की जाती है। ग्लूकोस के अपघटन से ऊर्जा मुक्त होने तक की सभी रासायनिक प्रक्रियायें, उनको उत्प्रेरित करने वाले एंजाइम तथा इनके अंतिम उत्पाद सभी जीवों में समान हैं। सभी जीवों में गलूकोस से मुक्त हुई ऊर्जा ATP में संचित की जाती है और सभी जैव क्रियाओं के लिए ऊर्जा ATP से ही प्राप्त होती है। ऊर्जा स्थानान्तरण व रूपान्तरण की क्रियाओं में इतनी अधिक समानता से स्पष्ट हो जाता है कि सभी जीवों का उद्भव स्रोत एक ही आदि पूर्वज रहे हैं।

ट्रिप्सिन, ऐमाइलेज आदि पाचक एन्जाइम भी प्राणि-जगत् के विभिन्न संघों के प्राणियों में पाये जाते हैं ।

अति आदिम एवं सरलतम संरचना वाले प्राणियों से लेकर अत्यधिक जटिल रचना वाले एवं सर्वाधिक विकसित प्राणियों तक में खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण की रासायनिकी तथा उससे सम्बद्ध एन्जाइम भी समान होते हैं।

थाइरॉयड हॉरमोन की संरचना एवं कार्यिकी सभी कशेरुकियों में समानता प्रदर्शित करती है।

प्रोटीन संश्लेषण की यांत्रिकी- बैक्टीरिया से लेकर मनुष्य तक सभी जन्तुओं व पादपों में प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया एक समान है। सभी जीवों में-

(i) DNA प्रोटीन संश्लेषण के लिए कोशिका को आवश्यक संदेश प्रेषित करता है।

(ii) mRNA इन सूचनाओं को केन्द्रक से कोशिकाद्रव्य में पहुँचाता है।

(iii) राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण के लिए स्थान प्रदान करते हैं।

(iv) tRNA ऐमीनों अम्लों को mRNA के आदेशानुसार एक निश्चित क्रम में जुड़ने के लिए राइबोसोम के mRNA तक लेकर जाते हैं।

(v) ऐमीनो अम्लों के जुड़ने से पोलीपेप्टाइड श्रृंखला का निर्माण होता है।

(vi) इस क्रिया में भाग लेने वाले एंजाइम सभी जीवों में समान हैं। सभी जीवों में इस प्रकार की आधारभूत समानता की व्याख्या जीवों के एक ही आदि पूर्वज से विकसित होने को प्रमाणित करती है।

आनुवंशिक संकेत– सभी जीवों में आनुवंशिक सूचनायें DNA में नाइट्रोजिनस क्षारों के क्रम के रूप में संचित रहती हैं। इसी कारण DNA को ‘आनुवंशिक अणु’ कहते हैं। इसमें जीवों की वृद्धि, वर्धन के समय विभेदन व अन्य जैव क्रियाओं के लिए सूचनायें संचित रहती हैं। ये सूचनायें उस ‘ब्लूप्रिंट’ के समान हैं जो आर्किटेक्ट भवन बनाने से पहले तैयार करता है। इन्हीं के माध्यम से जीवों के लक्षण उनकी संतति में प्रेषित होते हैं। यह प्रेषण जनन के समय होता है। सभी जीवों की जैव-रासायनिकी एवम् कार्यिकी में इतनी अधिक समानता की व्याख्या केवल इसी आधार पर की जा सकती है कि सभी जीवों का विकास एक ही अतिआदिम वंशज से हुआ है।

आनुवंशिकी से जैविक विकास के प्रमाण

जीवधारियों के लक्षण इसकी कोशिकाओं के केन्द्रक में गुणसूत्रों पर स्थित जीन्स के अनुरूप होते हैं। अतः किसी एक जीव-जाति के सदस्यों के बीच लक्षणों की विभिन्नता उन सदस्यों के व्यक्तिगत जीन-समूहों अर्थात् जीनोटाइप्स में अन्तर के कारण होती है। एक जाति के सदस्यों के बीच जीन-समूहों में तो विभिन्नता होती है, लेकिन गुणसूत्र-समूह अर्थात् कैरियोटाइप सबका समान होता है। दूसरे शब्दों में, गुणसूत्र-समूह जातीय लक्षण होता है। उदाहरणार्थ, मानव जाति में गुणसूत्र 46 और चिम्पैंजी तथा ओरंग-उटान नामक कपियों में गुणसूत्र 48 होते हैं। मानव व कपियों के गुणसूत्र काफी मिलते-जुलते हैं। इससे कपियों व मानव जाति के विकासीय सम्बन्धों का पता चलता है।

गुणसूत्र समूहों एवं जीन समूहों के आधार पर विभिन्न जातियों के बीच विकासीय सम्बन्धों की पुष्टि जीवों के जनन से हो जाती है। कोई जीव अपनी जाति के अन्य सदस्यों से जनन करके सन्तानोत्पत्ति कर सकता है, किसी अन्य जाति के सदस्यों से जनन करके नहीं। अगर विभिन्न जातियों के सदस्यों में परस्पर संकरण कुछ सीमा तक सफल हो जाता है तो इन जातियों में निकटता प्रदर्शित करता है।

उदाहरण के लिए घोड़े और गधे में संकरण से संकर खच्चर बनते हैं। खच्चर बन्ध्य होते हैं जिससे पता चलता है कि घोड़े और गधे अलग-अलग जाति से सम्बन्धित हैं किन्तु साथ ही यह भी पता चलता है कि घोड़े ओर गधे एक ही पूर्वज से विकसित हुये हैं और उनमें काफी जीनिक समानता है। सम्भवतः पादपों में प्राकृतिक रूप से नयी जातियों का विकास हुआ होगा। कपास, गेहूँ, तम्बाकू आदि संकरण द्वारा नयी जातियों के विकास के उदाहरण हैं।